कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 13, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्यनाम.
गुरुस्तुति ।
श्लोकाः ।
हे लोकेश दयानिधे ! त्रिभुवने देवोऽस्ति करत्त्वत्परः । ब्रह्माविष्णुमहेश्वरैः सुरगणैः संसेव्यमानः सदा ॥
संसारारुध्यद्वानलेन विकलः संतप्यमानोऽस्म्यहम् ।
त्वत्पादौ शरणं गतोऽद्यदिवसे भोः सद्गुरो ! पाहि माम् १
अर्थ—हे विश्वपति दयासागर ! त्रिलोकमें आपसे कौन देवता श्रेष्ठ है ? अर्थात् कोई नहीं। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव इत्यादि देवताओंके समूहकरके आप सदाकाल सेवन करने योग्य हो. संसाररूपी दावांभ्रसे व्याकुल हुआ तपायमान मैं आज आपकी शरणागतिको प्राप्त होता हूँ सो हे सद्गुरु ! मेरी रक्षा कीजिये ॥ १ ॥
ध्येयं सदा निखिलवेदविदो वदन्ति ।
ज्ञेयं च शुद्धमतयो यतयो विरक्ताः ॥
स त्वं प्रभो ! विगतशोकभवाब्धिसेतो ! ।
प्रत्यक्षतोऽसि भवतः शरणागतोऽस्मि ॥ २ ॥
आपको समस्त वेदके विद्वान् ध्यान करने योग्य कहते हैं, तथा विरागवान् निर्मल बुद्धिवाले यतिलोग आपको जानने योग्य कहते हैं सो आप हे प्रभो ! शोकरहित संसारके सेवु हो. मैं आज आपके साक्षात् शरणागत होता हूँ ॥ २ ॥