भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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अन्तमें सब भ्रमही भ्रमकी बातें ठहरेंगी । जबतक मनुष्यमें निर्मल विचार नहीं आता, जबतक मिथ्याको सत्य तथा सत्यको मिथ्या मान रहा है और यथार्थतासे वंचित है ।

अष्टाईसवाँ प्रकरण

वेदोंकी आज्ञाका पालन कहाँ और कबतक अवश्यमेव माननीय है ? उनचास करोड योजन निरञ्जनका शरीर है । सो हमारा यह ब्रह्माण्ड है और इस ब्रह्माण्डके रहनेवालोंके निमित्त इस वेदका अनुसरण करना उचित ठहराया गया जबतक मनुष्य इस ब्रह्माण्डके भीतरके पदार्थोंमें आसक्त रहेगा तबतक इसके भीतर बन्द रहेगा और वेदोंकी आज्ञाओंका अनुसरण करनाही पड़ेगा, जैसे यह ब्रह्माण्ड उनचास करोड योजनका है वैसे ही इस ब्रह्माण्डसे दूना कूर्मजीका शरीर है । इस कारण वह इससे बड़ा ब्रह्माण्ड है । इस प्रकार कोई बड़ा कोई छोटा अगणित ब्रह्माण्ड हैं उन अगणित ब्रह्माण्डोंमें अनन्त प्रकारकी रचनायें हैं, जिनका विवरण हो नहीं सकता । प्रत्येक ब्रह्माण्डके निमित्त एक एक शासक तथा राजा हैं जो, उनके ईश्वर कहलाते हैं और उन ब्रह्माण्डोंके रहनेवाले उसीको अपना कर्त्ता तथा स्वामी जानते हैं । जैसे भेड बकरियाँ अपने चरवाहेके अतिरिक्त दूसरेको नहीं जानतीं; यही अवस्था अल्पज्ञोंकी है, वे क्या जानें कि, असली परमेश्वर क्या है ?

उनतीसवाँ प्रकरण

समुद्रमंथन तथा तीन कन्याओंका वृत्तान्त ।

*अब पहला विवरण पुनः आया । देखो ग्रन्थ स्वासगुञ्जार और अनुरागसागरमें लिखा है कि, जब इस प्रकार वेद प्रकट हो गये, तब, निरञ्जनने यह काम किया कि, चारों वेदोंको आज्ञा दी कि, तुम जाकर समुद्रमें छिप रहो । उधर आदि भवानोंने अपने शरीरसे तीन कन्याएँ प्रकट कीं और उनको आदेश दिया कि, तुम समुद्रमें जाकर छिप रहो । अपनी माताकी आज्ञा पातेही वह तीनों कन्याएँ जाकर रत्नाकरमें छिप गईं । यह कौतुक जो अध्याने किया इसे ब्रह्मा विष्णु महेश तीनोंने नहीं जाना । इसके उपरान्त निरञ्जनने अध्याको कहा कि, वह अपने तीनों पुत्रोंको समुद्र मथनेकी आज्ञा देवे । तब अध्याने तीनों पुत्रोंसे कहा कि, तुम जाकर समुद्र मथो और तीनोंने ऐसाही किया । समुद्रमेंसे