काल मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - काल-तत्त्व, मुहूर्त एवं युगाब्द दार्शनिक मीमांसा)
Kaal Mimansa of Dharma Samrat Swami Karpatri Maharaj
धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ८५ ) आश्लेषा में युद्धान्त मान्य होगा, परन्तु 'पुष्येण संप्रयातोऽस्मि श्रवणे पुनरागतः' इस बलदेव वाक्यानुसार युद्धान्त श्रवण में होना चाहिए । साथ ही शुक्ल प्रतिपदा से युद्धारम्भ मानने पर 'अमावास्या भविष्यतिः संग्रामो युज्यतां तस्यां' इस भगवद्वचन की यद्यपि इस प्रकार संगति लग जायगी—'अमावास्या को सैन्य प्रशिक्षण और शुक्ल प्रतिपदा को युद्धारम्भ हुआ' परन्तु शुक्ल चतुर्दशी को चौदहवें दिन का युद्ध सिद्ध होने के कारण उत्तर रात्रि में चन्द्रोदय वाला वचन तथा आठवें-नवें दिन के युद्ध में सन्ध्याकाल एवं रात्रि में घोर अन्धकार आदि के संकेत व्यर्थ जायेंगे । यद्यपि इस रीति से भीष्मपितामह के शरशय्या पर कार्तिक शुक्ल १० से माघ शुक्ल ८ तक लगभग ९० दिन हो जायेंगे, अतः भीष्मनिर्वाण सम्बन्धी दिनों की संगति में सुगमता रहेगी, परन्तु युद्धकाल ही महाभारत के प्रतिकूल होने पर भीष्मनिर्वाण की अनुकूलता भला कैसे ग्राह्य होगी ? अतः सनत्कुमार संहिता का उक्त वचन महाभारत के प्रतिकूल होने के कारण 'कल्पभेद' से मान्य है । अभिप्राय यह कि जिस ग्रन्थ का श्रीमद्भागवत आदि की तरह स्वतन्त्र प्रामाण्य है, उसमें कल्पभेद मान्य है और जो ग्रन्थ महाभारत के अनुसार बना है, वह महाभारत के विरुद्ध होने पर उतने अंशों में प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता । 'महाभारत युद्ध को लेकर कल्पभेद की बात नहीं बन सकती', ऐसा मानना भी अनुचित है । क्योंकि महाभारत के अनुसार युद्धकाल उपस्थित होने पर श्रीबलरामजी तीर्थयात्रा के उद्देश्य से चले और गदायुद्ध के समय बयालीसवें दिन लौट आये, जबकि श्रीमद्भागवत के अनुसार गदायुद्ध के समय पहुँचने तक उनके कई महीने बीत चुके थे । ( नैमिषारण्य में सूतवध के पश्चात् बारह महीने की शेष यात्रा का भागवत में उल्लेख है—'चरित्वा द्वादश मासांस्तीर्थ- स्नायी विशुद्ध्यसे' ( भाग० १०।७८।४० ) ✤ युद्ध-दीपिका ✤ वर्ष--द्वापर के सन्ध्यंश और कलि की सन्धि अयन--दक्षिणायन