भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कबीरकृष्णगीता ।

दोहा-अजर मुक्त सो पावे जो, सुभरे सत्यकबीर ।

नरकी दैही त्यागके, हिरंमर धरे शरीर ॥

७३ पंडव नारद सुख व्याप्ता । एक दिन सुन कस भयउ तमाप्ता । जीव एक सतलोक चलि जाई । दूत ताहि नहिं पायउ प्राई ॥ गये दूत धर्मरायके पास । धर्मराय आप यम वासा ॥ हम त्रिय बंधु यम सहित सिधायो । हेरत जीव कितहु नहिं पाये ॥ सब थाके हम देश देखा जाई । सुन्यके पार मानसर जाई ॥ महासुगंध देश उजियारा । कामिन शोभा अकह अपारा ॥ कोटिन चंद सूर्य छवि एका । हंस असंख हंसनि तेहि रेखा ॥

दोहा-जहैं सतपुरुष कबीर निज, सो नहिं देखेउं ठौर ।

पुरुषलोकको आभा, मानसरोवर मोर ॥

अपनी कंचन उदित अटारी । हंसनीको लगी गंध हमारी ॥ द्वारपाल एक पठडन वेगी । देश निकार धायो बहु वेगी ॥ मोहिं घर बांहनीकारीस बाहर । मैं सुभरेउं कबीर तेहि ठाहर ॥ तहैं कबीर मोहि लीन्ह बचाई । बार अनेक दया उर लाई ॥ जहांसे गयऊं निरंजन खोदा । कबीरके आद न जाने वेदा ॥ कबीर सबनके आद बखाना । कबीरके आद कोई नहिं जाना ॥ कबीर नाम कायाको वीरा । कदली तन पौनगरसीरा ॥

दोहा-काया कदल दल, गुप्त प्रगट कबीर ।

सबके भीतर बाहर, स्वास निहस्वास शरीर ॥

सचलोककी ऐसी शोभा । कहि न सिराय मोर मनलोभा ॥ एक हंस तरवन जोती । छिन्न एक महैं देखऊं ससीकोती ॥