भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 109

माताके पास जाकर सत्य २ कहो— सावधान झूठ न बोलना । जब विष्णु पातलसे पलट आये और माताने पूछा कि, हे विष्णु ! अपने पिताके दर्शनका विवरण कहो । तब विष्णुने कहा कि, माता मैंने अपने पिताका दर्शन तो नहीं पाया उलटा शेषनागके विषकी तीक्ष्णताके कारण मैं अचेतहो गया और मेरे शरीरका वर्ण बदल गया । यह बात सुनकर अच्छा अत्यंत हर्षित हुई और कहा कि, वत्स ! तूने नितान्तही सत्य बात कही—मैं तुझको तेरे पिताका दर्शन करादूंगी । इसके उपरान्त उसने विष्णुका मुंह चूमा और बड़ा लाड प्यार किया और आशीर्वाद देकर कहा कि बेटा ! तू त्रिलोकका राज्य करेगा समस्त मनुष्य तथा देवता तेरी बंदना करेंगे और तू सकल सृष्टिका पालक होगा, सब तेरे अधीन तथा आज्ञाकारी होंगे, ब्रह्मा तथा शिव दोनों तेरी आज्ञा मानेंगे और तेरी अधीनता करेंगे ।

छतीसवाँ प्रकरण

विष्णुको पिताका दर्शन होना

हे पुत्र ! मैं तुझको तेरे पिताका दर्शन, दोनों रीतियोंसे कराती हूँ तू अपने पिताको अपने मनके भीतर भी देख और जहाँ वह सिंहासनाखूढ है उस स्थानको भी देख । इतना कहकर अद्याने विष्णु पर अति प्रसन्नतासे निरञ्जनका दर्शन करा दिया । देखो अनुरागसागर ।

पुनि कहि अस आदि भवानी । अथ मुनहु पुत्र प्रिय मम वानी ॥
देखु पुत्र तोहि पिता भेटाऊँ । तोरे मनकर धोख मेटाऊँ ॥
प्रथम ज्ञान दृष्टि कर देखो । मोर वचन हिये परेखो ॥
मन सरूप कर्ता कहैं जानो । मनते दूसर और न मानो ॥
स्वर्ग पताल दौड मन कोरा । मन इस्थिर मन कहे अनेरा ॥
छन महैं कला अनन्त दिखावे । मन कहैं देखि कोइ नहि पावे ॥
निराकार मनहीको कहिये । मनही आश दिवस निश्चिरहिये ॥
देखहु पलटि शून्यमहैं जोती । जहवाँ झिल मिलि झालर होती ॥
फेरहु श्वास गगन मह धाओ । मार्ग आकाशहिं ध्यान लगाओ ॥
पुनि माता काँह विष्णु दुलारा । मरद्यो मान जेठ निज बारा ॥
अहो विष्णु तुम लेहु असीसा । सब देवन महैं तुमही ईसा ॥