कबीर कृष्ण गीता
Kabir Krishna Gita
युगल आनंद विहारी द्वारा
स्रोत: Kabir Krishna Gita - Yugal Anand Vihari · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 168 में से
संदर्भ में पढ़ेंकबीरकृष्णगीता ।
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कबीर वचन ।
कहैं कबीर सुनहु त्रिय देवा । सब मिल करहु साधुकी सेवा ॥ जगमहैं वैष्णव भेष मम दासा । प्रेमवस भये ताके पास ॥ सत रज तम जिव सबहैं मेरा । अभष पंथ राक्षस जिव चेरा ॥ वीज वंस तेहि रहे न कोई । मीन गऊ वध जत जिव खोई ॥ सतगुणको सो भाव बखानी । रज तम तज सतपंथ चल्लानी ॥ सत्य दया पर आतम पूजा । सदुरु साथ चरण मन बूझा ॥ सकल देव मिल निरगुण नामा । कबीर अंस तन रमता रामा ॥ सबसे प्रेम क्षमा धीरज तन । अपने जानत न दुखवैं काहु मन ॥ कौनहु जीव जंतु न दुखवैं । समष्टी निज सबपर भावे ॥ काहूके तन मांस न खाई । मीन मास मद निकट न जाई ॥ वृत्त मिष्टान्न पान फुलवारी । यह सब सात्वकी भक्ष विचारी ॥ अभ्यागत आवे कोइ बरणा । सबकर पोषन सब मिल करना ॥ सात्वकी चाल मुक्त नर नारी । रज तम भौ सब भ्रम संसारी ॥ भक्षित भाव गलतान लिय नामा । परनारी द्रव्य अपंथ कर कामा ॥ कच्छ मच्छ सकलो जिवजंता । सब जिव परा क्षमा शुभ संता ॥ तीर्थ व्रत तप त्रिगुण जोगा । बनोवास अधर्म तज भोगा ॥ भोग सात्वकी भजन सतनामा । इच्छा दशा समर्थ निहकामा ॥
कृष्णवचन ।
कहैं कृष्ण पुलकित होय वाणी । सत्य कबीर तुमहिं सुख खानी ॥ हम सब कहैं तुम दीन्ह बढाई । आप दास होय सेवा लाई ॥
कबीरवचन ।
कहैं कबीर बडेकी रीती । सब जिव पोषव सबसे प्रीती ॥