कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 104, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंबहुतेरी वस्तुएँ निकलीं, जिन्हें लोग चौदह रत्न कहते हैं। फिर उन सब वस्तुओंको तीनों भाइयोंने ज्योंका त्यों लाकर अपनी माताके समक्ष रख दिया। तब उनकी माताने उन वस्तुओंको उन तीनोंमें बाट दिया। सरस्वती तथा चार वेद ब्रह्माके भागमें आये, लक्ष्मी विष्णुके बखरोंमें पड़ गयी और सती शिवको मिलीं। तीनों भाई पत्नियोंको पाकर अत्यंत हर्षित हुए इन्हीं तीनोंके वंशसे समस्त संसार है।
तीसवाँ प्रकरण
ब्रह्माका वेदपाठ और पिताकी जिज्ञासा।
जब ब्रह्माने वेद पाया और उसको पढ़ा तब उसमें देखा कि, एक विराट पुरुष है जिसका शिर आकाशमें और पावें पातालमें, चारों दिशा उसके कान और सूर्य चन्द्र उसके नेत्र हैं—
ब्रह्मा वेद पठन तब लाग। पठत वेद तब भा अनुरागा।
कहे वेद पुरुष इक आही। है निरंकार रूप नहीं ताही ॥
शून्य माहि वह जोत दिखावे। चितवत देह दृष्टि न आवे ॥
स्वर्ग सीस पग आहि पताला। तेहि मत ब्रह्मा भौ मतवाला ॥
चतुरानन कहि विष्णु बुझाया। आहि पुरुष मोहि वेद लखाया ॥
पुनि ब्रह्मा शिवको अस कहई। वेद मथत पुरुष इक अहई ॥
(अनुराग सागर)
तब ब्रह्माने विष्णुसे कहा कि, देखो भाई विष्णु ! वेद इसी विराट पुरुषको बतलाता है और भाई शिव आप भी सुनो और देखो; वेद बतलाता है कि, एक पुरुष ऐसा है जिसकी मूर्ति शून्यमें दिखाई देती है। तब ब्रह्मा अपनी माताके समीप जाकर कहने लगे कि, हे माता ! वेद बतलाता है और उसमें स्पष्ट लिखा है कि, एक पुरुष है और तू कहती है कि कोई नहीं; यह बात सुनकर अध्याने कहा कि बेटा, ! यदि तुझको अपने पिताके दर्शनोंकी अभिलाषा है, तो तू अक्षत तथा पुष्पादि लेकर जा और उसका दर्शन तथा पूजाकर आ। माताकी आज्ञा पातेही ब्रह्मा अक्षतादि लेकर उत्तरकी ओर चल पड़े और जाते जाते उस स्थान तक पहुँचे जहाँ तनिकभी सूर्यकी ज्योति नहीं थी, और पूर्णतया अंधकार था—वहाँ पर जाकर ब्रह्मा अपने पिताके दर्शनकी कामनासे समाधि लगाकर बैठ गये ॥