भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कबीरकृष्णगीता ।

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एक हंसनी रवि शशिकी खानी । अनंत कोट रवि शशी प्रवानी ॥ निराकार एक तिहुँ पुर जारे । सचकबीर सो जरत उवारे ॥ जबते हम देखा अस थाना । तबते मनमें निशिदिन ध्याना ॥ तीन लोक तेहि लेखामाहीं । सतलोकको नहिं परछाहीं ॥ तीन लोकमहँ नरककी काया । सब सुगंध सतलोक लखाया ॥

दोहा—काल कठिन परंपची, तीन लोक दुख देय ।

ताके निकट न आवे जो, कबीर प्रवाना लेय ॥ जबहिं कृष्ण अस परचे दीन्हा । तबहिं व्यास चरणोदक लीन्हा ॥ सुखदेव औ सब देव अधीना । सबहि कबीर कहँ सट्टुर चीन्हा ॥ सत्यनामकी परी दोहाई । सबहि कबीर कहँ सीस नवाई ॥ विनवें सबे कबीरके आगे । सत्यकबीर कहवे अस लागे ॥

कबीरवचन ।

हम जग भक्त रूप दासा तन । जीवके दरद आये देखावन ॥ हम हैं अजर अमर घरवासी । जहँ सब जीवको घर सुखरासी ॥ जब २ जीव निरंजन आसी । तब २ आय काटेँ यम फांसी ॥

दोहा—कहँ कबीर प्रमारथ, सत्य दया धर धीर ।

दरद पराई जाहि घट, ते घट राम कबीर ॥

गरुडवचन ।

गरुड गमन मन स्तुति लावा । भाग बडे कबीर गुरु पावा ॥ कहँ गरुड सुन कृष्ण सुरारी । जीवनकी गति कहो विचारी ॥ कोटिनमें एक कबीरहिं चीन्हा । तिन निज जन्म सुफल कर लीन्हा औरहिंकी गत कैसी स्वामी । सो कहिये भोहिं अंतर्थाभी ॥