कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 111, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता
( ९७ )
सरगुण भक्त जो आवा गौना । तन थर दुख सुख पावे पवना ॥ निर्गुण भक्त शरण सतनामा । नाम कबीर भजन सुखधामा ॥
दोहा—कहैं कबीर सुन खगपाति, नाम कबीर कंडहरा।
निरगुण भक्त सब ऊपर, आवागवन निवार ॥
सकल देव मिल स्तुति लावा । बडे भाग हम दर्शन पावा ॥
व्यासदेव सुखदेव सुनियारद । विनती करें सुरपाति गण शारद ॥
श्रीकृष्णसे पूछे व्यासा । कबीरकी माहिमा करहु प्रकाशा ॥
तुमते भेछ कबीर कस भयऊ । यह चरित्र हम जान न पायऊ ॥
श्रीकृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन व्यास सुख जाना। कबीर आद करता निरवाना ॥
निरंजन हमरे पिता दृग काला । जार मार जिव करहि बेहाला ॥
सतकबीर काल शिर भंजन । कबीर नाम ते त्रसित निरंजन ॥
दोहा—तीन लोकते न्यारा, अमरलोक विस्तार ।
जो कबीरको सुमरे, सोइ उतरे भौपार ॥
कहैं कृष्ण मैं कहों परमारथ । निर्गुण भक्त जन्म जुग स्वारथ
जब कलकाल निरंजन कोपिहै । भिटिहै दया धर्म विश रोपिहै ॥
गंगा सती सिद्ध औ साधक । सबके सत घटि है कलबाधक ॥
गिराकार सब जीव गरासे । भक्तहीन तेहि काल तरासे ॥
निर्गुण भक्तिहीन जो प्राणी । पापी पुनी जार सब सानी ॥
सबकर सत् काल बिचलाई । कबीरसे संत अडे रहाई ॥
गाहैं ताहि कबीर ले राखी । आगे तेहि निजु कबीर हरि भाबी ॥