भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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१२

गुरुस्तुति.

नमोऽस्तु ते नाथ ! तवांश्रिपंकजम् ।

प्रत्यग्रकल्पदुमपर्णसन्निभम् ॥

श्रेयस्कंरं स्वात्मपदप्रदायकम् ।

ध्येयं सुनीन्द्रैरपि योगिनां वरैः ॥ ३ ॥

हे नाथ ! आपके चरणारविंदोंको नमस्कार है. कैसे हैं आपके चरणारविन्द कि, कल्पवृक्षके नूतन पत्रोंके समान, कल्याणके करनेवाले तथा स्वात्मपदको प्राप्त करानेवाले फिर कैसे हैं ? सुनीन्द्र और योगीन्द्रोंके भी ध्यान करने योग्य ॥ ३ ॥

माता त्वमेव भव नाथ ! पिता त्वमेव ।

सौहार्ददः स्वजनवन्धुसखा त्वमेव ॥

सर्वं त्वमेव न च कोऽपि त्वया विनाऽन्यः ।

तस्मात्त्वदीयचरणौ शरणागतोऽस्मि ॥ ४ ॥

हे मेरे नाथ ! आपही माता हैं, आपही पिता हैं, आपही मित्र हैं, आपही कुटुम्बी हैं, आपही भाई हैं, आपही सखा हैं, आपही सब कुछ हैं, आपके विना मेरा और कोई नहीं है. तिसी कारणसे मैं आपके चरणोंकी शरणागति हुआ हूँ ॥ ४ ॥

अद्य मे सफलं जन्म प्रतीतोऽस्मि दयानिधे ! ।

नरः संसारदुःखोघात्त्वप्रसादाद्विमुच्यते ॥ ५ ॥

हे दयानिधे ! मुझे प्रतीत होता है कि, आज मेरा जन्म सफल हुआ है. क्योंकि, मनुष्य दुःखके समूहसे आपहीकी कृपासे मुक्त होते हैं ॥ ५ ॥

श्लोकपंचकमाहात्म्य ।

यः श्लोकपञ्चकमिदं पठते सुभवत्या ।

शिष्यो जहाति कुर्गाति परितः सदा तम् ॥

संपद्यते विविधमंगलहर्षलाभम् ।

सर्वार्थसिद्धिरपि मोक्षगुरोः प्रसादात् ॥ ६ ॥

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