भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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जो इच्छा तुम चित्त महँ धरिहँ। सो सब तोर काज में कारिहँ ॥
देवन श्रेष्ठ तुम कहँ मनिहँ। तुम्हरी पूजा सब कोई ठनिहँ ॥

(अनुराग सागर)

विष्णु जब अपने पिताका दर्शनकर आनन्दित हुए तब विष्णु निरञ्जन और अद्या तीनों एक स्वरूप हो गये और ज्योतिमें ज्योति ऐसी समागयी कि, तनिक भी विभिन्नता नहीं रही। ब्रह्म, माया तथा जीव तीनों एक स्वरूप हो गये। यही पिता पुत्र तथा पवित्र आत्मा हैं। इन्होंने तीनों द्वारा बनेहुए परमेश्वरकी सूचना वेद देता है—और ऐसे ही खुदाका विवरण इञ्जीलमें लिखा है। जब ये तीनों एकत्रित हो जाते हैं तब सृष्टिका पता ठिकाना नहीं रहता और जब ये तीनों अलग २ होजाते हैं तब समस्त सृष्टि प्रगट हो जाती है। अद्याकी कृपासे विष्णु अपने माता पिताके समान बलिष्ठ तथा प्रभावशाली होगये। और इस-प्रकार निरञ्जन तथा अद्याने विष्णुको समस्त संसारका अधिकारी बना दिया और तीनों लोकके कत्तधितर्की पदवी प्रदान किया।

सैतीसवाँ प्रकरण

शिवका शाप और बर पाना ।

इसके उपरान्त अद्या शिवके समीप गयी और कहा कि, हे पुत्र ! मैंने अपने दो पुत्रोंको तो मार्ग बता दिया, उन्हें जो कुछ कहना था तो कह चुकी, अब तूभी अपने पिताका समाचार कह कि, तूने किस प्रकार अपने पिताका दर्शन पाया और किस प्रकार उसकी पूजा की ? यह बात सुनकर शिवजी चुप रह गये और मिथ्या तथा सत्य कुछभी न कहा—तब अद्या बोली कि वत्स ! तूने मौन धारण कर लिया और मिथ्या तथा सत्य कुछभी नहीं कहा—इस कारण तू योगसमाधिकर, शीशपर जटा रख, और शरीरमें भस्म रमा, तू क्रोधी तथा तेरा वेष भयानक होगा। तेरे अनुयायियोंमें जाति पातिका ध्यान नहीं रहेगा, अब और जो तेरे मनमें आवे सो मोंगले, मैं तुझको प्रदान करूँगी।

पुनि लहुरा कहै पूछे माता । तुम शिव कहो हियेकी बाता ॥
मोंगहु जो तुम्हरे चित्तभावे । सो तोहि देउँ मातु फरमावे ॥
दोई पुत्रन कहैं मता दिढावा । मांग महेश जोई मन भावा ॥
जोरि पानि शिव कहवे लीना । देहु जननी जो आज्ञा कीन्हा ॥
कबर्हि न विनसे मेरी देही । हे माता मोंगौं बर एही ॥