भारतकोश
काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)

Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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( ८३ ) अतः 'पञ्चाशत् नगरोत्तमे' के साथ 'षट् त्रिंशत् न्यूना, इति शेषः' का अध्याहार करने पर ५०-३६=१४ रात्रियां हस्तिनापुर में व्यतीत होती हैं। शुक्लादि एवं कृष्णादि मास में शुक्ल पक्ष में कोई अन्तर न होने पर भी कृष्ण पक्ष में एक महीने का अन्तर हो जाता है। परन्तु इस दृष्टि से भी शुक्लादि मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी से माघ शुक्लाष्टमी तक छयालीस दिन ही सिद्ध होते हैं। महाभारत के दाक्षिणात्य प्रतियों में माघशुक्लाष्टमी रोहिणी नक्षत्र और मध्याह्न का वर्णन है-- (शुक्लपक्षस्य चाष्टम्यां माघमासस्य पार्थिवं । प्राजापत्ये च नक्षत्रे मध्यं प्राप्ते दिवाकरे ॥ ) निवृत्तमात्रे त्वयन उत्तरे वै दिवाकरे। समावेश यदात्मानमात्मन्येव समाहितः ॥ ( शान्तिपर्व ४७।३ ) उक्त श्लोकों में प्रथम दाक्षिणात्य है। दोनों का सम्मिलित अर्थ इस प्रकार है-- 'राजन् ! जब दक्षिणायन पूर्ण हुआ और सूर्य उत्तरायण में आ गये, तब माघ मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में मध्याह्न काल में भीष्म जी ने ध्यान मग्न होकर ( देह त्याग के अभिप्राय से ) अपने मन को आत्मा में लगा दिया ।।' इस तरह माघ शुक्लाष्टमी को भीष्म निर्वाण और मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी को गीता जयन्ती एवं युद्धारम्भ की सिद्धि होती है । भीष्म निर्वाण के सम्बन्ध में भांडारकर संस्था की टिप्पणी के अनुसार भीष्म निधन तिथि--माघ कृष्ण चतुर्थी है। 'त्रिभागशेषः पक्षोऽयं' की संगति इस प्रकार लगाते हैं--उस दिन कृष्ण पक्ष के केवल चार ही 'दिन अर्थात् करीब एक चौथाई हिस्सा ही बीता था तथा तीन चौथाई शेष था, अतः उस समय ( प्रकाश की दृष्टि से ) शुक्ल पक्ष का प्रारंभ माना जा सकता है। श्री के० व्ही० अभ्यंकर ने भीष्म निधन माघ कृष्ण पञ्चमी में माना है ।