भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

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कबीरकृष्णगीता ।

लोहा सरा सा सिसखेधके गाडे । पिबहिं नरक जिव परवश पाडे ॥ त्रिगुण भक्त जिव तजे न काला । त्रिगुणभक्त काल भगजाला ॥ परनारी परद्व्य तलासी । तेहिंते ढारि दैय गरव फांसी ॥ ओझा डाइन चोर वटपारा । परे नरक जो खेले शिकारा ॥ साधु देख जिन बदन छिपावा । जम सिर सुगदर ताहि ढहावा ॥ मिथ्या वाद चुगल हंकारी । मित्र द्रोह ले नरकहिं डारी ॥ कृणबंधन निज आतमघाती । बंधुघात जम तोरैं छाती ॥ विश्वासघात दै लेय बहोरी । अघोर नरकमें तेहिं ले बोरी ॥ बैरागी ब्राह्मण संन्यासी । शस्त्र वांध भ्रमैं चौरासी ॥ गुरु पितु मातुकी करे नहिं सेवा । भ्रमैं तीरथ पूजत बहु देवा ॥ ब्रह्म तजि जो पूजहिं भूता । अघोर नरक देहीं जमदूता ॥ आतम तज जा पूज पषाणा । शिलाखूप देहीं भगवाना ॥ बृद्ध मनुज जो करहिं विवाही । सूकर जन्म नरक भार वाही ॥ वेश्यागमन विश्वाकर बेटा । तेहि पीछे होय ब्राह्मको घेटा ॥ त्रिया पाते तज जार जो राती । लोहमेश जम तोरहिं छाती ॥ तेहिपर आनि अग्नि धधकावैं । छेद बेध जम अनल जरवैं ॥ मात पिता तज त्रिय प्रतिपालैं । ताहि काल आवामैं डालैं ॥ बापको कुल तज जो सासुर वसैं । ताके सिर भसान चढ हसैं ॥ बहिनी गांव वसे जो प्राणी । पितृपछ त्याग संग्रह अवखानी ॥ अजिया सुत जिन बंधोर भाई । अजिया फिर तेहि खाय चवाई ॥ दिन दस भक्त करें अज्ञानी । बहुर मलेश दशा लपटानी ॥