काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८४ ) परन्तु महाभारत में शुक्ल पक्ष का स्पष्ट उल्लेख और भीष्माष्टमी की प्रसिद्ध तिथि के सर्वथा विरुद्ध उक्त विचार हैं । टिप्पणी-- सनत्कुमार संहिता के कार्तिक माहात्म्य में बीसवें अध्याय में शुक्ल पक्ष के संदर्भ में लिखा है--'एकादश्यां कार्तिकस्य याचितं च जलं त्वया', इस वचन के अनुसार शरशय्या पर आसीन भीष्मपितामह ने अर्जुन से कार्तिक शुक्ल एकादशी के दिन जल मांगा । महाभारत भीष्मपर्व में ११९ वें अध्याय में श्रीभीष्मपितामह के शरशय्या लाभ का वर्णन है । १२० वें अध्याय में अर्जुन द्वारा उन्हें बाणों की तकिया देने का उल्लेख है । पुनः रात्रि विश्राम के पश्चात् प्रातःकाल उन्हें धनुर्धर धनंजय ( अर्जुन ) द्वारा दिव्य जल प्रदान करने का उल्लेख १२१ वें अध्याय में हैं । व्युष्टायां तु महाराज शर्वर्यां सर्व पार्थिवाः । पाण्डवा धार्तराष्ट्राश्च उपतिष्ठन् पितामहम् ॥ ( भीष्मप० १२१।१ ) आदि उक्तियों में उक्त तथ्य का प्रकाश द्रष्टव्य है । अतः महाभारत के अनुसार कार्तिक शुक्ल दशमी को भीष्म पतन मान्य होगा । ऐसी स्थिति में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से युद्धारम्भ मान्य होगा । शुक्लादि मासानुसार कार्तिक कृष्ण तृतीया में युद्धान्त मान्य होगा । कृष्णादि मासानुसार मार्गशीर्ष कृष्ण तृतीया में युद्धान्त मान्य होगा । ऐसी स्थिति में 'कौमुदे मासि रेवत्यां शरदन्ते हिमागमे' इस महाभारत वचन का यह अर्थ लगाना पड़ेगा कि श्रीभगवान् ने आश्विन में उपप्लव्य से हस्तिनापुर के लिए प्रस्थान किया । फिर 'अमावास्या भविष्यति, संग्रामो युज्यतां तस्यां तामाहुः शक्र देवताम् ।' इस श्रीकृष्ण वचन से संगति लगाने के लिए आश्विन की अमावास्या ज्येष्ठा नक्षत्र में मानना पड़ेगा, परन्तु यह भी उपयुक्त नहीं । साथ ही आश्विन की पूर्णिमा उससे एक पक्ष पूर्व लगभग रोहिणी में मानना होगा, परन्तु यह भी उपयुक्त नहीं । साथ ही कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा मूल नक्षत्र में युद्धारम्भ और कार्तिक कृष्ण तृतीया