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कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कबीरकृष्णगीता

( ९७ )

सरगुण भक्त जो आवा गौना । तन थर दुख सुख पावे पवना ॥ निर्गुण भक्त शरण सतनामा । नाम कबीर भजन सुखधामा ॥

दोहा—कहैं कबीर सुन खगपाति, नाम कबीर कंडहरा।

निरगुण भक्त सब ऊपर, आवागवन निवार ॥

सकल देव मिल स्तुति लावा । बडे भाग हम दर्शन पावा ॥

व्यासदेव सुखदेव सुनियारद । विनती करें सुरपाति गण शारद ॥

श्रीकृष्णसे पूछे व्यासा । कबीरकी माहिमा करहु प्रकाशा ॥

तुमते भेछ कबीर कस भयऊ । यह चरित्र हम जान न पायऊ ॥

श्रीकृष्णवचन ।

कहैं कृष्ण सुन व्यास सुख जाना। कबीर आद करता निरवाना ॥

निरंजन हमरे पिता दृग काला । जार मार जिव करहि बेहाला ॥

सतकबीर काल शिर भंजन । कबीर नाम ते त्रसित निरंजन ॥

दोहा—तीन लोकते न्यारा, अमरलोक विस्तार ।

जो कबीरको सुमरे, सोइ उतरे भौपार ॥

कहैं कृष्ण मैं कहों परमारथ । निर्गुण भक्त जन्म जुग स्वारथ

जब कलकाल निरंजन कोपिहै । भिटिहै दया धर्म विश रोपिहै ॥

गंगा सती सिद्ध औ साधक । सबके सत घटि है कलबाधक ॥

गिराकार सब जीव गरासे । भक्तहीन तेहि काल तरासे ॥

निर्गुण भक्तिहीन जो प्राणी । पापी पुनी जार सब सानी ॥

सबकर सत् काल बिचलाई । कबीरसे संत अडे रहाई ॥

गाहैं ताहि कबीर ले राखी । आगे तेहि निजु कबीर हरि भाबी ॥