कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 122, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्यपुरुषका भक्ति हृदयसे करेगा, उसको सार शब्द मिलेगा, उसके द्वारा वह परम धामको सिधारेगा और फिर वह कालके पञ्चमें कदापि नहीं फँसेगा ।
तिरपनवा प्रकरण
पूर्व देशमें कालपुरुषका जीवोंको फसानेके लिये नाना मतमतान्तरका प्रचार करना ।
इतना कहकर तथा समस्त जीवोंको शान्त करके ज्ञानीजी पुनः सत्यलोक को चले गये । फिर निरञ्जनने नाना प्रकारका अपना पंथ जीवोंको बाँधनेके लिये पृथ्वीपर प्रचलित किया । ये जो समस्त मजहब हैं सब बंधनके निमित्त हैं, उद्धारके निमित्त कोई भी नहीं । इसी प्रकार कालपुरुषके अनन्त धर्म पन्थ पृथ्वीपर प्रचलित हुए ।
उपर्युक्त चारों वेद भारतवर्ष तथा पूर्वके अन्यान्य देशोंमें रहे । समस्त भारत तथा आसपासके देशोंमें चारों वेदोंकी शिक्षा फैल गयी जहाँ सब लोग वेदकी आज्ञा और ऋषियोंके आदेश पर बराबर चलते आरहे हैं ।
चौवनवाँ प्रकरण
पश्चिममें चार किताबोंका प्रचार ।
पश्चिमके देशोंके लोग पूर्व वेदसे बञ्चित रहे, इस कारण बह्मा विष्णु तथा शिव लोगोंको समय समय पर अनेक रूपोंमें दर्शन देते और उन्हें उपदेश दिया करते थे, तथापि उनके पास कोई प्रमाण नहीं था और न कोई विशेष किताब थी कि, जिसके आधार पर वे लोग चले ।
देखो मुहम्मद बोध और कबीर साहबके अन्यान्य ग्रंथोंमें ऐसा लिखा है कि, पूर्वोक्त चार वेदोंसे चार किताबें निकाली गयीं और पश्चिम देशके लोगोंको दीगयीं जिससे वे लौकिक पारलौकिक मर्यादाका ठीक ठीक पालन कर सकें । यद्यपि जो उपदेशोंमें चारों वेद और चारों किताबोंके तनिक भी विभिन्नता नहीं है, तथापि देश कालके विचारसे भारतके लोगोंके ढङ्गपर चारों वेद दिये गये हैं और पश्चिम देशवासियोंके आचार व्योहार पर चार किताबें प्रदान हुईं । जिस जातिके निमित्त जो किताब उत्तरी उसमें उसकी रीत व्योहार लिखे हुए हैं । प्रत्येक जातिके निमित्त प्रत्येक किताब बनी है और पैगम्बरों द्वारा पृथ्वीके लोगोंको उनकी शिक्षा दी गयी । प्रत्येक पैगम्बर अपनी समझके अनुसार प्रचार करता आया, यथार्थ भाव और भेदको तो कोई दिव्य दृष्टिवाले साधुही समझते हैं दूसरे