कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
प्रथमावृत्तिका मंगलाचरण
जो इच्छा तुम चित्त महँ धरिहँ। सो सब तोर काज में कारिहँ ॥
देवन श्रेष्ठ तुम कहँ मनिहँ। तुम्हरी पूजा सब कोई ठनिहँ ॥
(अनुराग सागर)
विष्णु जब अपने पिताका दर्शनकर आनन्दित हुए तब विष्णु निरञ्जन और अद्या तीनों एक स्वरूप हो गये और ज्योतिमें ज्योति ऐसी समागयी कि, तनिक भी विभिन्नता नहीं रही। ब्रह्म, माया तथा जीव तीनों एक स्वरूप हो गये। यही पिता पुत्र तथा पवित्र आत्मा हैं। इन्होंने तीनों द्वारा बनेहुए परमेश्वरकी सूचना वेद देता है—और ऐसे ही खुदाका विवरण इञ्जीलमें लिखा है। जब ये तीनों एकत्रित हो जाते हैं तब सृष्टिका पता ठिकाना नहीं रहता और जब ये तीनों अलग २ होजाते हैं तब समस्त सृष्टि प्रगट हो जाती है। अद्याकी कृपासे विष्णु अपने माता पिताके समान बलिष्ठ तथा प्रभावशाली होगये। और इस-प्रकार निरञ्जन तथा अद्याने विष्णुको समस्त संसारका अधिकारी बना दिया और तीनों लोकके कत्तधितर्की पदवी प्रदान किया।
सैतीसवाँ प्रकरण
शिवका शाप और बर पाना ।
इसके उपरान्त अद्या शिवके समीप गयी और कहा कि, हे पुत्र ! मैंने अपने दो पुत्रोंको तो मार्ग बता दिया, उन्हें जो कुछ कहना था तो कह चुकी, अब तूभी अपने पिताका समाचार कह कि, तूने किस प्रकार अपने पिताका दर्शन पाया और किस प्रकार उसकी पूजा की ? यह बात सुनकर शिवजी चुप रह गये और मिथ्या तथा सत्य कुछभी न कहा—तब अद्या बोली कि वत्स ! तूने मौन धारण कर लिया और मिथ्या तथा सत्य कुछभी नहीं कहा—इस कारण तू योगसमाधिकर, शीशपर जटा रख, और शरीरमें भस्म रमा, तू क्रोधी तथा तेरा वेष भयानक होगा। तेरे अनुयायियोंमें जाति पातिका ध्यान नहीं रहेगा, अब और जो तेरे मनमें आवे सो मोंगले, मैं तुझको प्रदान करूँगी।
पुनि लहुरा कहै पूछे माता । तुम शिव कहो हियेकी बाता ॥
मोंगहु जो तुम्हरे चित्तभावे । सो तोहि देउँ मातु फरमावे ॥
दोई पुत्रन कहैं मता दिढावा । मांग महेश जोई मन भावा ॥
जोरि पानि शिव कहवे लीना । देहु जननी जो आज्ञा कीन्हा ॥
कबर्हि न विनसे मेरी देही । हे माता मोंगौं बर एही ॥
१ अध्याय, सृष्टि रचना
कह अष्टंगी अस नहिं होई । दूसर अमर भयो नहिं कोई ॥
करहु योग तप पवन सनेही । रहे चार युग तुम्हरी देही ॥
जौलों पिरथी अकास सनेहा । कबहुँ न विनसे तुमरी देहा ॥
तब शिवने कहा हे माता ! मेरे शरीरमें बड़ा बल हो और मैं अमर होऊँ तब अधाने कहा कि, हे पुत्र ! ऐसाही होगाः—निदान शिवजी बड़े वीर और अमर हुए विष्णु तीनों लोकके स्वामी तथा ब्रह्माकी संतान अर्थात् ब्राह्मण सब झूठे तथा धूर्त हुए ।
अङ्गीसवों प्रकरण
कर्मका बदला ।
विष्णुका शेष नागसे बदला ।
अब जानना चाहिये कि, विष्णुको शेषनागने जो कष्ट पहुँचाया था । उसके बदले तो शेषनागका अवतार कालीनागका हुआ । वह कालीनाग वृन्दावनकी यमुना नदीकी कालीदहमें रहा करता था और उसके विषकी ज्वालासे पशु पक्षी इत्यादि सब भस्म हो जाते थे । जब विष्णुने द्वारपर मैं कृष्णका अवतार लिया तब कालीनागको नाथा और अपने पुराने बदलेको पूरा किया और फिर प्रबल होकर शेषनागकी छातीपर अपना आसन जमाया, इस प्रकार बदला कभी किसीका नहीं छूटता ।
उनचालीसवों प्रकरण
विष्णुका ब्रह्माको आश्रय देना ।
जब ब्रह्माको माताने शाप दिया और जब उनको जान पड़ा कि, हमारी संतान द्वार द्वारपर भीख माँगती फिरेगी, तब वे अत्यंत दुःखित तथा मलीन मुख होकर विष्णुके पास गये और कहा कि, भाई आप बड़े भाग्यशाली हैं कि, माता आपपर दयालु हुई, हम तो उसके शापसे नष्टप्राय हो गये । हे भाई ! माताका क्या दोष है, यह सब अपनीही करनियोंका फल है । तब ब्रह्माको दुःखी देखकर विष्णुने उनको बहुत कुछ सन्तोष दिया और कहा कि हे ब्रह्मा ! आप मेरे बड़े भाई हैं और मैं आपका छोटा भाई हूँ, मैं आपकी सेवा तन मनसे करूँगा और जहाँ कहीं कथा कीर्तन होम और यज्ञ संसारमें मेरे नामसे होगा, सो सब ब्राह्मणों द्वाराही होगा, ब्राह्मण बिना कुछ न होगा, जो ब्राह्मणोंको प्रसन्न करेगा उससे
सत्यपुरुषका वर्णन सत्यपुरुषके प्रतिनिधि
में प्रसन्न रहूँगा। जो ब्राह्मणको दुःखी करेगा उससे मैं दुःखी होऊँगा। विष्णुसे यह बात सुनकर ब्रह्मा अति प्रसन्न हुए, और उन्हें निश्चय हो गया कि, अब हमारी संतान सुख पावेगी तथा प्रसन्नतापूर्वक जीवन व्यतीत कर सकेगी।
इस प्रकार तीनों भाई अपनी स्त्रियों सहित रहने और आनंद करने लगे। स्वयम् निरञ्जन तो शून्यमें जाकर शून्यस्वरूप होगये और तीनोंलोकोंका राज्य तथा शासन अपनी स्त्री अद्या और तीनों पुत्रों (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) को सौंप दिया बस ए ही चारों समस्त संसारके मालिक हैं।
चालीसवाँ प्रकरण
मायासृष्टिकी उत्पत्तिका वृत्तान्त।
इसके पहले मैं ब्रह्मसृष्टि और जीवसृष्टिका वर्णन कर आया हूँ, अब यहाँ से मायासृष्टिका विवरण करता हूँ —
मायासृष्टिका ऋष्टा स्वामी निरञ्जन है और इस मायासृष्टिकी उत्पत्ति स्थिति और विनाश सब कुछ कालपुरुष द्वारा हुआ करता है। ब्रह्म और जीव-सृष्टिका कभी विनाश नहीं होता, पर मायासृष्टिको इन्द्रजालियोंके सदृश काल-पुरुष उत्पन्न करता है और फिर समेट लेता है। जैसे भानमतीकी पेटारीमेंसे सब सामान निलकते फिर उसीमें समाजाते हैं, यही अवस्था उत्पत्ति तथा प्रलयकी है। इस मायासृष्टिका सदैव विनाश होता है और जन्म मरणका सब दुःख और सुख इसीमें है निरञ्जने जब मायासृष्टि रची, तब प्रथम कर्मका जाल बनाया। स्वर्गकी रचना की, भयानक तथा रौचक सब इस मायासृष्टिके निमित्त ठहराया और पिता पुत्र अर्थात् निरंजन और विष्णु राज्य करने लगे। निर्गुण तथा सगुण अर्थात् निर्गुण निरञ्जन जो परमेश्वर वा खुदा कहलाता है और सगुण विष्णु राम, कृष्ण इत्यादि सशरीर अवतारधारी परमेश्वरकी पूजा सारे संसारमें होनेलगी। निर्गुणको योगीलोग योग समाधि द्वारा पाते हैं और सगुण विष्णुको समस्त हिन्दू, मुसलमान, ईसाई और मूमाई पूजन करते हैं यह मायासृष्टि सदैव बंधनमें रहती है उसका छूटना महा कठिन है।
इकतालीसवाँ प्रकरण
मायासृष्टिका विवरण।
अद्या, ब्रह्मा, विष्णु और महेशने चार खान चौरासी लाख योनिकी
स्वसंवेदके प्राकट्यका वृत्तान्त
रचना की । यही चारों इस सूष्टिके उत्पन्न कर्ता हैं । अण्डज खानि को अद्याने उत्पन्न किया, अण्डजखान उसको कहते हैं जिसकी उत्पत्ति अण्डे, द्वारा होती है ।
दूसरे पिण्डज खानको ब्रह्माने बनाया—पिण्डज खान वह है, जो बच्चा देते हैं ।
ऊष्मजखान विष्णुने उत्पन्न किए—ऊष्मज खान वह है जो वस्तुओंके भले बुरे संयोगसे उत्पन्न होते हैं । जैसे मच्छड मक्खी इत्यादि ।
स्थावर खानके रचयिता शिवजी हैं और स्थावर खानमें समस्त जड-पदार्थ हैं ।
इस प्रकार इन चारोंसे चारखान चौरासी लाख योनिके जीव उत्पन्न हुए । इस प्रकार सब जीव सारे संसारमें भरगये । तब अद्याने अपने तीनों पुत्रों—को तीनों लोकोंका राज्य सौंप दिया और आप मथुराको छोड़कर कोट कांग-डामें गयी । फिर हिंगलाजमें जाकर रहने लगी ।
इधर तीनों भाई लोकोंपर राज करने लगे और नरक वैकुण्ठ इत्यादिका प्रचार हुआ और तीर्थ, व्रत, कर्म, धर्म, वेद पाठ इत्यादि संसारमें प्रचलित हुए तथा सिद्ध, साध, साधक इत्यादि सब प्रकट हुए । इस प्रकार तीनों देवताओंका राज्य पृथ्वी पर प्रचलित हुआ । उन्हीं तीनोंको समस्त मनुष्य जाति परमेश्वर जानने और उन्हींकी पूजा सेवाको सत्य मानने लगी और यही तीनों समस्त संसारके परमेश्वर ठहरे ।
बयालीसवाँ प्रकरण
वैकुण्ठका वृत्तान्त ।
वैकुण्ठ पृथ्वीसे साठ सहस्र योजन ऊँचा है—और दक्षिण और पूर्वके कोने पर ध्रुव भक्तका स्थान है । उसके दक्षिण और पश्चिमके कोनेमें अग्नि देवता रहते हैं उसके पूर्व और दक्षिणके कोनेमें राजा इन्द्र रहते हैं । यह वैकुण्ठ बड़ा सुन्दर स्थान है और विष्णुके रहनेकी जगह है । इस वैकुण्ठके बीचोंबीच विष्णुका सिंहासन स्थित है उस सिंहासनपर विष्णु महाराज विराजते हैं और सारे देवता, ब्रह्मा, महेश इत्यादि उनके दरबारमें उपस्थित रहते हैं । यही विष्णु परमेश्वर और सर्वशक्तिमान् इत्यादि कहलाते हैं । सातों आकाश तथा पृथ्वी पातालादि सब चौदहों भुवनमें आप आया जाया करते हैं । प्रत्येक स्थानपर विष्णु उपस्थित रहते और सब सिद्ध साधु इत्यादिको बन्दरके भांति नचाया करते हैं । यह विष्णु मायापति हैं, उनकी मायाने समस्त संसारको घेर रक्खा
ब्रह्मसृष्टिका वर्णन
हैं उनके विष्णुके हाथमें गदा—कौमुदा, चक्रमुदशंन, नन्दक—असि, शारङ्ग—धनुष्य और शंख पांचजन्य इत्यादि रहते हैं जिससे वे अपने वैरियोंपर विजय पाते हैं। इसी विष्णुकी पूजा समस्त संसार करता है, जहाँ २ कठिनाइयाँ आ पड़ती हैं वहाँ गुरुडपर सवार होकर विष्णु महाराज आन उपस्थित होते हैं और उस कठिनाईको सरल करते हैं। आपकी सवारीका गुरुड ऐसा शीघ्रगामी है कि एक पलभरमें सवालाख योजना उड़ जाता है। सप्तद्वीप, पृथ्वी तथा आकाश सब मानों आपके चरणोंके नीचे हैं और वैकुण्ठमें बैठकर सब जीवोंकी पाप पुण्यके हिसाब करते हैं, चित्रगुप्तजी आपके मंत्री हैं, सबके पाप तथा धर्मका खाता आपके पास रहता है। विष्णु महाराजकी आज्ञासे कोई नरक कोई वैकुण्ठ और कोई परमधामको जाता है। सब देवता ब्रह्मा शिव कुबेर इन्द्र इत्यादि विष्णुकी सेवामें सदा उपस्थित रहते हैं। यह वैकुण्ठ सुमेरु पर्वतके शिखरपर अत्यन्त सुन्दर बना हुआ है। विष्णु वैकुण्ठ तथा सब स्थानों पर व्यापक हैं। तीनों लोकके कर्ता धर्ता आपही हैं, जब कोई जीव पृथ्वीपर मरता है तब विष्णुके सामने उपस्थित किया जाता है और आपहीकी आज्ञासे पाप पुण्यका फल भोगता है।
तेतालीसवाँ प्रकरण
ब्रह्मपुरी कौलास, और अमरावती अदन इत्यादीका वृत्तान्त ।
ब्रह्माके लिये ब्रह्मलोक और शिवके निमित्त कौलास ऊपर बने, वैसेही पृथ्वीपर भी काशी धाम अत्यंत सुन्दर स्थान पुण्य धाम बना, जहाँ ब्रह्मा तथा शिव दोनों भाई विराजमान हुए। विष्णुने अपने निमित्त वैकुण्ठ बनाया और ब्रह्माके निमित्त आनन्दवनकी रचना की और यही आनन्द बन पृथ्वीपर वैकुण्ठ कहलाया।
अदन क्या है ?
पूर्वकालमें इसका नाम आनन्दवन था। आनन्द नाम हर्ष तथा प्रसन्नताका है और वन नाम वाटिकाका है, ये दोनों शब्द संस्कृतके हैं सो अरब-वासियोंको संस्कृतशब्दका विशुद्ध उच्चारण नहीं आनेके कारण आनन्द-शब्दका उलटकर अदन कर दिया और वनका अनुवाद फारसी तथा अरबीमें बाग है। यह आनन्दवन बड़ाही मनोरञ्जक स्थान विष्णुने तय्यार करके ब्रह्मा तथा सावित्री को वहाँ रखवा, जहाँ वे दोनों आनन्दसे रहा करते थे। इस आनन्द बनमें कल्पवृक्ष, अमृत और सुखविलासके सब सामान थे। उसी आनन्दवनको
१ अर्बीमें कल्प वृक्षको “दरख्शत तूना” कहते हैं। २ अमृत को अर्बीमें “आन कौसर” कहते हैं।
अब काशी कहते हैं और वाराणसीभी उसीका नाम है । क्योंकि, यह बरुणा और फारस तथा अरबके लोगों द्वारा शुद्ध उच्चारण न हो सका, इस कारण वाराणसीको लोग अब बनारसके नामसे पुकारते हैं ।
इसका समाचार तौरीतमें उत्पत्ति की किताबमें भी है कि, परमेश्वरने पूर्वमें अदनवाटिकाको बनाया, कारण यह कि, जहाँ तौरीत प्रकट हुई वहाँसे काशी पूर्व दिशामें है और इसीकी खबर मुसलमानों की हदीसोंमें है कि, आदम भारतसे मक्केका हज करनेके निमित्त गया था तथा पचास २ कोसपर इसका एक एक पग पड़ता था । कबीर साहबका कथन है कि, ब्रह्माहीको आदम कहा करते हैं, सो ब्रह्मा बनारसमें रहा करता था । इस आनन्दबनकी प्रशंसा काशी-खंड ग्रंथमें देखो । ब्रह्मा तथा शिव दोनों भाई वहाँ रहते थे । (सत्य कबीरका वचन, देखो ग्रन्थबीजक) ।
मरिगैं ब्रह्मा काशीके वासी । शम्भू सहित मुए अविनासी ॥
मथुरा मरिगैं कृष्णगुवार । मरि मरिगैं दशो अवतारा ॥
चौवालीसवाँ प्रकरण
निरंजनने सत्यलोककी नकलपर अपने लोक बनाये ।
जैसा कि, सत्यपुरुषने अपने हंसोको द्वीप द्वीपोंमें सुख पूर्वक रहनेके लिये द्वीप प्रदान किया, उसीका अनुकरण करके कालपुरुषने अमरावती, कलकावती, गोलोक, स्वर्ग, ब्रह्मलोक, साकेत इत्यादि बनाया और उनमें सुख भोगका समस्त सामान प्रस्तुत किया और नरक वैकुण्ठ इत्यादि की रचना करके सब ठीक ठौर किया, जो जिस योग्य था उसे वहाँ बैठाया । विष्णु ब्रह्मा शिव इन्द्र बरुण कुबेर इत्यादि सबको इन स्थानोंमें रखवा और आप सबसे अलग रहै । अध्याने भी अपने तीन पुत्रोंको तीनों लोकोंका राज्य सौंप दिया ।
पैंतालीसवाँ प्रकरण
तीनों पुत्रोंकी कृतघ्नता ।
जब सब स्वर्ग कैंलास वैकुण्ठ इत्यादि बना चुके और तीनों भाई तीनों लोकका राज्य करने लगे, तब तीनों भाइयोंने वही कार्य किया जो निरंजन
कालपुरुषके तप करके तीनों लोकोंके राज्य पानेका वर्णन
तथा अद्याने किया था। जैसे निरंजन और अद्याने सत्यपुरुषके नाम गुप्त कर अपनी बड़ाई सारे संसारमें प्रगट की, उसीप्रकार तीनों भाइयोंने अद्या और निरंजनका नाम बिलकुलही छिपाकर, संसारमें अपनी पूजा तथा प्रतिष्ठाका प्रचार किया।
जब तीनों भाइयोंने यह कार्य किया और अद्याने भी जानलिया कि, मेरे बेटे तो मेरा नाम बिलकुलही मिटाकर केवल अपनी बड़ाई सृष्टिपर प्रगट करके अपनी पूजा कराते हैं और मुझको कोई नहीं पूछता।
छियालीसवाँ प्रकरण
अद्याकी पूजाका प्रचार।
जब अद्याने पुत्रोंकी कृतध्मता और स्वार्थको जान लिया तब, उसने अपने शरीरसे अपने रूपकी तीन कन्याएँ प्रकट कीं। वे अत्यंत कोमलाङ्गी तथा सुन्दरी हुई। उन तीनोंका नाम क्रमशः १ रम्भा, २ सूची, ३ रेणुका रक्खा और उन्हें आज्ञा दिया कि, ऐ बेटियो! तुम जाओ और समस्त संसारको आकर्षित करके मेरी पूजा संसारमें प्रचलित कराओ। वे तीनों अपनी माताकी आज्ञा पातेही, पहले आकाशको उडगयों और समस्त देव गंधर्व तथा चारण इत्यादिकों का चित चुरा लिया, फिर सब गंधर्वोंको अपने साथ मिला लिया जब सब देव और गंधर्व इत्यादि इनके बशमें आकर इनके दास बन गये, तब छत्तीस प्रकारके बाजे और सब गंधर्वोंको अपने साथ लेकर पृथ्वीवर आर्यों, ब्रह्मा विष्णु शिव तथा समस्त ऋषि मुनिके मनको मोह लिया। जब उन लोगोंने छत्तीस प्रकारके बाजे और तिरसठ प्रकारकी राग रागिनी छेडी तब उनको सुनकर, सबका चित्त चञ्चल तथा अधीर हो गया। सब लोग उनके दास बन गये फिर तो उन्होंने अद्याकी पूजाका समस्त संसारमें प्रचार किया। अब भवानोका पूजन सब करने लगे। विशेष वृत्तान्त अम्बुसागरके पाँचवें तरंगके अनुमानयुगकी कथा परिशिष्टमें देखना चाहिये।
सैंतालीसवाँ प्रकरण
पाँचोंकी पूजाका निश्चित होना और निरञ्जनका सर्वाधिपत्य।
इन्हीं पाचों—निरञ्जन, अद्या, ब्रह्मा, विष्णु, शिवकी पूजा प्रचलित हुई। इन पाँचके आगे कोई कुछ नहीं जानता इन्हींका समाचार चारों वेद और
निरंजनका कूर्मके पास जाकर तीनों लोकोंकी रचना सामग्रीके मांगनेका विवरण
किताब देते हैं। निरञ्जन तथा अद्याने सत्य पुरुषका नाम समस्त संसारसे छिपा दिया और मुक्तिमार्गके समस्त द्वारोंको रोक लिया। इस कारण कि, कोई भी मनुष्य मुक्तिमार्ग न पावे, सदा आवागमनके जालमें फँसा रहे और भवसागरमें डुबकियाँ खाया करें तथा सब कालपुरुषके भोजन बनें।
इस प्रकार चारखान चौरासी लाख योनिके जीव अर्थात् समस्त माया-सृष्टि कालपुरुषके चंगुलमें फँस गयी और उसके जालसे उनका छुटकारा कठिन हो गया। यह धर्मराज निरंजन नित्य एक लाख जीवको तपत्शिलापर भून भून कर खाया करता है। इस प्रकार सब जीवधारी सांसारिक आपत्ति-जालमें फँस गये ॥
अडतालीसवाँ प्रकरण
तपत्शिलाका वृत्तान्त ।
भवसागर एक विशाल समुद्र है, जिसके दो किनारे हैं, एक लोक, दूसरा वेद। इस लोकके किनारेपर आदि भवानी बैठी है और उसके साथ चौसठलाख जोगिनियाँ रहतीं और समस्त संसारमें धूम मचाती हैं। ये हाथोंमें खप्पर लिये सब जीवोंका रक्तपान करती फिरती हैं। जहाँ भवानीके स्थान हैं वहाँ मनुष्य, भैंसा, बकरा, मुरगा, आदि प्रत्यक्ष काटे जाते हैं, वे सब इन देवियोंके भोजन होते हैं। इन्हींके लिये बेधडक अत्यंत निर्दयताके साथ नित्य अनन्त जीवोंका बलिप्रदान होता है। ये बलवती देवियों समस्त पृथ्वी तथा आकाशमें घूमा करती हैं।
पृथ्वीसे छत्तीस सहस्र योजन पर (जिसको कबीर साहबने सालोक-सक्ति कहा है) स्वयम् मायाका स्थान है, वहाँसे अद्या अपनी फौज सहित अथवा अकेली सप्तद्वीप नौखंडमें फिरा करती है और समस्त संसारमें राज्य करती है।
यह अद्या तो लोकके किनारेपर बैठी है और दूसरा जो वेदका किनारा है, उसके ऊपर निरञ्जन देवता अत्यंत सचेत तथा चैतन्य होकर बैठा, ऐसा मंत्र पढ़ रहा है कि, जिसमें उसके मंत्रके प्रभावसे कोई जीव तीनों लोकके बाहर न जा सके। वही सब जीवोंकी बुद्धिपर बैठा है और जिधरको चाहता है मनुष्योंकी बुद्धिको उधर को फेर देता है और किसीको सत्यपुरुषकी भक्तिकी ओर ध्यान देने नहीं देता है —
कूर्मजीका सत्पुरुषके पास फरिहाद करना और निरंजनको दण्ड मिलना
“पैठा है घट भीतरे, वैठा है साचेत ।
जब जैसी गति चाहता, तब तैसी मति देत ॥”
जैसे बकरी कसाईसे प्रेम करती है और उसके पास स्वेच्छापूर्वक दौड़ दौड़कर जाती और अपना गला कटाती है, ऐसेही समस्त मनुष्य परसमवेदकी शिक्षा ग्रहण करके धर्मराजका भोजन बनते हैं, इस काल पुरुषका मुंह अग्नि है जैसा कि, विराट् स्वरूपमें लिखा है । इसी लिये जो वेदमंत्रोंके साथ अग्निमें हवन किया जाता है सो सब इस अलख निरञ्जनका भोजन होता है, इसीकारण अश्वमेध, गोमेध, नरमेध, अजमेध इत्यादि यज्ञ परम्परासे होते आते हैं ।
कबीर साहबके ग्रंथ अनुरागसागरमें देखो कि, आकाशमें एक तप्त-शिला है, उसी तप्तशिला पर सब जीव जलते बलते और तड़प २ कर कबाब होते हैं और उन सबको काल पुरुष खाजाता है, इस प्रकार अद्या तथा निरञ्जन सब जीवोंको मारमार कर खाया करते हैं । अत्यन्त दुःखपानेपर सब जीव तड़प तड़प कर हाय हाय करते और पुकारते हैं कि, हे दीनबयालु ! सबके पालनकर्त्ता ! हमको धर्मराज अत्यंत कष्ट दे रहा है आकर इससे बचाओ और हमारा दुःख क्लेश हरण करो ।
उनचालीसवाँ प्रकरण
भवसागरका स्वरूप ।
यह अद्या तथा निरञ्जन दोनों पति पत्नी लोक तथा वेद रूपी भवसागरके दोनों किनारोंपर जीवोंको रोकनेके लिये अत्यंत सावधानीपूर्वक बँठे हुए हैं और इस भवसागरके बीचमें तीन अहेरी कर्माँका जाल लिये फिरते हैं—ये सहस्रों पंथ प्रचलित करके, एक दूसरेके विपरीत राह दिखा, स्वपक्षमें फँसाकर मनुष्यमात्रको अंधा करते हैं—जिससे समस्त मनुष्य अज्ञानता वश भटक भटक कर मरते हैं । किसीको भी मुक्तिका मार्ग मालूम नहीं होता । ये तीनों मछुवे ऐसे बलिष्ठ हैं कि, अपने अनन्त कपट जालों द्वारा जीवोंको फँसाही लेते हैं और भौति भौतिके कर्म व उपासना योग तथा ज्ञान द्वारा, लोभ लालच बतलाकर किसीको अपने जालसे बाहर जाने नहीं देते और अज्ञानवश समस्त मनुष्य आपसे आप आ आकर स्वयम् कँव हो इन पांचों शिकारियोंका आखेट बनते हैं । इस भवसागरमें समस्त जीव मछलियोंके सदृश हैं और ब्रह्मा विष्णु शिव ये तीनों मछुवे इस समुद्रमें गर्जते फिरते हैं, कोई इनका सामना कर नहीं
निरंजनका पुनः तपस्याकर बीज खेत मांगना
सकता । यदि ऋषियोंमेंसे कोई इनके सामने खड़ा होवे तो सहस्रों प्रकारकी धूर्ततासे उनको भी वशीभूत कर लेते हैं । जहाँ कहीं ये तीनों दबते हैं त्रह्राँ तुरन्त उनको माता पिता उनकी सहायता करते हैं और उनको बल देकर उनकी कामना पूरी करते हैं, ये पाँचों बड़े भयानक तथा मनुष्योंके कष्टदाता हैं —
पचासवाँ प्रकरण
दुःखित जीवोंकी पुकार और सत्यपुरुषकी गोहार ।
सब जीवोंने अनन्त कालपर्यंत बड़ा दुःख पाया, उन्हें कुछ सूझताही नहीं था कि, क्या करें और किस उपाय द्वारा बचें ! इससे अत्यन्त दुःखी होकर ऐसे चिल्लाते हाय हाय करते थे कि, उनके रोने तड़पने तथा चिल्लानेका शब्द सत्यलोकपर्यंत जा पहुँचा ।
जब सब जीवोंके हृदयका धुवों सत्यलोकपर्यंत पहुँचा तब सत्य पुरुष दयालु हुए और दया करके ज्ञानीजीसे कहा कि, हे ज्ञानी ! सब जीवोंको काल-पुरुष अत्यंत दुःख दे रहा है, तुम तप्तशिलातक जाओ और सबको ठंढा करो ।
इकावनवाँ प्रकरण
ज्ञानीजी अर्थात् कबीर साहबका सत्यलोकसे तप्तशिलाके समीप जाना और समस्त जीवोंके ठंढा करनेका वृत्तान्त ।
सत्य पुरुषकी आज्ञा पातेही ज्ञानीजीने तप्तशिलाके समीप पहुँच कर सत्य शब्दकी टेर की । सत्यशब्दकी आवाज सुनतेही सारे जीव ठंढ होगये, जब सारे जीवोंको विश्राम मिला तब सत्यगुरुको पहचाना और जान लिया कि, यही दयालु हमारे ऊपर दया करने आया है इसीने हमको बचाया तथा ठंढा किया है ।
शेर
दोस्त खलायक अवदो अजलके । मूझजने रहमो करमो फजलके ॥
पाक खुदाबन्द जो परवरदिगार । आदमके सूरत हुआ आशंकार ॥
आपही अपना जो ले आया पयाम । पाक नबीका है मुकद्दस कलाम ॥
लेके जो पैगाम चले लोकसे । तप्तशिला देख जले झोकसे ॥
देखा वहाँ आन जो सोजान संग । जलते तड़पते जीव जहाँ जैसे ढङ्ग ॥
कहके शब्द सत पुकारा जहाँ । सदै हुई फौर सो आतिश वहाँ ॥
बीज खेत अर्थात् आदि भवानीका उत्पत्तिका वर्णन आद्यानिरंजनका वर्णन
जीवने पहचान लिया पाक जात । जिसस हे कायम यह कुल कायवात ॥
अपने कलमरूमें सितम देखकर । अहद देहिन्दः अहदी भेस धर ॥
और किसीका नहीं ऐसा था ताव । कालके हाथोंसे छुडावे अजाब ॥
इस लिये आंग हुए खुद रसूल । जिसकी निगहसे होवे जम और धूल ॥
देखतेही जीव किये सब पुकार । हक् करीमा विराये किर्दगार ॥
लीजिये बचा हमको अब इस आगसे । आये यहां चल बराये भागसे ॥
जब सब जीवोंको जलता तथा तडपता देखकर सत्यगुरु आये और उनका प्राण बचाया तथा ठंढा किया तब समस्त जीव सत्यगुरुकी स्तुति करने लगे—
शेर
किया सब जानपर रहमत जहाँदार । तू पूरूपसत शब्द सतके अमौदार ॥
पडे हम भूल भवसागरसे आकर । न जानाभेद सत्पुरुष निर आकार ॥
कहीं तीरथ कहीं मूरत पुजाया । कहीं खून कत्लका जारी हुआ कार ॥
कहीं खञ्जर कहीं छूरी चलाया । कहीं मुजबह पै छुटीं खून पिचकार ॥
कहीं हनुमानो भैरव भूत पूजा । कहीं शिव लिङ्ग औचण्डीं गर्म बाजार ॥
कहीं गरदन मरोडी झटका पटका । कहीं आति में जलत बलते जाँदार ॥
कहीं है चक्र भैरवका तमाशा । कहीं बकरे पै धूँसोंकी पडीबार ॥
कहीं रोजः कहीं मैं भङ्ग बूजः । कहीं गलकट बरहमन बैठे खूँखार ॥
कहीं मुर्गा है बिस्मिल हाथ कंसाभ । कहीं चीखें सुवर कालीके दरबार ॥
कहीं है ढोल बजता ओ नकारः । कहीं भजनः है मर्दोजन जनाकारा ॥
कहीं अश्वमेध हो अजामेध । कहीं अहरमन बरहमन मर्दुमाजार ॥
कहीं मुल्ला न काजी ले छुरा हाथ । कहीं गरदन कुशोको तेज तलवार ॥
कहीं रहमत कहीं जहमत दिखाया । पडे सब जीव धोखे धंवेके गार ॥
भरमका धर्म आलममें चलाया । कहींनेक औ कहीं है वह व किरदार ॥
हरी हर हर हरी हर कोइ बोले । कोई कहता अहं ब्रह्म सबका सरदार ॥
कहांतक सो बयों कीजे सरापा । निरज्ज खल का नहिंवार औ पार ॥
येह तीनों दव देवी सबक दाता । इन्हीके मर्दोजन फरमान बरदार ॥
फँसे वेद और शरःमें जीव सारे । नहीं महरम दूँठ कोई शब्द सार ॥
दो लोके और वेद सूलीके सतूँ हैं । लटकते उसके ऊपर जीव जम द्वार ॥
कि ज्यों सावनके घासोंसे छिपे राह । पुरुष सतपंथ यों रोकेहैं मक्कार ॥
तीनों देवोंके प्राकट्यका वर्णन
हमें रख लीजिये खुद जा पनहमें । तु बंदीछोर सब जीवनको आधार ॥
बजुज सत्गुर हमारे कौन दे दाद । तुही है बरतरीं सब सिद्ध सालार ॥
तुही सत्पुरुष खुद धर देह आया । शरन अपनीमरखिय हमको इस बार ॥
किया तदबीर सदहा योग जप हम । न छुटकारा हुआ अज्र दस्ते जब्बार ॥
सिवा साया क्रदम तेरे न जाये । नहीं चारा कोई सूझे है नाचार ॥
तुही बन्दः नेवाजः बन्दः परवर । सिवा तेरे न रह कोई हजिनहार ॥
जियारत आपसे यह सँगे सोजों । हुआ हम सबके खातिरमिस्लगुलजार ॥
बचा लीजे बचा लीजे बचाले । हम आजिजकालके फँदेगिरफ्तार ॥
किसुन सत्गुरुका कलमः अब हैवों । हुए हैं जिन्दः हम सबजीव मुर्दार ॥
हुई शादी क्रदम कादिरके हेखे । बहर रख होरहीरहमत नमूदार ॥
कि ज़रः खाक पाए परतोअफ़ग़न । हुए जाहिर व बाहर इल्म आसार ॥
न तुझसा और कोई हर दो जहाँ में । तु आदम की मुसीबतम मददगार ॥
हुआ बद हाल मुतगय्यर हमारा । खबर लेनेको आये आप करतार ॥
हुए हम भूलके मुजरिम तुम्हार । गुनहवखसोगुनहवख शिन्दः गफ़फ़ार ॥
सुबुक कीजे हमें इस बोझसे अब । हमारे सिर गुनाहोंका है अंवार ॥
हमारे परदःको ढक मेह्म करके । तेराही नाम है मशहूर सत्तार ॥
हम आजिजखाक हैं पा पाक पाक । गुरु की मेह्म पावें असूल इसरार ॥
बावनवाँ प्रकरण
जीवोंका भक्तिकरनेकी प्रतिज्ञा करना ।
जब इस प्रकार सब जीवोंने जानीजीकी स्तुति की, तब आप अत्यन्त दयालु होकर कहने लगे कि, ऐ सब जीवो ! तुम जब सब मनुष्य देह पाओगे और मनुष्यकी देह पाकर सत्यपुरुषकी भक्ति करोगे तब, काल पुरुषके जालसे छूटोगे । तब सब जीव कहने लगे कि, हम सब अब मनुष्य शरीर पाकर सत्यपुरुषकी भक्ति को कदापि विस्मृत न करेंगे अबतक हम सब लोक तथा वेदके धोखेमें आनकर, कालपुरुषको सत्य पुरुष समझते थे और उसकी भक्ति करतेथे इस कारण हमारी ऐसी दुर्दशा हुई, हमलोग लोक तथा वेदके बंधनमें भूल गये, अब कदापि न भूलेंगे, न धोखेमें पड़ेंगे । यह बात सुनकर जानीजीने मुसकुराकर कहा कि, हे जीवो ! जब तुम मनुष्यतन पाओगे तो यह सब भूल जावोगे ; कालपुरुष फिर तुम्हारी बुद्धिको गोता देने लगेगा किन्तु, तुममेंसे जो कोई सत्यगुरुका कहना मानेगा और
चारों वेदोंके प्रागट्यका वर्णन
सत्यपुरुषका भक्ति हृदयसे करेगा, उसको सार शब्द मिलेगा, उसके द्वारा वह परम धामको सिधारेगा और फिर वह कालके पञ्चमें कदापि नहीं फँसेगा ।
तिरपनवा प्रकरण
पूर्व देशमें कालपुरुषका जीवोंको फसानेके लिये नाना मतमतान्तरका प्रचार करना ।
इतना कहकर तथा समस्त जीवोंको शान्त करके ज्ञानीजी पुनः सत्यलोक को चले गये । फिर निरञ्जनने नाना प्रकारका अपना पंथ जीवोंको बाँधनेके लिये पृथ्वीपर प्रचलित किया । ये जो समस्त मजहब हैं सब बंधनके निमित्त हैं, उद्धारके निमित्त कोई भी नहीं । इसी प्रकार कालपुरुषके अनन्त धर्म पन्थ पृथ्वीपर प्रचलित हुए ।
उपर्युक्त चारों वेद भारतवर्ष तथा पूर्वके अन्यान्य देशोंमें रहे । समस्त भारत तथा आसपासके देशोंमें चारों वेदोंकी शिक्षा फैल गयी जहाँ सब लोग वेदकी आज्ञा और ऋषियोंके आदेश पर बराबर चलते आरहे हैं ।
चौवनवाँ प्रकरण
पश्चिममें चार किताबोंका प्रचार ।
पश्चिमके देशोंके लोग पूर्व वेदसे बञ्चित रहे, इस कारण बह्मा विष्णु तथा शिव लोगोंको समय समय पर अनेक रूपोंमें दर्शन देते और उन्हें उपदेश दिया करते थे, तथापि उनके पास कोई प्रमाण नहीं था और न कोई विशेष किताब थी कि, जिसके आधार पर वे लोग चले ।
देखो मुहम्मद बोध और कबीर साहबके अन्यान्य ग्रंथोंमें ऐसा लिखा है कि, पूर्वोक्त चार वेदोंसे चार किताबें निकाली गयीं और पश्चिम देशके लोगोंको दीगयीं जिससे वे लौकिक पारलौकिक मर्यादाका ठीक ठीक पालन कर सकें । यद्यपि जो उपदेशोंमें चारों वेद और चारों किताबोंके तनिक भी विभिन्नता नहीं है, तथापि देश कालके विचारसे भारतके लोगोंके ढङ्गपर चारों वेद दिये गये हैं और पश्चिम देशवासियोंके आचार व्योहार पर चार किताबें प्रदान हुईं । जिस जातिके निमित्त जो किताब उत्तरी उसमें उसकी रीत व्योहार लिखे हुए हैं । प्रत्येक जातिके निमित्त प्रत्येक किताब बनी है और पैगम्बरों द्वारा पृथ्वीके लोगोंको उनकी शिक्षा दी गयी । प्रत्येक पैगम्बर अपनी समझके अनुसार प्रचार करता आया, यथार्थ भाव और भेदको तो कोई दिव्य दृष्टिवाले साधुही समझते हैं दूसरे
वेदके प्रचारक ब्रह्मा
क्या समझेगे जिसमें जितना प्रकाश है उतनाही उसका कथन और वर्णन हैं, जैसे वेद पूर्वीय देशवासियोंके लिये हैं, वैसेही ये चारों किताबें पश्चिम देशवासियों के लिये उपयोगी हैं । सो यह पूर्वीय, चार वेद और पश्चिमीय चार किताब समस्त पृथ्वीपर संसारमें फैल गये, उन्हीं उन चारों पश्चिमीय किताबोंके नाम तौरीत, जबूर, इञ्जील और फुरकान अर्थात् कुरान है ।
पञ्चपनवाँ प्रकरण
तौरीतमें उत्पत्तिका वृत्तान्त ।
आदमकी पैदाइस ।
खुदाने छः दिनमें समस्त सृष्टिको उत्पन्न करने के पश्चात्, वैकुण्ठ बनाकर उसमें आदम और हौवाको रक्खा । उस वैकुण्ठमें आनन्द तथा सुख भोगकी सब सामग्रियाँ उपस्थित थीं । कल्पवृक्ष लगा था, अमृतके सुन्दर स्त्रोतें बहते थे । आदम अत्यंत निश्चितताके साथ जीवन निर्वाह करता था, पाप पुण्यकी सुध भी नहीं थी । पशुओंके भौंति लोक परलोकका उसको तनिक भी ज्ञान नहीं था, उस अवस्था में वह नन्हें बच्चोंके समान अज्ञानी था ।
कबीर साहबका कथन है कि, मनुष्यका बच्चा बारह वर्षपर्यन्त अनजान माना जाता है क्योंकि तब तक वह पशुके समानही रहता है । इसी प्रकार आदम बच्चोंके सदृश अनजान रहकर आनन्द उपभोग किया करता था । इन्द्रियोंके वशीभूत होना पशुओंका काम है ।
तब परमेश्वरने विचार किया कि, यदि आदम इसी अवस्थामें आनन्दकी तरंगोंमें डूबा रहा तो, यह जन्म भर मूर्खही रह जावेगा और इसकी संतान भी वैसेही होंवेंगी, इस कारण अवज्ञा करनेके अपराध पर वैकुण्ठसे बाहर निकाल दिया और कहा कि, वह उद्यम करके खावे कारण यह कि, ह'लालकी कमाईही द्वारा मनुष्यका अन्तःकरण शुद्ध होता है । हाथ पाँव इत्यादि भी कर्म निमित्तही मिले हैं । जब उसको भलाई बुराई का ज्ञान हो जायगा, तब उसके मनमें खुदाका खौफ पैदा होगा, तब संयम, नियम करके वह मनुष्यता तथा विद्या सीखेगा, और उसकी पशुता तथा मूर्खता उसमेंसे निकल जावेगी, क्योंकि, परमेश्वरका भयही ज्ञान तथा कर्मकी जड़ है जिसके मनमें परमेश्वरका तथा मृत्युका भय है वही मनुष्य है और सब पशु हैं । सो जब आदम वैकुण्ठके बाहर निकाला गया तो भिनहत
१ हलालकी कमाई उसे कहते हैं जो मनुष्य उचित परिश्रमद्वारा प्राप्त करता है ।
वेदके साथ क्रोड मंत्र, वेदोंका सार
करके जीवन व्यतीत करने लगा और मुष्टका भोजन छोड दिया, तब ज्ञान तथा इल्मके लिये उद्योग करने लगा और ज्ञानी होगया । देखो मुसलमानोंकी हदीसोंमें लिखा है कि, जब आदम बिहिश्तसे निकाला गया तब, उस पर खुदाके यहांसे पेंगम्बरी उतरी और वह पेंगम्बर हुआ । उसी समयसे आजपर्यन्त मनुष्यके, निमित्त धर्मकी कमाई तपके तुल्य और मुक्तिकाद्वार माना गया है । सो खुदा उचित जानकर आदमको वैकुण्ठके बाहर निकाल दिया और वैकुण्ठमें चमकती तलवारोंके साथ फिरिस्तोंका पहरा बैठा दिया और उनसे कहा कि, देखो आदम अब भला बुरा पहचानने लगा क्योंकि, अब वह भी हममेंसे एक हुआ । यहांपर बहुवचनका शब्द खुदाने प्रयोग किया है कि, आदमने खुदा अर्थात् विष्णुके समान अनगिनत ब्रह्मा और अनगिनत विष्णु तथा शिव हैं—और सहस्रों ऋषि मुनि विष्णुके समान पदाधिकारी हैं और उनमें भी सृष्टिके उत्पन्न करनेकी शक्ति है ।
आदम वैकुण्ठके बाहर निकाला जाकर सांसारिक कार्योंमें संलग्न हुआ । कुरबानी और खुदाकी बन्दगी आदमके समयसे ही प्रचलित है ।
छप्पनवाँ प्रकरण
आदम और हव्वाकी संतान ।
आदमके दो पुत्र उत्पन्न हुए, एकका नाम काबील दूसरेका नाम हाबील था । दोनों भाइयोंने कुरबानीकी और परमेश्वरने हाबीलकी कुरबानीको कबूल किया तथा काबीलका अस्वीकार कर दिया तब बडे भाई काबीलको क्रोध आया उस समय परमेश्वरने अपना दर्शन देकर काबीलको समझाया और कहा कि, हे काबील ! तू क्रोध मतकर यदि तू साफ दिलसे कुरबानी करता तो स्वीकार होता तथापि तू अपने छोटे भाई हाबील पर विजयी होगा । खुदाकी आज्ञानुसार काबील अपने भाईपर विजयी हुआ और उसकी हत्या कर डाली । काबील दुष्ट तथा दुरात्मा था और हाबील विशुद्धात्मा था । इस प्रकार पृथ्वी नर रक्तसे लाल हुई । काबील की संतान पृथ्वीपर अधिकतासे फैल गयी । उन्होंने जो सुंदर स्त्रियों देखी उनके साथ विवाह कर लिया जिनसे उनकी वंश वृद्धि हुई और उनसे पृथ्वी पर पापकी अधिकता हुई—तब उनके पापोंसे खुदाको घृणा होगयी ।
आदम तो एकसौतीन वर्षका होकर मर गया था किन्तु, उसकी संतान बडीही पापी हुई, तब परमेश्वरने चाहा कि, मैं अब इन पापियोंको डुबाकर मार डालूँ ।
चार गुरुओंका वर्णन, स्वसंवेदका वर्णन
सत्तावनवाँ प्रकरण
जलप्रलय और नूहकी किस्तीका वर्णन ।
परमेश्वरने नूहसे कहा कि, तू एक नाव बना और अपने बाल बच्चों समेत उसमें चढ़ और सब जीवजन्तु कीड़े मकोड़े इत्यादिके जोड़े २ अपने साथ ले, जिसमें उनकी नसल (वंश) पृथ्वीपर रह न जावे । मैं अब पापियोंको नष्ट करूँगा । नूह आदमकी दशवीं पीढ़ीमें धार्मिष्ठ पुरुष था, उसने ईश्वरकी आज्ञाको मान लिया । जब नूह दूसरे जीवों सहित नावपर चढ़ा, तब उस समय ऐसी बाढ़ आयी कि, समस्त जीव डूबकर मर गये, केवल नूहकी नावपरके सब जीवधारी बच गये विष्णुने (जैसा कि मत्स्यपुराणमें लिखा है) मछलीकी सूरत बनायी और अपनी दोनों सींगोंमें नावको बाँध लिया, जिसमें बाढ़के वेगसे बहकर वह नाव चूर २ न हो जाय । जबतक बाढ़का वेग रहा तबतक नूहकी नावको विष्णुने पकड़ रक्खा जब वह नाव अरारात पर्वतपर ठहर गयी तब विष्णु वैकुण्ठको चले गये । जब पृथ्वी सूख गयी तब सब जीवों सहित नूह पृथ्वीपर आये और खुदाके प्रसन्नार्थ जीवोंको आगमें जलाकर बलिप्रदान और यज्ञ किया । वे जीव जब जले तब उनके शरीरमें धुँवा उठा और उस गन्धकी वासना लेनेके निमित्त खुदा महाराज वैकुण्ठसे पृथ्वी पर उतरे और उस गंधको संधकर अत्यंत प्रसन्न हुए और नूहको आशीर्वाद दिया कि, नह ! तुम बौओ लूनों और प्रसन्नतापूर्वक रहो तथा पृथ्वीपर फँल जाओ फिर विष्णु पछताए कि, अभी तो मैंने सबको नष्ट करदिया पर भविष्यमें ऐसा कदापि नहीं करूँगा । फिर नूहसे यह प्रण किया मैं अपना चिह्न आकाश पर रखता हूँ और प्रण करता हूँ कि, अब पृथ्वीके जीवोंको इस प्रकार नाश नहीं करूँगा । फिर अपने शाङ्गधनुष्यको आकाशपर रख दिया और कहा कि यह मेरा धनुष वृष्टिके समय आकाश पर दिखायी देगा, इस शाङ्गधनुषको देख कर अपनी प्रतिज्ञा मैं याद करूँगा और पृथ्वीपरके रहनेवालोंको वाढसे न मारूँगा । इस प्रकार नूह और उसकी संतानको आशीर्वाद देकर भगवान् वैकुण्ठको चले गये और नूह अपनी संतानों सहित खेती करने लगा ।
अट्ठावनवा प्रकरण
इब्राहीम पँगम्बरका वर्णन ।
नूहकी दशवीं पीढ़ीमें इब्राहीम उत्पन्न हुआ । यह मनुष्य पुण्यात्मा तथा बड़ाही धार्मिक था । उसके सामने ब्रह्मा विष्णु और शिव तीनों प्रगट हुए । जिनको
वेद रक्षक, वेद व्यास
इब्रानी और ईसाई दो दूत मानते हैं और उनसे एकको यहवाह मुकद्दसके नामसे पुकारते हैं और उसका नाम बड़ी प्रतिष्ठाके साथ लेते हैं। इस यहवाहने इब्राहीम को आशीर्वाद दिया। इब्राहीमको प्रिय पुत्र इसहाक था। परमेश्वरने आकाश वाणीसे इब्राहीमको आज्ञा दी और कहा कि, ऐ इब्राहीम ! तू अपने पुत्र इसहाक को मेरे नामपर कुरबानी कर। इब्राहीम परमेश्वरकी आज्ञाको मान कर अपने पुत्र इसहाकको लेकर चला और लकड़ियोंको एकत्रित करके अपने प्यारे पुत्रको उसपर बैठाया और हाथमें छुरा लेकर उसको हलाल करने तथा जलाकर कुरबानी करनेके निमित्त प्रस्तुत हुआ। उसी समय आकाशवाणी हुई कि, बस कर, अब तू अपने पुत्रको मत मार। तब उसने जबह नहीं किया और परमेश्वर इब्राहीमका सच्चा प्रेम देखकर बड़ाही हर्षित हुआ।
यह नरमेध यज्ञ वेदकी आज्ञानुसार पहले पश्चिम देशमें इब्राहीमने ही किया, इस इब्राहीमका बेटा इसहाक और इसहाकका बेटा याकूब और याकूबका बेटा यूसुफ था।
उनसठवाँ प्रकरण
यूसुफ पैगम्बरका वृत्तान्त।
इस यूसुफके ग्यारह भाई थे, अर्थात् थाकूबके बारह बेटे थे। यूसुफ मिश्र देशमें गया वहाँका बादशाह फिरऊन था, फिरऊन यूसुफकी सदाचार तथा सुजनताको देखकर अत्यंत हर्षित हुआ और उसे अपने समस्त देशका बड़ा अधिकारी बना दिया, मानो यूसुफ समस्त मिश्रका सन्नाट हो गया। इसके उपरान्त उसके ग्यारह भाई तथा पिता अपनी संतानके सहित मिश्रदेशको गये।
साठवाँ प्रकरण
फिरऊनका वृत्तान्त।
वहाँपर यूसुफकी संतानकी बढ़ती हुई। फिरऊन बादशाह और यूसुफ दोनों मर गये उसके अनेक कालोपरान्त एक और फिरऊन मिश्रदेशके सिंहासन पर बैठा। यह फिरऊन बड़ाही घमंडी तथा दुरात्मा था। उसका नामभी उसके घमंडके कारणही फिरऊन था। उस घरानेके सब फिरऊनही कहलाते थे। उसने देखा कि, इब्राहीमके वंशजों में बड़ी उत्पत्ति हुई तब, वह डरा और यहचिंता करने लगा कि, ये कहीं बलपूर्वक मेरे देशपर अधिकृत न होजावें और मेरा राज्य न
कबीर साहबकी चार वाणी और चारों वेदोंका वर्णन
लेलेवें । इसी भयसे वह उनको बहुत कष्ट देने, उनसे कठिन परिश्रम कराने और उनके बच्चोंकी हत्या करने लगा । उनके बेटोंको तो वह मार डालता और उनकी बेटियोंको जीवित रखता । इस प्रकार जब उनपर दारुण दुःख उपस्थित हुआ तब खुदाने उनपर दया प्रगट किया ।
इकसठवाँ प्रकरण
मूसाकी उत्पत्तिका वृत्तान्त ।
उमराव नामक एक इब्रानी था । उसका पुत्र मूसा उत्पन्न हुआ । वह मूसा बड़ाही सुन्दर था उसके माता पिताको बड़ी दया आयी कि, उसको फिरऊनके हाथ कैसे सौंपें । इससे उन लोगोंने उस बालकको टोकरीमें रक्खा और नदीके किनारे झाऊके वृक्षमें रख आये संयोगन फिर उनकी बेटी वहाँ स्नान करनेको गयी और उसने उस बच्चेको देखा, उसको उसपर दया आयी, उसने उस बच्चेको अपनी लौडीको सौंप दिया और वह दासी उस लड़केको अपने घर ले आयी । वह उसका पालन पोषण करने लगी, जब वह सीखने योग्य हुआ तब वह उसको शिक्षा देने लगी । यह मूसा फिरऊनकी बेटिका गोद लिया बालक ठहरा । वह मूसाको अपना बेटा समझकर उससे बड़ा प्रेम किया करती थी । मूसा मिस्र देशकी शिक्षा पाकर परम विद्वान् हुआ । जब उसका वय चालीस वर्षका हुआ तब उसने एक इब्रानीका पक्ष करके एक मिसरीको मार डाला, फिर उसको फिरऊनका भय हुआ कि, मिसरीके बदले में भी मारा न जाऊँ । तब वह मिश्रदेशसे भागकर कनआँमें गया और मदियानामें रहने लगा । वहाँ पितरू नामी एक इब्रानीकी बेटीके साथ उसका विवाह हुआ । वह अपने श्वशुरकी भेड़ बकरियाँ चराया करता था ।
कुछ दिनोंके पश्चात् खुदाने आज्ञा दी कि, ऐ मूसा ! तू मिस्रदेशको जा और अपनी जातिको फिरऊनके जुल्मसे बचा ।
उस समय मूसाकी उम्र अस्सी वर्षकी थी, कारण यह कि, मूसामें चालीस वर्षके वयमें मिस्रदेशसे भागा था और वह चालीस वर्षतक अपने श्वशुरकी भेड़ बकरियाँ चराता रहा । परमेश्वरकी आज्ञासे मूसा मिस्रदेशको गया, परमेश्वर उसके साथ था । उसने अनेक चमत्कार दिखलाये । तब फिरऊन बादशाहने इब्रानियोंको मूसाके साथ जानेकी आज्ञा दी । जब मूसा तीनलाख इब्रानियोंको लेकर, जिन बाल युवा बृद्ध बालिका स्त्री वृद्धा सभी थीं, मिस्रदेशसे कनआनकी ओर चला और लाल समुद्रके समीप पहुँचा, अर्थात् एक पड़ाव तक कूच कर आया । तब फिरऊन पछताया कि, इब्रानियोंको तो हमने बिदा कर दिया, हमारी सेवा
तथा बेगार कौन करेगा । यह सोचकर उसने आठ लाख फौज लेकर उनका पीछा किया । जब यहूदियोंने देखा कि, फ़िरऊन हमारे पीछे धावा किये आरहा है, तब वे रोये और पुकारा कि, मूसाने व्यर्थही हमारे प्राण नाश किये । क्यों कि, हमारे दोनों ओर दो पर्वत हैं सामने लाल समुद्र है । और पीछे २ फ़िरऊन अपने दलबल सहित चढा चला आता है, हम अब कहाँ जायँ कहीं भागनेकी राह नहीं रही । तब मूसाने खुदासे प्रार्थना की । तब खुदाने कहा कि, ऐ मूसा तू नदीमें अपना सोंटा मार मूसाके सोंटा मारतेही समुद्रका जल फट गया और पानी दोनों ओर पर्वतके समान खड़ा हो गया । मध्यमें शुष्क पथ प्रगट हुआ । अब मूसा समस्त इब्रानियोंको अपने साथ लेकर पार उतर गया । पीछे फ़िरऊन आया और अपने दलबलसहित उसी समुद्रीय रास्तेसे पार जाना चाहता और समुद्रमें घुसा, तब फिर परमेश्वरने आज्ञा दी कि, ऐ मूसा ! पुनः समुद्रकी ओर सोंटा बढ़ा । मूसाने वैसाही किया । तब दोनों ओरका जल मिल गया और फ़िरऊन ससैन्य मर गया । पश्चात् मूसा प्रसन्नतापूर्वक बनी इसराईलको अपने साथ लेकर चला । जब वह सीना पहाड़के समीप पहुँचा और पडाव किया तब मूसाका आसमानी रङ्गका परमेश्वर बैकुण्ठसे सीना पहाड़ पर उतरा । उस समय समस्त पर्वतसे धुँवाँ उठने लगा और वहाँ पर मूसा तथा आसमानी रङ्गके परमेश्वरसे बातें होने लगीं ।
इस स्थानपर खुदा (विष्णु महाराज) ने ऋग्वेदसे कुछ बातें निकालकर और सांसारिक रीत व्यवहारको इच्छानुसार वर्णनकर, उसे बनी इसराईलके योग्य समझकर, मूसाको प्रदान किया । वही किताब मूसाकी तौरीतके नामसे विख्यात हुई । यह पहली किताब है जो पश्चिमीय देशवासियोंको मिली । यद्यपि उसका ढङ्ग बदल गया पर उसको ऋग्वेदही मानना चाहिये । कोई तौरीत पढे और कोई ऋग्वेद पढे, एकही फल प्राप्त होगा, इसमें कोई संदेह नहीं है ।
बासठवाँ प्रकरण
दूसरी किताब जबूरका वृत्तान्त ।
यह किताब जबूर दाऊदके लिये उत्तरी, यह जबूर पुस्तक सामवेदसे है । सामवेद गीतों तथा पदोंसे भरा हुआ है सो वही जबूर पुस्तक है, दाऊद कवी बड़ा गवैया था । वह परमेश्वरके प्रेममें लीन रहा करता था, बडे प्रेमके साथ खुदाकी स्तुति रागोंमें किया करता था । उसके रागोंमें इतना प्रभाव था कि, पाषाण भी मोम होजाता था । दाऊदके गीतोंकी बड़ी प्रशंसा किताबोंसे लिखी है और मूल इसका सामवेद है । और सामवेदके गुण तथा उत्तमता संसारमें प्रगट है, अंग्रेजी
वेद तब और अब
भाषामें भी साम नाम गीतका है इसी लिये अंग्रेजीमें 'साम्स आफ डेविड' दाऊदकी गीतको कहते हैं, साम कहिये गीत और डेविड नाम दाऊदका है, अतः इस ज़बूरको सामवेद जानना चाहिये ।
त्रैसठवाँ प्रकरण
तीसरी किताब इञ्जीलका वृत्तान्त ।
यह इञ्जील ईसा नबीको उत्तरी । इस इञ्जीलको यजुर्वेद मानना चाहिये, अतः ये तीन किताब तो तीन वेदोंसे हैं, इन तीनों वेदोंको और इनके गुण मिलाकर देख लेना चाहिये ।
चौसठवाँ प्रकरण
चौथी किताब कुरानका वृत्तान्त ।
अन्तिम पैगम्बर हजरत मोहम्मद रसूलिल्लाह साहबके निमित्त कुरान उत्तरी यह किताब अथर्वण वेदसे है, यह अथर्वण वेदही है । जो बातें अथर्वण वेदमें हैं सोई बातें कुरानमें हैं । इस बातके प्रमाण अल्ला उपनिषदमें देखो, जो कोई अथर्वण वेदके अल्लाह उपनिषदको पढ़ेगा, स्पष्ट जान जावेगा कि यह कुरान वास्तवमें अथर्वण वेद है । अल्लो उपनिषदमें अल्लाके नाम और मुहम्मद रसूलिल्लाहकी स्तुति और उनके प्रतापकी स्तुति वर्णित है जो बातें कुरानमें हैं सो सब अल्ला उपनिषदमें तथा अथर्वण वेदमें हैं । यह कबीर साहबका बचन है कि, कुरान अथर्वण वेद है ।
पैंसठवाँ प्रकरण
आठ वेदोंका वर्णन ।
यह तो चारों किताबें पश्चिमी चार वेद हैं, पूर्वीय चारों वेदों सहित बही, संसारके पथदर्शक ठहरे । इन्हीं आठों वेदके आदेशानुसार सर्व मनुष्य चलते हैं एक जाति दूसरे जातिके साथ लड़ती और झगड़ती और एक दूसरेसे अपनेको अच्छा ठहराती है, अपनेको सत्यवादिनी तथा दूसरेको झूठी कहती है, उनको इस बातकी तनिक भी सुध नहीं है कि, उन सबका बनानेवाला एकही है तथा सबमें एकही बात है । ये आठों निरञ्जनकी ओरसे हैं, मनुष्योंको यह सुधही नहीं रही कि इन आठों वेदोंसे वे कैसे त्राण पासकते हैं । जिस अवस्थामें कि, आठों वेद स्वयम् धोखेमें पड़ रहे हैं, ऐसी अवस्थामें वे किस प्रकार मुक्तिमार्ग बता सकते हैं । इन वेदोंने न