कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
कविरत्नमणिगीता ।
१२५
व्यासवचन ।
चिनती व्यास कीन्ह पंग देकी । तुमसन काहु न देख विवेकी ॥ ज्ञान दसा औ मनकी दसा । सत्यकवीर करो प्रकाशा ॥
कवीर वचन ।
कहैं कवीर निरनै टकसारा । मनमत ज्ञानमता निरुवारा ॥ ज्ञान अंग प्रथम गुरु करई । गुरुको शब्द हृदय गह धरई ॥ गुरु तो ऐसा कीजे भाई । पूर्ण ज्ञान सत चाल ददाई ॥ सचलोकले जीव पहुँचावे । दया क्षमा सुखसिंधु समावे ॥ पूछे गुरुसे होय गलताना । जो गुरु कहे सोई सतमाना ॥ गुरुसुख ज्ञान विचारे लीन्हा । मन औ ज्ञान भिन्न तब कीन्हा ॥ दया क्षमा औ शील संतोषा । ज्ञान दया औ जीवपंथ मोषा ॥ विष्णो ज्ञान साकट अज्ञानी । शीतल ज्ञान क्रोध मन जानी ॥ असंत औ आतुर ज्ञाना । शील ज्ञान बेशील अज्ञाना ॥ निरगुण ज्ञान औ ज्ञान अतीला । धीरज ज्ञान अज्ञान हडीला ॥ आप खाय औरहिं देय ज्ञाना । गुरु साधू तज खाय अज्ञाना ॥ सेवा ज्ञान न उस अज्ञाना । कामी मन निहकामी ज्ञाना ॥ तीर्थ व्रत तप मनको भाऊ । नाम भक्त पुन ज्ञान लखाऊ ॥ चंचल मन स्थिर गुरु ज्ञाना । चंद भान ज्ञान अगनित भाना ॥ दिवस ज्ञान अज्ञान भौ राती । अवरण ज्ञान अभै नाजाती ॥ आतम पूजा ज्ञान बखाना । मनमत सिला धात व्रत ठाना ॥ दुबल सुपद ज्ञान प्राति ठाना । डिम धार को पूजे अज्ञाना ॥
१२६
कवीरक्षणगीता ।
मात पिता सेवे शुभ ज्ञाना । तात जननी तज त्रिय मन माना ॥ डिंभ अहंकार दुर्ता मन छाया । अछत दीन लघु ज्ञान सुभाया ॥ पालक ज्ञान घालक यम बाजी । जैसे जग मनमत दिज काजी ॥ बोलता ज्ञान तन मन अंकारा । जाग्रित ज्ञान स्वप्न मन चारा ॥ ज्ञान परमार्थ स्वार्थ मन मूढ़ । जुवा मनुज ज्ञान पद बूढ़ ॥ अपन पराया एक सम जाना । और तोर मन बुध विगराना ॥ मात पिता सिर देय सो ज्ञाना । अहिब नारी विष खोट अज्ञाना ॥ भीस अजाची ज्ञानको अंगा । धूमधाम जांचक मनरंगा ॥ देह दाग मनमता कहावा । मन दागे जो ज्ञान सुभावा ॥ नाच छाछ विश्वा नट ठाढी । यह मनमता यम चौकी गाढी ॥ भीन नास मद क्षण मन बाजी । कसतुरी मिमयाय असत बन खाजी ॥ चाहे बैराग तजे नहिं रानी । सन्यासी संग्रह मन चारी ॥ झंसे मन पुलकित होय आना । सरगुन गुरु मन सट्टुर ज्ञाना ॥ चाहे भिस्त तजे नहिं मोहा । मोह अज्ञान ज्ञान निरमोहा ॥ सतगुण ज्ञान रज तम मन दीसा । मन मलेश गुण पांच पचीसा ॥ जागे ज्ञान सोय अज्ञाना । सो जागा जिन राम पहिचाना ॥ सोइ अज्ञान गुरु सेवा नहिं कीन्ह ॥ गुरुको सार असार नहिं चीन्ह ॥ ज्ञान अमर मन मरे नसाई । ज्ञान पारस मन सुरत होय जाई ॥ ज्ञान अमर पद सार सो बाहर । सट्टुर भिल आवे शिष्य ठाहर ॥ बाहरसे घट ब्रह्म समाना । सो जिवलोक ते न्यारा निरवाना ॥ अभी ज्ञान सो सत्य कवीर । बिबै निरंजन नीर सरिर ॥ जीव अभी सो नाम कवीरा । देह निरंजन बिबै शरीरा ॥
कलियुगमें कबीर साहब क्यों प्रकट हुए ?
कवीरकृष्णगीता ।
१२७
आवत स्वास सो सत्य कबीरा । निकसत मरे निरंजन कीरा ॥ गौर हथीर मन माया जानो । अजर पीर कबीर बखानो ॥ व्यास कहैं कस पीर कबीरा । सत्य कबीर भलदास गंभीरा ॥
कवीरवचन ।
कहैं कबीर कलमुगके आदी । मीन मांस भाखिहैं नर वादी ॥ होय मलेश महदेव ऐहैं । गौ द्विज वधि सिरिया नैगी ऐहै ॥ महादेवहिं महम्मद कहिये । हिंदू केर धर्म नहिं रहिये ॥ तब हम पीर कबीर कहाउव । साथि मलेश गौ द्विजहिं बुचाउव ॥ विष्णु पक्षका भयो प्रकाश । हमरे विष्णुसों कस दुइ भासा ॥
दोहा—दास कबीर कहाउव, रजव गुरु करव संसार ।
सत्यकबीर कहाउव, संतनके निस्तार ॥
जन कबीर भये नरतन धारा । कबीर कहाये जिव तन सारा ॥ हंस कबीर होय भजव सतनामा । अम्बर कबीर अमर सो जाभा ॥ गैनी नाम कबीर कहाउव । बहु बंधनते जीव मुक्ताउव ॥ अविगत कबीर कहाउव तबहीं । स्वयं च अधम उवारव जवहीं ॥ अकह कबीर केह को लीला । अविनाशी नहिं विनस शरीरा ॥ नाम कबीर वास सब देहा । रमैं कबीर रामतन खेहा ॥ रमैं कबीर होय रमता रामा । रमता स्वास जिव तन विश्रामा ॥ दीन दयाल कबीर कहाये । दीन दुखित जिव पालन आये ॥ खसम कबीर कहाये तबहीं । जीव सोहंगदे व्याहेउ जवहीं ॥ काल भरदन कबीर कहाये । यमहिं जीत जिवलोक पठाये ॥
१२८
कबीरकृष्णगीता ।
जोगजीत तब नाम हमारा । जब जीते योग माया निराकारा ॥ सतसुक्ति तब नाम हमारा । जब सत् प्रकाश कीन्ह संसारा ॥ बंदीछोर तबहिं कहलावा । जब यम बंदिछोर सुकावा ॥ मनकहैं जीत सुनीन्द्र कहाये । करुणामय होय दया ददाये ॥ सब फुलवा बेलि हमारी । निरंजन कहैं सौंपा वारी ॥ निरंजन पुत्र पुत्री अष्टंगी । मम द्रोही जो ताको संगी ॥ हमरे दुष्ट मित्र नहीं कोई । सर्वहिं व्यापक न्यारा सोई ॥ साधु द्रोह सोई मम द्रोहा । साधुसेवक मम सेवक बोहा ॥ जो मम संतकी सेवा करई । हमहिं जानके गुरुको धरई ॥ ताहि सुकिका संशय नहीं । गुरु साध भक्ता मम आहीं ॥ गुरुदोही सो साधुको द्रोही । अपने राम न भेटेउ बोही ॥ जगमहैं चहुंयुग गुरुऔ रामा । राजा राम गुरु सुखधामा ॥ गुरु राम दोय नाम हमारा । राम असोच गुरु भौकंडहारा ॥ अगम ज्ञान मन पूछहिं बाला । बहुहरहिं पूछेऊं पीर व्याला ॥ पीर परा ईसब दिन मेरा । सोई पीर जेहिपीर जिव केरा ॥ कहौकहां लग विकृत कलाजग । निरंजन एक मम रोम तनलग ॥
व्यासवचन ।
व्यास चरण गहि पुलकितभयऊं । सत्य कबीर मोहिं मानद दियऊं बडे भाग मम सुखदेवकेरा । और गडुरके भाग बधेरा ॥ व्यासदेव कृष्णहिं सिर नाये । धन्य तुम कृष्ण कबीर चिन्हाये ॥ कबीर बिना को राखे जिवको । गुरु बिन कौन चिन्हावे पिवको ॥ गुरु विष्णु सत सतको अंशा । सोई सत्यकबीर कुलवंशा ॥
सब देवताओंका कबीरसाहबका शिष्य होना
कवीरकृष्णगीता ।
१२९
सबके मूल कवीर ठहराने । कवीरके डर यमराज डराने ॥ कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण सुन व्यास मत धीरा । सब सट्टुणके गुरु कवीरा ॥ लेहु पान सबही मम दीक्षा । सत्यकवीर कहैं अर्णहु सीसा ॥ सट्टुर कवीर गुरु करहु रे भाई । श्रीकृष्ण सबको ससुझाई ॥ जहैलग सट्टुण देवता रहऊ । सबन धाय सट्टुर पद गहऊ ॥ उभै कहे विष चक्षु नीरा । देहु प्रवाना सत्य कवीरा ॥ कवीरवचन ।
कहैं कवीर सुनो सब देवा । कृष्णसो पूछहु हमरी भेवा ॥ हम हैं अजर भुक्तके दाता । हमरे शरण यम त्रास निपाता ॥ जो हम कहा शब्द सहिदानी । शब्दकी चाल चले सो ज्ञानी ॥ सबन कहा अपौं शिर तोही । देहु पान आपन कर मोही ॥ सत्यकवीर तब आरती कीन्हा । अभी अंक सो वीरा दीन्हा ॥ चरणोदकदे तिलक कर दीन्हा । तुलसि माल दे सिखवनकीन्हा ॥ सब जिव जानहु एक समाना । जीवघात तज ब्रह्म अभिमाना ॥ साधु गुरु सम सेवा मानी । सुख स्थिर सट्टुरकी वाणी ॥ गुरु कर्ता गुरु सम नहीं कोई । गुरु कर्ता ते भेछ है सोई ॥ करता देही धर गुरु करही । तो करता करता होय परही ॥ सब महाँ करता नाम कवीरा । रमें राम होय सकल शरीरा ॥ सर्व यई सो राय लखाहीं । राम सो अंश कवीरके आहीं ॥ जग महाँ उलटी भाव दिखाये । जो स्वामी सो दास कहाये ॥ करता आद कवीर भये दासा । राम कृष्णकी महिमा प्रकाशा ॥
लक्ष्मी आदि देवियोंके गुरुमुख होनेका वृत्तान्त
१३०
कबीरकृष्णगीता ।
सबमो राम सो रमहिं कबीरा । जैसे घृत व्यापक है क्षीरा ॥ बैठा नवर बराबर पोखे । पाप नाचि तबै पुण्य कर चोखे ॥ ना कोइ पाप जिवघातसमाना । साधुसेवासम पुण्य न आना ॥ गुरुके भक्तसमान नहिं दूजा । पतिव्रता जिमि भियपद पूजा ॥ सद्गुरु पिव सो जीवके आहीं । पतिव्रताते गुरुभक्तभेदआहीं ॥ तिन स्वामीके भक्त सुरलोक । गुरु भियभक्त सो जीवनिसोका ॥ भ्रान मंजार देह धर सोई । गुरु साधुको निन्देउ सोई ॥ हरदम नाम कबीरको गावे । तासु हृदय कबीर सयावे ॥ तजे अभक्ष सुभक्ष सो पावे । भीन मास यदार रत नहिं भावे ॥
दोहा--मधुर मम पाय कसतुरी, माक्षी घोंघी चुन ।
मत्स्य मास मद त्यागे, पहुँचे पुरुष सनीप ॥
पान परवाना पावे, सुमरे सत्य कबीर ।
कहे कबीर घर पहुँचे, बहुर न धरे शरीर ॥
ब्रह्मा विष्णु महेश भवानी । लक्ष्मी गायनि सकुचानी ॥
हम सब गुरुविनकोहिपंथ जायव । ना जानो केहि खान समायव ॥
हमरे स्वामी तेहि सिर दीन्हा । हम तीनों मिल केहि पग लीन्हा ॥
लक्ष्मीवचन ।
लक्ष्मी कहे सुनो ब्रह्माणी । सुन सेवहु कबीर सुखवाणी ॥
चहिये कबीरके दीक्षा लीजे । सत्यकबीर चरण चित दीजे ॥
कह लक्ष्मी मम पति सिरदारा । थो मम पतिके सद्गुरु सारा ॥
यह कह लक्ष्मी विष्णुपहँआई । सीस नाय चरण चित लाई ॥
आज्ञा करिये स्वामी मोरा । तब गुरु करो कबीरबदिछोरा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१ ३१
विष्णुवद्भन ।
हंसके विष्णु तवआयसु दीन्हा । हम जो चहत सोईतुम कीन्हा ॥
दोहा-धन्य भाग तेहि नारको, विष्णव जाको स्वामी ।
बहुर भाग तेहि पुरुषको, जेहि घर विष्णव वामी ।
कहैं कृष्ण नरिअर कर लेहू । सीस निछावर नरियर देहू ॥
दोहा-पान मिष्ठान्न नरियर, पुंगी फल पुष्प श्वेत ।
श्वेत वस्त्र सिंहोसन, साजहु थार समेत ॥
कंचन थार जोत प्रकाश । हीरा माणिक अथ सुवासा ॥
कृष्ण लाय पीछे निज नारी । चले भक्त राधे झझकारी ॥
पुन सत शिवको सिधाई । कबीरके चरण परससवआई ॥
कहैं कृष्ण सुन सत्यकबीर । दीजे शरण नार त्रिय धीर ॥
लक्ष्मीबचन ।
लक्ष्मी कहे विविध कर जोरी । हमको तारहु यमसोबांदिछोरी ॥
कबीरबचन ।
दोहा-कहैं कबीर सुन लक्ष्मी, सोई नार सुलक्ष ।
तन स्वामी जिव पीव कहैं, सेवा करती दक्ष ॥
अपने पति तज आन न जोवे । सोई नार पतिव्रता होवे ॥
पतिव्रता निज प्रियपद पूजा । जग महीं पतितज सृष्टि न दूजा ॥
दोहा-पिय चरणोदक जूठन, पतिव्रताको आधार ।
पियहे अंबू अगिन घसे, सिरदे हने पहार ॥
सवपर सत्यनाम गुरुरूपा । अजर अमर गुरु सत् सख्पा ॥
जीव सबे गुरु समर्थ केरा । जासु प्राण वस जाके चेरा ॥
१३२
कबीरकृष्णगीता ।
तुम तो लक्ष्मी सत्यकी माया । साधु संतपर करिहो दाया ॥ सुनहु कृष्ण स्त्री गुरु स्वामी । तन गुरुपति पति गुरु निज नार्मी। कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण हम दासी दासा । एक मत घर तब संत विलासा ॥ तब कबीर प्रसाद चढावा । सत्यनाम कहैं भोग लगावा ॥ यम त्रिण तोड दीन्ह परवाना । लक्ष्मी पान पाय सुख माना ॥ चरणामृत सीत प्रसादा । लीन्ह लक्ष्मी सचको स्वादा ॥ सात दंडवत कीन्ह स्वसम कहैं । तीन दंडवत संत तनपति कहैं ॥ कहा कृष्ण अब हम गतिपावा । घर साकट वैष्णव करवावा ॥ केते पुरुष आय गुरु शिष्या । नारी साकट घर प्रेत परेखा ॥
दोहा-भक्ति करे जो स्त्री, तो वीसिये घर माहिं । साकट स्त्री भुंभनी; नहिं जैये तेहि पाहिं ॥
स्त्री बेटी बेटा भानजी । मात पितु बंधु परिजन काजी ॥ ये सब सरगुण भ्रम पसारा । मोर मोर कर मरे संसारा ॥ मोर मोर का करहु रे भाई । मोर आप पगु देख तवाई ॥ सब गुण शूद्र तासु धराई । भक्ति बिना कछु काम न आई ॥ अपने मन सब भक्त कराहीं । सार भक्त विन नरक भोगाहीं ॥ सार भक्त सतनाम कबीरा । भजै कबीर न घरै शरीरा ॥ चौथा पद सदुरु स्थाना । सदुरु सत्य कबीर निरवाना ॥ निरगुण भक्त पतिव्रत शरीरा । एक स्वसम सो सत्य कबीरा ॥ त्रिगुण भक्त सो आवा जाहीं । चौरासी मई भटका खाहीं ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१३३
दोहा--सतगुण रजगुण तमगुण, तिनके तीन सुभाव ॥ कौन सिरजे कौन पोखे, कोइ संहार कराव ।
रजगुण तमकी उत्पत जाना । सतगुण सोवत जन्म सिराना ॥ तमगुण रुद्र काल संहारे । त्रिगुण निरंजन भसम कर धारे । बांचे विष्णु सतगुण सत ठाई । सत्यके मूलसत्य कबीर सतसोई जेहि जस रुचे तैसो गुरु कीजे । विन गुरुजीव काल वस दीजे ॥
दोहा--सावित्री ओ गौरा, मगन भये हरि बैन ।
कहैं हमहू गुरु करों, सत्य कबीर सुख चैन ॥ कहैं कृष्ण कबीरसे वाणी । शिष्य होन चाहैं त्रिय दाय प्राणी ॥ कबीरवचन ।
कहैं कबीर खीवस स्वामी । पति कहैं पूछ नाम भज नामी ॥ गायत्रीगौरावचन ।
कहैं गायत्री गौरा बहोरी । सबके स्वामी तुम बंदिछोरी ॥ दुतिया माहि कोइ हित नाहीं । दिन दश कच्चा सुख जगमाहीं ॥ अंतकाल जब काल गरासे । तब गुरु विन नहिं कोइ निकसे ॥ अधा अंछंगी तेहमें तानी । लक्ष्मी तुव शरण हम कालअधीनी सत्यकबीर तुम गुरु पितु माता । तुम्हरी दया बने सब वाता ॥ हम चीन्हा तुम साहेब आहूँ । सब बनजिया तुमही गुरु साहूँ ॥ तुम जेहि चितबहु सो तर जाईं । तुम विन जियरा नरक भोगाईं ॥ गौरा कहैं विहसिके वाणी । हमहू लखा कबीर सहिदानी ॥ जबहिं विष्णु हरिनाकुश मारा । शिव गुणसुत छिन असुरहिं मारा हमहू शिवगण आईं हां । बैठे हरिनाकुश सिरमाहा । जब कबीर विष्णुके माथे । तब देखा मैं शिवके साथे ॥
१३४
कवीरुक्षणगीता ।
कवीरवचन ।
कहैं कवीर सही तुम कहा । होहू शिष्य कपिलमुनि पहा ॥
दोहा-कपिला गऊ कपिल मुनि, हो सट्टरु हो तास ।
तास शिष्य मम पुत्री, तुम्हरे होय निवाह ॥
कृष्णवचन ।
कहा कृष्ण गौरा सावित्रिहिं । एके वृक्ष डारभै निवधिहिं ॥
भूल कवीर निरंजन डारा । साखा त्रिगुण पत्र संसारा ॥
पाँच पचीस जीव संग परऊ । हंस चाल तज बक मग गहू ॥
हंस सोई जिन सट्टरु चीन्हा । सट्टरु सत्यकवीर चित दीन्हा ॥
दोहा-सावत्री औ गौरा, भई कपिलमुनि शिष्य ।
विष्णुआदिक कवीर प्रमोधा, भयो सवन मन हर्ष ॥
तेहि छिन मात्र रुद्र अज आये । देश सुल्क सुख हरहि सुनाये ॥
पूछा विष्णु मृत्युलोक कहानी । चतुरावन शिव कहा बखानी ॥
ब्रह्माशिववचन ।
महा आनंद होत सब ठाऊं । भौ मृत्युलोक वैकुंठ सुभाऊं ॥
विष्णव मया सकल जग जाई । सत्यकवीर जपे दुनियाई ॥
राम कवीर करे पंथ जागा । जग सब भक्त भयउ मद त्यागा ॥
विष्णव होय सो गिने न काहू । कहैं के को तुम अज शिव आहू ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण यह भलि है बाता । तुम अंकुल काहे अकुलाता ॥
तुमहु भक्त करहु भल चाहहू । तजहु क्रोध सट्टरु पहिचानहू ॥
महादेववचन ।
कहैं महादेव तमकके बाता । सट्टरु तुमहि विष्णु जगदाता ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१३५
कृष्णवचन ।
कहे कृष्ण हम सदुरु नाहीं । सदुरुके पदरजको छाहीं ॥ सदुरु एके सत्य कबीरा । काया वीर सतनाम कबीरा ॥ काया वीर बोलता पवना । आद पवनसो स्वास अजौना ॥ खंस हंस सरवर तनयाहीं । अमी अहार सदा सुखयाहीं ॥ सोहंग हंस अंस सतनामा । सोहंग करता पुरुष वखाना ॥ सोहंग एक कबीरते छोटा । सबसे बडे सोहंग रूप मोटा ॥ सोहंग स्वास एकहि नाऊ । अनंत नाम स्वासके भाऊ ॥ दोहा—अनंत नाम एक स्वासके, स्वासा सबके माहिं ।
निरंजन अद्या अज हरिहर, जतरूवास विना कोई नाहिं सो स्वासा स्वासा विस्तारहि । आद स्वासा सो भौ सोहंग छाही। वास सोहंग सो ओंकार भो तीनी । सबके रचना कबीरजी कीन्ही दोहा—राम कबीरके अंश हैं, कबीर रामके अंश ।
राम कबीरके वंश हैं, कबीर रामके वंश ॥ सत्य सो पिता पुत्र होय धाया । तबहिं पुत्र पिता कहलाया ॥ स्वासा सत्यकबीरको अंसा । देह निरंजन घट पर संसा ॥ ब्रह्माशिववचन ।
सुनि ब्रह्मा शिव अचरज भयऊ । तबहीं शिव अस बोले लियऊ ॥ सही कबीर बडे हैं भाई । मोह कहा भूतको राई ॥ जासे हम तुम सब मिल हारा । एक बेर नहिं कैयो बारा ॥ कबीर करता हम तबहीं चीन्हा । खरा जबाब जब हम कह दीन्हा ब्रह्मा कहे कबीर करतारा । कबीर कला सो अपरम्पारा ॥ निरंजन जाके ढर भौ माना । कबीरके त्राससो काल डेराना ॥
सत्यलोकके हंसोंके रूपका वर्णन
१३६
कबीरकृष्णगीता ।
कृष्णवचन ।
इतना सुन कृष्ण कबीरपहँ हेरा । तब कबीर भगटे तेहि बेरा ॥
सत्यनाम कहि शब्द उचारा । अडुत लीला कला विस्तारा ॥
सोभा लोक रोम एक प्रगटा । अडुत चंद सूर भौ घटा ॥
दोहा-सिंहासन पर बैठे, सट्टरु सत्यकबीर ।
अमित कला छबिको कहे, अडुत हंस मन हीर ॥
धन्य भाग्य वैकुंठके, जहँ प्रगटे सत्यनाम ।
सट्टरु देव अनंदही, रजगुण तमगुण धाम ॥
कला गुप्त किये सत्यकबीरा । जैसेको तैसे यतधीरा ॥
सबे देव थरहर पग लागे । परसत चरण सकल भगभागे ॥
अजहरवचन ।
अजहर सबे कहे हरसेती । सबे शरण गहो यही सुनेती ॥
दोहा-ब्रह्मा विष्णु महेश्वर, सबन कृष्ण समुझाय ।
फिर यह अवसर कहाँ मिले, गहो कबीरके पाँव ॥
हरषत अजहर लीन्हो पाना । नारि पुरुष एक मत निरवाना ॥
चरणाभूत सबहिन कहँ दीन्ह। सबन माँग प्रीतिसो लीन्ह। ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर सुनो त्रियदेवा । आपन अंस रचहु जग सेवा ॥
ठीका पुरे तुम लोक सिधावो । पितुके सेवा अंस बैठावो ॥
सट्टरु भाकि हृदय महँ राखहु । मात पिता सेवा सत भाषहु ॥
माता पिता सबे भल होई । सट्टरु सेय तरे कुल दोई ॥
काम क्रोध आपा घट काढव । सेवा साध सखा घर बाढव ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१३७
कहैं कबीर सत्यकी चाली । तरे शिष्य ठागे सुर नाली ॥ सत्य कहे होय कारज जिवके । सत्य गहे मिलिहै निज पियके ॥
दोहा-सत्य ताहि कहैं कहिये, रती न मिथ्या जाहि ।
कहैं कबीर कृष्णगीता, विष्णु व्यास चित चाहि ॥
कहैं कबीर सुनो सब कोई । भाषों काया प्रचे सोई ॥ काया सो जो अमर ना रहई । जिवरा योनी नहि औतरई ॥ षोडश शशि सोहंसन भाला । चकित चंद है कलात्रियभाळा ॥ यनिमाली कंठ माल विराजे । कोटिन रवि शशि नखछविछाजे ॥ छत्र सिंहसन जगमग जोती । हंस खान शशि तिहुँ पुर पोती ॥ अमरलोक सो अमर हंसा । अमृतफल भोजन निहंससा ॥ अमर चीर तन विमल विराजे । देह सुवास प्राणमें छाजे ॥ श्वेत भंवर पंकज विन नाला । अभी सिंधुतट कुंज रिसाला ॥ कमोदनि विमलश्वेत उजियारी । मन पृथ्वी तन फल फुलवारी ॥ विमल सुगंध विटप फलपाता । पक्षी केलिकरें रंग राता ॥ त्रिधि विहंगम मय कर जूहा । चंद उदै फल फूल सबूहा ॥ विहसहि हंस महा रस खानी । दसनपांति मन जगमग वाणी ॥ काया अमर सुगंध अंजोरा । योजन शत सुवास धनघोरा ॥ हंस काया अस अमरलोक । परस पुरुष पद हंस निसोका ॥ यह शोभा संक्षेप वखाना । अद्भुत शोभा अकह अंमाना ॥ सत्यनामका लेय परवाना । निराकारका मर्दन माना ॥ सो पावे यह काया भाई । कहैं कबीर जिन मोहि लौलाई ॥ कोट सूर्य छवि हंसन काया । बहुत अंजोर संक्षेप सुनाया ॥
ब्रह्मा और कबीर सम्वाद - लोक द्वीपका वर्णन
१३८
कबीरकृष्णगीता ।
दोहा-सत्यनामके एक रोम छवि, तुले न कोटि अनंत । अदुत शोभा कह कहों, कोट अनंत सूर चंद ॥ शीतल रवि सतलोक मझारा । अगिनसूरज भयो तब निराकारा अगिनको रास निरंजन काया । अभितरास पुरुष पगु छाया ॥ हंसन काया कंचन सूंचा । कोटिन रवि विधि सरिस न पहुँचा विष्णुके काया कंचन आभा । जैसे अन्नके अगुवा भाभा ॥ स्याम भये हरि पितके खोजा । अरि विष झार स्यामतन बोजा ॥ ब्रह्मा ताम रुद्र तन लोहा । लरगा इंद्रका मत फंद मोहा ॥ प्रेत खान विष्टाके देहा । नरक देह नर नार उरेहा ॥ चौरासी लक्ष योनी खानी । नरककी नार सो अंकुर जानी ॥ कोइ एक हंस अंकुरी होई । अंकुर पावहिँ अभिष न जोई ॥ अंकुरी जो भजे सतनामा । तो सब सुधरे वाको काया ॥ सत्यनाम कबीर बखाना । कहैं जनार्दन वचन प्रवाना ॥
विष्णुवचन ।
कहैं विष्णु सुन नारद व्यासा । नाम कबीर भजो सुखरासा ॥
दोहा-सकल जीव गायत्री, बांध निरंजन राय ।
सत्यकबीर सो रक्षक, कहैं कृष्ण समुझाय ॥
ब्रह्मावचन ।
ब्रह्मा कहैं सीस सुई लाई । सत्यकबीर मोहिँ कहहु बुवाई ॥
केतिक दूर आहि सतलोक । जहां रहहिँ सब हंस निसोका ॥
सत्यकबीर सत्यपुरुष अमाना । न्यारा सबसे सकल अमाना ॥
अजर अमर सत्पुरुष अजावन । जिन भज सतकबीर गुरुपावन ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१३९
कहैं ब्रह्मा हम सब बड भागी । उवरे चरण कबीरके लागी ॥ पायउं सुत्कको खान प्रवाना । जीवत सुत्क भये अज जाना ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो चतुरानन । सत्यनाम भज मन वच करमन ॥ एक आस सत्यनामकी कीरये । और आस सकलो परिहरिये ॥ सत्यनामते अधिक न कोई । सत्यनाम भज अविचलहोई ॥ अब तुम सुनहु लोक जत दूरी । गुरु ज्ञानीको हाल हजुरी ॥ निर्जनके सुखसे बाहर । सत्यलोक अमरपुर ठाहर ॥ सात तबक नभ सात पताल । चौदह यम विच जीव विहाला ॥ चौदह तबक चौदह यम ईशा । यमकी सेना रोम तन दीसा ॥ सिद्धदास सतनाम कबीरा । गज रथ यम सैना घर चीरा ॥ पृथ्वी उर्ध योजन लक्ष मेघा । तासु पुन नभतर विषेधा ॥ रवि उर्ध लक्ष योजन है चंद । चंद उर्ध तन नखत अनंदा ॥ तेइस लक्ष योजन उर्ध अपक्षरा । तेहि तत उर्ध सुरासन ठहरा ॥ सूर आस तत उर्ध यम साला । तेहि तत उर्ध निर्जन काला ॥
दोहा—ताके आगे तत दूरी, महाक्षेत्र सो नारि ।
तेहि तत मानसरोवर जहैं, कामनी रचि धमारि ॥ ताके आगे सहज सो दीपा । योगजीतके दीप सनीपा ॥ सबे दीप अग्र महकाई । घ्राण सुगंध सकल रहु छाई ॥ पुरुषलोक जाय सो हंसा । ताको तरे इकोतर बंसा ॥
ब्रह्मावचन ।
ब्रह्मा मम होय पगु धारा । कर जोरे भाभी स्तुति सारा ॥ कहैं ब्रह्मा धन्य कृष्ण व्यासा । जिन कियो प्रगट कबीर प्रकाशा
महादेव और कबीर सम्वाद - योगका वर्णन
१४०
कबीररुणगीता ।
कहैं अज सत्यकबीर संवादी । हम सब शिशु क्रीतमलघुवादी ॥ अन चीन्है हम बाद बहु कीन्हा । बरुसहु सत्यकबीर प्रवीना ॥ अब तो शरण तुम्हारी आये । यम अवगुण क्षमा प्रभु लाये ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुनो अज वाणी । मात पिता शिशु घट नहिं यानी ॥ जो हम क्रोध करो तुव सबपर । को तोहिराख सके अज हरिहर ॥ तुन तीनोंके पितु महकाला । निराकार सब करे विहाला ॥ हम तुम सबको प्रथम चेतावा । गहो शरण होय जिव सुत्कावा ॥ तब तुम गर्भवासमहैं भूले । ताते फिर २ योनी झूले ॥ जब सिर टेकेउ ऋषिदेव कारा । तब कबीरके शरण पवैरा ॥ कबीरके नाम शरण प्रतापा । उलटहिं जाय कालहिं चांपा ॥ कहैं कबीर सुनहु तुम चित दे । हृदय कबीर नाम जप हितकै ॥ जो जेहि नाम सुमरे चितलाई । हृदय कबीर नाम लौलाई ॥ दोहा-निशि दिन सुमरहु नाम मम, यमते रहहु निसंक ।
शब्द निरख पंथ गवनहु, गुरु पितु जेहि न कलंक ॥
चरण चूम अज सीस चढाये । तत्क्षण रुद्र जो गमन लाये ॥ कहैं महादेव विनय बहूता । कहहु कबीर योग सतमता ॥ केतिक स्वास चले दिन राती । किम घर बरे तेल विन वाती ॥ केते हांथ धरती आकाशा । कौन देवको कहां निवासा ॥ केतिक नदी केतिक गिरवरतन । कौन सिंधुको गाय कहावन ॥ कौन अमावस कौन परीवा । कौन पुत्रवा कौन ग्रह धरिवा ॥ केतिक रुधिर कायाभैं आही । वगन ओंकार फेर कित आही ॥ पांच तचहैं काहे नामा । और पचीस नाम पंच बाभा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१४१
काया माहिं कै अंस हैं ताता । सोकहु कै अंस आहिं तन माता ॥ कौन तत्त केहि जोनी साजा । योग भलाके भोगे राजा ॥ श्रुतुक मरे जरे तन क्षारा । परम पुरुष होय तनते न्यारा ॥ कौन देह धरि नरक भोगाई । को है सेवक लेय भिलाई ॥ चौदह सुवन कायामहैं काही । कहिये तन प्रचे मोहि पाही ॥ पांच सत्तका रंग कौन है । विन मंदिरका है सो कौन है ॥ कौन योगीको सिंगी बजावे । कौन आसन कौन विभूत रमावे ॥ काहेकी डिब्बी काहेका ढकना । कौन बेगाना को है अपना ॥ कौनसो चावल कौनसो दाली । कौनसी अगिन जात कहिवाली ॥ कौन कपिल को देवता आही । केतिक अनपा कहाँ जपाही ॥ विनती कर शिव पूछहिं भेऊ । कहैं कबीर सुनहु सब कोऊ ॥ योग यज्ञ तप तीर्थ कर्म काटा । यह मत चलि जिव बारह वाटा ॥ सार भक्त विन तरे न कोई । चहुं युग भक्ति श्रेष्ठ गुरु सोई ॥ कहैं कबीर सुन प्रेतके ईशा । गहहु देव पथ तारहु सीसा ॥ तुम सब लीन्ह पान परवाना । भक्ति चावल चित तज मम कामा ॥ एक २ अंश देहते काढहु । तेहि पितु सेव राख पितु बाढहु ॥ दोहा—अपनी अकित दुतिअन, सिरजा तीनो देव । बनिजा तीनो छट्टुर मिले, क्रीतम देव पितु सेव ॥ छै सौ बीस सहस्र इकईसा । येतिक स्वास दिवस निशि ईसा ॥ मनु पवनाको धायियो तारी । विना तेल औ दीपक वारी ॥ साठे तीन कर क्षीनीजहैंथा । आंगुर चार अकाशको माथा ॥ मल निकास बछ गनपत राजा । रिद्ध सिद्ध समसावत्री विराजा ॥ सकल सिद्ध मिल गुरुपद सेवा । गुरु विन गनपति भक्ति बहेवा ॥
१४२
कबीरकृष्णगीता ।
पृथ्वी तत्त्व तिष्ठत तेहि बारिज । पृथ्वी समान साध तेह कारिज ॥ सोह चतुरदल विधु सूरंगा । नाम बीच अजपा सोहंगा ॥ सोहंगका विन डोर कमला । जपे सो अमृत नाम दयाला ॥ षट्पत्रपद इंदी अस्थाना । बला सावित्री तहँवा जाना ॥ रजगुण पीत वरण सो पंकज । षट्सहस्र अजपातहँआपअज ॥ आप तच तहँ कीन्ह निवासा । विषै निरंजन काम यम फांसा ॥ केवल सो अष्टदल नील सुरंगा । विष्णु देवता लक्ष्मीसंगा ॥ सबगुण षट्सहस्र अजपा जप । सत्यनाम सम नहिँ कोइ तप ॥ वायु तत तहँ गांठ वंधानी । नाभचक पवना घर जानी ॥ कीतम घर तन पवन सोहंगा । आद अमर घर सदुरु संगा ॥ जाके बस सोहंग है भाई । सोई सत्यकबीर गोसाई ॥
दोहा--आद पवन सोहंग है, क्रीतम वायु तत पांच ।
जहांते सोहंग ऊपजा, कहैं कबीर सो सांच ॥
शिव शारदा दस हियकमला । स्फटिक वर्णअतिसोहेपदअमला तेज तत वडवानल चितंगी । हृदय दरश गुरु सदुरु संगी ॥ षट्सहस्र अजपा तहँ होई । शिव सक्ती गुरु शिष्यधरसोई ॥ द्वादसदल पंकज कंठ अथर । तत अकाश त्रिगुण मनस धर ॥ अय परम शिव दस द्वादसी । स्वांतकीलक्ष्मीमहाविष्णुसंगवसी एक सहस्र अजपा तहँ होई । सञ्ज रंग बरते पद सोई ॥ सञ्ज स्याम जेठ लघु भाई । सञ्ज रिस्वाम लखि जाई ॥ कंठ केवल दल षोडश पूरा । तहां वस्तु जिवसकलरंगसूरा ॥ अजपा छै सो नाम विहंगा । सुरत निरत सो सदुरु संगा ॥ भंवर गुफा दोय दल पद सोहा । परमहंस बसे नृप निरमोहा ॥
कबीरकृष्णगीता ।
१४३
एक निरमोह सुरत सतनामा । दुतिय निरमोह कबीरशिष्यराभा स्याम लालभी रंग सोहाई । अजपा सहस्र कबीर लखाई ॥ सहस्रकमलदलाझलमिलझलके । मन पवन झीर मानसरोवरसे ॥ सुरत कमलपर सट्टुर वासा । एक सहस्र अजपा प्रकाशा ॥ गुन गुहिंज निरगुण सरबादी । शब्दसरूप सुरत संग स्वादी ॥ वतिस पट्टम पत्र गुण गाना । सुखा कंबल गुरु दरश पयाना ॥ दलअसंख्यकोकरवलसो भूला । जेहि २विन शून्य २ अस्थूला ॥ असंख्यदलकंबलकेदेखहुआगे । सतसाहेब दसमे बढभागे ॥ सतसाहेब सतनाम कबीरा । कहै कबीर हम सकल शरीरा ॥ हंस हमार सकल भत ताते । जीवधातके निकट न जाते ॥ कहै कबीर सुनो वृषवासन । काया लखहु देवन जहँ आसन ॥ अट्ट कोट पर्वत तहँहाडा । नौ सौ नदी समानीजेहिभांडा ॥ ज्ञानहीन जिव रात अमावस । पूनम चाँद गहुजगतगुरुआवस ॥ गुरु सट्टुर कबीर मिल तरना । कलश सवांरहु रतन सुवरणा ॥ सवा हाथ नभको गगन घर । वरणहु एक २ सुन संकर ॥ पृथ्वी आप तेज वायु अकाशा । यही नाम पंच तत्व प्रकाशा ॥ और सुनहु पांचहुके भाजा । ताते जीवन पोत दो मरजा ॥ पृथ्वीतत्वकी सुनहु प्रकृती । गुरु प्रताप कहैं संतन जीती ॥ असत भेद नारि तुच रोमा । बंधु पंच यह पृथ्वी तत भोमा ॥ लाल भसेव सुकल सोभ सुनं । पंच बंधु वह आपकी सुनं ॥ वायु तत्तकी भारजा बोली । लिये पवन फिरे उठन खटोली ॥ गावन धावन बोलन अगोचर । अटवा नतसी प्राणन दूसर ॥ क्रीतम वायु पंचतत्त संग तेहि बंधु।तेहि मुख बैन बोले भज नंद ॥
१४४
कबीरकृष्णगीता ।
नासिका वाट आवे जाई । रमता राम स्थिर न रहाई ॥ स्थिर पुरुष सत्यनाम कबीरा । मरे न जरे न धरे शरीरा ॥ तेज तत्तकी बंधु कहाई । तृषा क्षुधा आलस जमुहाई ॥ निद्रा मिल पांचो तजे दासी । नाम भक्त विन यमकी फांसी ॥ लज्जा शंका हर्ष शोक मोहा । यह अकाश बंधु संदोहा ॥ कहे कबीर सांचा मोहि भावे । सांचा सो जो सद्गुरु गुण गावे ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर हम नाम लखाई । सद्गुरु विन कोइ सुक्ति न पाई ॥ मम भये शिव नाचन लागे । कर गहि हरको दुलारन लागे ॥ सुनहु शंभु पूछहु प्रचारई । इतना सुन नाचत हो भाई ॥ जो पूछेहु तेहि महाँ कछु बाकी । सो सुन लेहु मह पंथ ताकी ॥ दूत तुम्हार फिरहि संसारा । पुण्यहि पापी दोनो लै जारा ॥
महादेववचन ।
कहे महादेव सुन सतनामा । तुव सेवक जो हम तेहि कामा ॥ पाप पुण्य है त्रिगुण बाजी । बेद ठेल त्रिपतात्रिक साजी ॥ पाप पुण्य है यमके खेती । दया सत् प्रधारथ सुनेती ॥ हमहु चले कुपंथ ढर ताता । तापर प्रबल अष्टंगीमाता ॥ अपने पुत्रहि जो धर खाई । आनहिं कस छोडे भाई ॥ पितु आज्ञा हम बहु जिव चांपा । परे आन हमरे सिरपापा ॥ ताते शरण तुम्हारी आये । काल पितारे आप बचाये ॥
कबीरवचन ।
कहे कबीर भल होय सब केश । जरा मरण सतनाम निबेरा ॥ अब तुम जात भातु तन बूझहु । तन स्वासा स्वासा गम सुझहु ॥