भारतकोश
कबीर कृष्ण गीता

कबीर कृष्ण गीता

Kabir Krishna Gita

युगल आनंद विहारी द्वारा

स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)

Devanagarihipublished168 पृष्ठ

पृष्ठ 17, कुल 168 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 17

कवीरकृष्णगीता ।

ताहि दिखे भिक्षाके कुंडा । उठ बुडके अब काटै सुंडा ॥ निकसत सिर जम मार गजारा । लोहदंत क्रम करहिं अहारा ॥ देह पशया भषे जो मासू । भषहीं क्रम दंतन घट तासू ॥ बरबस व्याह छोर धन लेहीं । ताहि सेज कांटाको देहीं ॥ जिन भिक्षारिको भीख न दीन्हा । ताकहैं भीख मंगाय लीन्हा ॥ गांगत भीख देय जो गारी । कहहिं ते भीख न देय अनारी ॥ अभ्यागतको नेवति जेवावे । तोहेते पाय चला अघ जावे ॥ पारहि वाट टाट दै मारी । मार शिकार कोरटिया अघ डारी ॥ करे मजूर मजुरी भूखा । पेट भरे लघु जेठके सूखा ॥ जो हरे मजूरनकर मजुरी । ताकहैं काल देत हैं सूरी ॥ गऊ बधन जो द्विज बध कीन्हा । विष्णुबोह खान अब दीन्हा ॥ दुरबल सबल सबल नर चांपै । जम बेधे तब थरथर कांपै ॥ जौलो पोखर पार बनावे । जड आगे हत जीव चढावे ॥ देव नाम ले जीव हतावे । भोथे शस्त्रसे गला रितावे ॥ ब्राह्मण करे शूद्रसो भोग । परे नरक व्यापे बहु सोगा ॥ कन्या वेंच वेंच करे व्याजा । औ जो महँग मनावे अनाजा ॥ इन सबको दीन्हा अघखानी । औ जो प्यासे देय न पानी ॥ राजा होय अन्याई होई । परजहि दुखदे अघ भुगते सोई ॥

दोहा—जन्म जन्मका लेखा, वासिल बाकी होय ।

पापी दुख सिर बूडही, पुत्रिहि पहुँचे सोय ॥

जाहि जीव जत पुत्रके दासा । सो वैकुंठ पुत्र भर बासा ॥ पुत्र घटा फिर पर चौरासी । सत्तनाम मिन कटे न फांसी ॥