कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकविरत्नमणिगीता ।
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व्यासवचन ।
चिनती व्यास कीन्ह पंग देकी । तुमसन काहु न देख विवेकी ॥ ज्ञान दसा औ मनकी दसा । सत्यकवीर करो प्रकाशा ॥
कवीर वचन ।
कहैं कवीर निरनै टकसारा । मनमत ज्ञानमता निरुवारा ॥ ज्ञान अंग प्रथम गुरु करई । गुरुको शब्द हृदय गह धरई ॥ गुरु तो ऐसा कीजे भाई । पूर्ण ज्ञान सत चाल ददाई ॥ सचलोकले जीव पहुँचावे । दया क्षमा सुखसिंधु समावे ॥ पूछे गुरुसे होय गलताना । जो गुरु कहे सोई सतमाना ॥ गुरुसुख ज्ञान विचारे लीन्हा । मन औ ज्ञान भिन्न तब कीन्हा ॥ दया क्षमा औ शील संतोषा । ज्ञान दया औ जीवपंथ मोषा ॥ विष्णो ज्ञान साकट अज्ञानी । शीतल ज्ञान क्रोध मन जानी ॥ असंत औ आतुर ज्ञाना । शील ज्ञान बेशील अज्ञाना ॥ निरगुण ज्ञान औ ज्ञान अतीला । धीरज ज्ञान अज्ञान हडीला ॥ आप खाय औरहिं देय ज्ञाना । गुरु साधू तज खाय अज्ञाना ॥ सेवा ज्ञान न उस अज्ञाना । कामी मन निहकामी ज्ञाना ॥ तीर्थ व्रत तप मनको भाऊ । नाम भक्त पुन ज्ञान लखाऊ ॥ चंचल मन स्थिर गुरु ज्ञाना । चंद भान ज्ञान अगनित भाना ॥ दिवस ज्ञान अज्ञान भौ राती । अवरण ज्ञान अभै नाजाती ॥ आतम पूजा ज्ञान बखाना । मनमत सिला धात व्रत ठाना ॥ दुबल सुपद ज्ञान प्राति ठाना । डिम धार को पूजे अज्ञाना ॥