कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1193, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहिन्दू धर्मकी दुर्दशा ।
संसारी अर्थात् गृहस्थाश्रमी फलदार वृक्षके समान हैं; जैसे फलदार वृक्षमें जब फूल फल लगते हैं उस समय नाना प्रकारके पक्षी आकर उस पर बासा लेते हुए कलोलें करते हैं; नाना प्रकारके मनोहर शब्द सुनाते हैं, जिसके सुननेसे बड़ा आनन्द प्राप्त होता है । जब वृक्ष फलदार नहीं होता, उसमें फूल फल नहीं लगते तो, उसपर काक, उलूक आदि आकर बासा लेते हैं । वेही अपनी कान फाड़नेवाली वाणी बोलते हैं, जिससे सुननेवालोंको बहुत बुरा लगता है । उससे घृणा उत्पन्न होती है । फिर वह वृक्ष काटने और जलानेहीके योग्य हो जाता है । ऐसेही गृहस्थाश्रमी जब संत और गुरुकी सेवा करते हैं तबतक भक्ति मुक्तिकी आशा होती है, नाना प्रकारके गुण उदारता सत्सङ्ग, दया, क्षमा आदि सब उनमें आकर स्थित होते हैं पर जब कृपणता और संसारी विषय भोगमें पड़कर अपना धर्म छोड़ बैठते हैं साधु गुरुकी सेवा छोड़कर सच्चे संतों और विद्वानोंकी अप्रतिष्ठा करने लगते हैं, उस समय पाश्र्वताको प्राप्त हो, नाना प्रकारके पाखण्डोंको धारणकर, नर्कके अधिकारी होते हैं ।
मुसलमानोंने बहुत अत्याचार और अन्यायसे हिंदुओंको मुसलमान बना लिया । जिन्होंने मुसलमान होना अस्वीकार किया, वे मार डाले गये, जो अपने मृत्युसे डरा वह मुसलमान हो गया पर तो भी हृदयसे अपने धर्मकाही प्रेमी रहा । क्योंकि जो, लोग मुसलमान हो गये उनकी सन्तान अद्यापि इस बातका स्मरण रखती है कि, हमारे पूर्वज क्षत्रिय, ब्राह्मण अथवा अमुक हिन्दू जातिके थे; जैसे किसी राजा और बादशाही सन्तान याद रखती है कि, हमारे पूर्वज राजा अथवा बादशाह थे ।
समस्त पृथ्वीभरमें हिन्दू जाति सबसे श्रेष्ठ और प्रतिष्ठित जाति है । भारतवर्ष सब देशोंका शिरोमणि है । भारतवर्ष और हिन्दुओंसेही समस्त, संसारमें धर्मका नियम फैलता है । बड़े बड़े सिद्ध महात्मा, ऋषि मुनि, औरतार तत्वज्ञ आदिका प्रागट्ठ यहाँही होता है । यहाँकेही ऋषि, मुनि, विद्वान् सब संसारके लोगोंको शिक्षा देते, लौकिक पारलौकिक मार्ग बतलाते हैं । इस देशका नाम हिन्दुस्थान है, अन्य देशोंको म्लेच्छ स्थान कहते हैं, क्योंकि, वर्णाश्रम, जाति आदिका सर्वोच्च विचार और विभाग इसी देशमें है, दूसरे देशमें नहीं है । वर्णाश्रमका विवेक और विभाग ऐसा उच्च और सर्वोत्कृष्ट सिद्धान्त है कि, जिसके द्वारा अपने वर्ण आश्रमका कर्तव्य शास्त्रानुसार करता हुआ मनुष्य शीघ्रही मुक्तिपथको पा लेता है । भारतवासी अपने धर्मके ऐसे प्रेमी हैं कि,