कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
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कबीरकृष्णगीता ।
मन वचके जो साधू सेवा । ताकहैं छोड़ि सके न जमदेवा ॥ साधु देह घर भजहिं जो रामा । सदुरु भाकि प्रताप सुखधामा ॥ सुखके धाम आह सतलोक । सतनाम भज जीव निसोका ॥
राजा छत्रजीतकी कथा ।
राजा छत्रजीत छत्रधारी । करे भाकि कुल लाज बिसारी ॥ इच्छाभोजन सब कहैं देई । जो इच्छा माँगे सो लेई ॥ राजा रहे कबीरके शीषा । सर्व जीवपर दाया दीषा ॥ आतुर होय कहे इंद्र भुवारा । अब तो राज न रहे हमारा ॥ राजा छत्रजीत चलि आवा । इच्छा भोजन सबहिं खवावा ॥ बोले कृष्ण इंद्रसन आई । कबीर भजेते प्राण बसाई ॥ इन्द्र उवाच ।
कहैं इंद्र अब केहिपर जाऊँ । हम आये राखहु मम भाऊ ॥
कृष्ण उवाच ।
जो अब तुव आवनमें राखो । निर्गुण भक्त दोह किष भाषो ॥ जो हम निर्गुण भक्त दुखावैं । निराकार मोहि नरक डुबावैं ॥ और सबनपर मैं सरदारा । कबीरके संतसे जम सब हारा ॥ कबीरको मनुषजानो मत कोई । कारण करण कबीर है सोई ॥ निराकार निरंजन देवा । तिन कह सत्त कबीरको भेवा ॥ पिता निरंजन हम सो कहेऊ । जब कबीर तब कोई नहीं रहेऊ ॥ कहैं निरंजन राज जो मोरा । सो दीन्ह कबीर बंदीछोरा ॥ कबीरके दिये करें हम राजू । कबीर भेवक मम सिरताजू ॥