कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 123, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंक्या समझेगे जिसमें जितना प्रकाश है उतनाही उसका कथन और वर्णन हैं, जैसे वेद पूर्वीय देशवासियोंके लिये हैं, वैसेही ये चारों किताबें पश्चिम देशवासियों के लिये उपयोगी हैं । सो यह पूर्वीय, चार वेद और पश्चिमीय चार किताब समस्त पृथ्वीपर संसारमें फैल गये, उन्हीं उन चारों पश्चिमीय किताबोंके नाम तौरीत, जबूर, इञ्जील और फुरकान अर्थात् कुरान है ।
पञ्चपनवाँ प्रकरण
तौरीतमें उत्पत्तिका वृत्तान्त ।
आदमकी पैदाइस ।
खुदाने छः दिनमें समस्त सृष्टिको उत्पन्न करने के पश्चात्, वैकुण्ठ बनाकर उसमें आदम और हौवाको रक्खा । उस वैकुण्ठमें आनन्द तथा सुख भोगकी सब सामग्रियाँ उपस्थित थीं । कल्पवृक्ष लगा था, अमृतके सुन्दर स्त्रोतें बहते थे । आदम अत्यंत निश्चितताके साथ जीवन निर्वाह करता था, पाप पुण्यकी सुध भी नहीं थी । पशुओंके भौंति लोक परलोकका उसको तनिक भी ज्ञान नहीं था, उस अवस्था में वह नन्हें बच्चोंके समान अज्ञानी था ।
कबीर साहबका कथन है कि, मनुष्यका बच्चा बारह वर्षपर्यन्त अनजान माना जाता है क्योंकि तब तक वह पशुके समानही रहता है । इसी प्रकार आदम बच्चोंके सदृश अनजान रहकर आनन्द उपभोग किया करता था । इन्द्रियोंके वशीभूत होना पशुओंका काम है ।
तब परमेश्वरने विचार किया कि, यदि आदम इसी अवस्थामें आनन्दकी तरंगोंमें डूबा रहा तो, यह जन्म भर मूर्खही रह जावेगा और इसकी संतान भी वैसेही होंवेंगी, इस कारण अवज्ञा करनेके अपराध पर वैकुण्ठसे बाहर निकाल दिया और कहा कि, वह उद्यम करके खावे कारण यह कि, ह'लालकी कमाईही द्वारा मनुष्यका अन्तःकरण शुद्ध होता है । हाथ पाँव इत्यादि भी कर्म निमित्तही मिले हैं । जब उसको भलाई बुराई का ज्ञान हो जायगा, तब उसके मनमें खुदाका खौफ पैदा होगा, तब संयम, नियम करके वह मनुष्यता तथा विद्या सीखेगा, और उसकी पशुता तथा मूर्खता उसमेंसे निकल जावेगी, क्योंकि, परमेश्वरका भयही ज्ञान तथा कर्मकी जड़ है जिसके मनमें परमेश्वरका तथा मृत्युका भय है वही मनुष्य है और सब पशु हैं । सो जब आदम वैकुण्ठके बाहर निकाला गया तो भिनहत
१ हलालकी कमाई उसे कहते हैं जो मनुष्य उचित परिश्रमद्वारा प्राप्त करता है ।