कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1141, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंबही वह नगर है । अतः कुछ भी क्यों न हो, दोनोंमेंसे एक न एकही होगा । यदि इस नगरकी शोभा और बनावट अब वैसी नहीं रही है पर अब तक नगर वर्तमान है उसको मायाने एक पलमें बनाया था यह कथा भी पूर्वोक्त कथाओंके समान है ।
सिकन्दर बादशाह और फकीर ।
किसी समय एक फकीरने बड़े सिकन्दरकी दावत की । फकीरने अपने चेलेसे कहा कि, तू अमुक मंदानमें खड़ा होकर अपनी झोली हिलाया कर । गुरुकी आज्ञानुसार शिष्यने झोली हिलाना आरम्भ किया थोड़ेही समयमें उस मंदानमें एक नगर बस गया । राजाओंके योग्य सब सामग्री इकट्ठी होगई, सहस्रों दास दासियाँ उपस्थित हो गये, पाकशाला खड़ी होगई, नानाप्रकारके भोजन तैयार होने लगे । एक ओर नाच रङ्गका सामान इकट्ठा हुआ, आनन्द कुतूहल होने लगा इस प्रकार फकीरने बादशाहकी बड़ी आवभक्ति की । बादशाह जब भोजन करके शयनागारमें गया तो वहाँ एक परम सुन्दरी स्त्री भी उसके साथ सोई पर जब वे दोनों सो रहे थे सम्भोग करते २ अन्तका समय निकट आया तो उस फकीरने अपने चेलेसे कहा कि, अब तू झोलीका हिलाना बन्द कर दे, शिष्यने जैसेही झोलीका हिलाना बन्द कर दिया वैसेही सब रचना अन्तर्धान होगई, सूनसान उजाड़ दीखने लगा न कोई जीवधारी रहा न कोई मकान, न कोई पदार्थ ही वहाँ देखनेमें आया । बादशाहने देखा कि, मैं औंधे मुंह पृथिवी पर पड़ा हूँ, न वह स्त्री है, न वह पलंग । अपनेको नङ्गा पृथिवी पर पड़ा देखकर अनुमान किया कि, इस फकीरने मेरे साथ ठट्ठा किया है, क्रोधमें आकर फकीरको बहुत ढुँढवाया पर कहीं उसका पता न लगा न उसका चेलाही मिला । इस प्रकार उस फकीरने बादशाहको यह उपदेश किया कि, न तू कुछ है न तेरी बादशाहतही है ।
इन्द्रकी कथा ।
योगवाशिष्ठमें लिखा है कि, किसी समय देवताँ और दैत्योंमें युद्ध होने पर इन्द्र दैत्योंसे परास्त होकर भयसे भागा । अपने योगबलसे बहुत सूक्ष्मरूप बनाकर एक परमाणुमें घुस गया । अब उसमें से दैत्योंके भयके कारण वहाँसे निकलना नहीं चाहता था । पर उसे तो तीन लोकका राज्य भोगना था इस कारण उसी परमाणुमें ही तीन लोक दीख पड़े । सब सामग्री राजा, इन्द्रको उसी परमाणुमें मिली उसी परमाणुमें दश पीढ़ी तक इन्द्रका राज्य रहा ।