कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 160, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ें१४६
कबीरकृष्णगीता ।
कबीरवचन ।
कहैं कबीर सुन उमापति ईशा । नरतन त्रिगुण पांच पचीसा ॥ चार खान महैं नर तन ईशा । सकल भेद जानहु जगदीशा ॥ नरपिंडज चौरासी नारा । नाम भक्त बिन यमके चारा ॥ पिंडज गौ गज चौपग पहिषा । अरना बाध सिंह बनगोहिषा ॥ श्वान मंजार अजिया सुत बीगा । पृथ्वी आप वाय तेज अंगा ॥ त्रिगुण भेराय सकल जिव दीन्हा । सतगुण रज तम भासे चीन्हा ॥ रजगुण बहु छल झूद परबंदा । रोग वियोग भोग यमदंडा ॥ मिथ्या बोल सोग संतापा । छुतहिँ छूत जिव छूतहिँ थापा ॥ वैष्णवसे नहिं नवीहिं अभागे । वैष्णवन असंखहिं द्विज नागे ॥ तिनहु भागह बड वैष्णो बखाना । जीव दया कथि जग पतिथाना ॥ बहुर युद्ध महाभारथ करावा । तब करता हरि धका दियावा ॥ कृष्ण सीस जब वसे कबीरा । तबलग्ण राम कृष्ण मत धीरा ॥ निरंजन अधा परवेसा । तब से कृष्ण कालकर भेसा ॥
दोहा—जबलग्ण जाकर नाम लिख्य, तब लहि तेह यह सोय कहैं कबीर मोहिं सुमेर, एकमत सब सुख लोय ॥ पांच तीनकी काया कांची । अमरपुरी अमर तन सांची ॥ सतगुण सत्यकबीरके आसा । निरंजन अवा रज तम फांसा ॥ जैसे तुलसी भांमे राई । औ गुर राम तुलसी सार लाई ॥ रज तम गुंभा भांग बखाना । भांग महादेव अज गुमा जाना ॥ तुलसी विष्णु अंस विनाशी । औ अविनाशी कबीर सुखराशी ॥
दोहा—कहैं महादेव विष्णु अज, सुन सतनाम कबीर। निराकार डहनसे, राख लेहु गुरु पीर ॥