काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८२ ) इस तरह पौष कृष्ण अष्टमी से पौष शुक्ल प्रतिपदा तक युद्ध काल में पिता- मह के नौ दिन शरशय्या पर हुए । पौष शुक्ला द्वितीया से पौषशुक्ला त्रयोदशी तक बारह दिन शुद्धि काल में शरशय्या पर हुए । पुनः पौष शुक्ला चतुर्दशी से माघ कृष्ण तृतीया तक धर्मराज के राज्याभिषेक काल में भीष्माचार्य के पाँच दिन शरशय्या पर हुए । अब ९ + १२ + ५ = २६ दिन कुल हुए । अतः ४६ — २६ = २० दिन जीवन के शेष रहे । तृतीया से पूर्व राज्याभिषेकादि अत्यावश्यक कृत्यों में लग जाना स्वाभाविक था और भीष्माचार्य से मिलकर पुनः रात्रि विश्राम के उद्देश्य से हस्तिनापुर लौटते समय स्फुट चन्द्रोदय का उल्लेख देखते हुए माघ कृष्ण चतुर्थी के आगे बढ़ना, अधिक रात्रि की क्लिष्ट कल्पना में हेतु होने के कारण अनुपयुक्त है । अस्तु ! माघ कृष्ण चतुर्थी को भगवान् श्रीकृष्ण ने भीष्माचार्य से कहा— पञ्चाशतं षट् च कुरुप्रवीर शेषं दिनानां तव जीवितस्य । अतः 'षड्विंशत् न्यूनाः षट् पञ्चाशतं' ऐसा भाव ग्रहण करने पर ५६ - ३६ = २० दिन शेष रहे । अब मुख्य प्रश्न उठता है कि बीस दिनों में आदि ( उपदेश आरम्भ के एक दिन पूर्व ) और अन्त ( भीष्म के देह त्याग का दिन ) छोड़कर अठारह दिन रहे । इनमें कितने दिन उपदेश श्रवण में और कितने ही हस्तिनापुर में लगना चाहिए ? वाच्यार्थ में 'पञ्चाशतं षट्' अर्थात् छप्पन दिन शेष रहते हैं और 'पञ्चाशत्' पचास दिन हस्तिनापुर में व्यतीत होते हैं । अतः छप्पन से आदि-अन्त के दो दिन घटा देने पर चौवन दिन शेष रहते हैं । चौवन दिनों में माघकृष्ण पञ्चमी सहित पाँच दिन उपदेश में और नवमी को रात्रि विश्राम हस्तिनापुर में मान लेने पर माघकृष्ण नवमी से माघ शुक्ल सप्तमी तक चौदह रात्रियाँ हस्तिनापुर में व्यतीत होती हैं । माघ शुक्लाष्टमी को भीष्म का निर्वाण सिद्ध होता है ।