भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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अथ

कबीरकृष्णगीताप्रारम्भः ॥

उक्ति विष्णुव्यासवाणी—चौपाई ।

सुमिरो सचनाम गुरु नामा । साधुस्वरूप गुरु विसराया ॥ वक्ता विष्णु व्यास श्रुति वाणी । गुरुप्रताप सकलो गम जानी ॥ ब्रह्मा विष्णु महेश देवादी । तैत्तिस कोट देव संवादी ॥ सुनि नारद इंद्रादि अहीशा । सरस्वती गणपति जगदीशा ॥ बैठे सबै विष्णु मुख हेरा । पापपुण्यका करहिं निवेरा ॥ चित्रगुप्त तहां कागज लिखहीं । जेहिपर जेते बाकी अहहीं ॥ कितहुं निरति भजन गुरुनामा । कितहुं तो माया मनकामा ॥ पाप पुण्य बंधन जमफांसी । नाम विना भरमें चौरासी ॥ पकडे जीव चोरकी नाई । मारत सुगदर रोर कराई ॥ सासत खाय जीव अपराधी । यम लावे साकट कहैं बांधी ॥ करे पुकार सुने नहीं कोई । गुरुविन साकट परले होई ॥ जीवधात आमिष भस् जेते । अग्निकुंडमें झरकें तेते ॥ अग्नि जारके नरक बुडावे । नरकभर सिर निकसन आवे ॥ जब जिव सीस काठ दम लेहीं । तवहीं जम सिर सुगदर देहीं ॥