कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 159, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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एकको लोहु एकको पानी । दौय मिल सिरजा विदेहनिस्सानी ॥ निहअक्षर निहतत्तसो निरगुण । अमी नीर विन कुंभक सरगुण ॥ सट्टुर शब्दसे खागी धरनी । उर्ध्व सुरत सोहंग परवनी ॥ पितुके बुंदसो हाड औ गूदा । मांस रक्त औ येद औजूदा ॥ पुन पितु अंस रुधिर तन तबलों । तबलहि तन श्रोनित जिव जबलों ॥ चार अंस तनमहँ पितुकेरा । पांच अंस माता वन घेरा ॥ एक अधिक माता गुण भयऊ। चित देखो पन सतगुण कियऊ ॥ पौन आगे परा चल पाछे । धरिया माहिँ तन कछनी कांछे ॥ पिता पौन ले सांचहि दारी । तब जिव परा परातम नारी ॥ आतम परमातप जिव संग। नांद बिंदु मिलना मत रंगा ॥ अब जो अंस सुनहु शिव आही। जे जननी सो जो इन होय खाही ॥ जेहि जननी तन पांच प्रकृती । रोम चाम नख दंत भगोती ॥ जत द्वार तन तत भग जानी । आद लिंग सोहंग बखानी ॥ आठो पहर करे रति सोई । आवागवन महा दुख होई ॥ जबलग अमरलोक नहि पहुँचे । आवागौन भग भोगि विगूचे ॥ भक्त करे तो बारहि नीकी । भक्त बिहून सकल जग फीकी ॥ कीतम निरंजन पितु मम आही। तनके मात पिता यह साही ॥ जीव सब सत्यनामके आही । सत्यकबीर सतनाम लखाही ॥
महादेववचन ।
कहैं शंखु संसे गढ़ मोरी । तुम दयाल मम बंदीछोरी ॥ अब साहेब कहु जीवत लेखा । कौन तत्त कोहि जोनि परेखा ॥