भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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हिन्दुओंके मुसलमान होनेका कारण ।

१-अपने धर्मको न जानना । २-दरिद्रता अथवा लोभ । ३-विषयसे वासना की प्रबल कामना—उसमें खूब खुल खेलनेकी प्रबल इच्छा । ४-किसी स्त्रीकी आशक्ति । ५-उच्च पद अथवा मान बड़ाईकी इच्छा अथवा खुशामद । ६-विधर्मियोंकी विशेष संगति और उनका सहवास । ७-किसीके बहकाने और धोखा देनेसे जैसा कि, प्रायः ईसाई मिशनरी करते हैं । ८-संयोगन किसी हिन्दूका भूलसे ईसाई अथवा मुसलमानका पानी पी लेना हिन्दुओंका फिर अपनी जातिमें न मिलाना ।

यही आठ कारण हैं कि, हिन्दू अपने धर्मको छोड़कर ईसाई अथवा मुसलमान हो जाते हैं नहीं तो हिन्दू भी कभी अपने धर्मको नहीं छोड़ते ।

धर्म रक्षक ।

कबीर साहबने धर्मकी रक्षाके लिये तीन रक्षक नियत किये हैं । १ गुरु २ सन्त और ३ ग्रन्थ । जहां ये तीनों रक्षक वर्त्तमान होते हैं, वहां किसी प्रकारकी त्रुटि नहीं होती । जो इन तीनों रक्षकोंको छोड़ देगा, उनकी शरण न रहेगा, वह अवश्य धर्मसे पतित हो नीचगतिको प्राप्त होगा । उसको धर्म लाभ न होगा । इस कारण इन गुरु, सन्त और ग्रन्थ तीनोंकी प्रतिष्ठा करनी उचित है ।

प्रथम गुरुकी सेवा पूजासे अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है दूसरे सन्त भी गुरुकीही मूर्ति हैं । तीसरे सबका मूल ग्रन्थ भ्रमकी टट्टी तोड़ने और सत्यपथको बतलानेवाला है । तीनों (गुरु, सन्त, ग्रन्थ) को एकरूप जानकर, तीनोंकी समभावसे सेवा और पूजा करना उचित है । क्योंकि, गुरु और संत बिना ग्रन्थका आशय मिलना कठिन है । ग्रन्थ बिना संत और गुरुका उपदेश करनेका दूसरा द्वारही नहीं है । ग्रंथोंकेही अर्थको विचारकर संत गुरुके पदको पहुँचते हैं, फिर उन्हीं ग्रन्थोंका उपदेश दूसरोंको सुनाते हैं । जो इन तीनोंमेंसे किसी एककाभी अनादर करेगा वह धर्मसे पतित हो नरकका अधिकारी होगा । इस समय भारतवासी इन तीनों धर्म रक्षकोंसे श्रद्धाहीन हो रहे हैं, नहीं तो अन्य धर्मियोंके आखेट क्यों बनें ? हिन्दू लोग धर्म ग्रंथों और धर्मपुस्तकों तथा संत और गुरुजनोंको छोड़ अन्य धर्मियोंके धर्म ग्रंथ तथा अन्य भाषाको बड़ी श्रद्धा और भक्तिसे पढ़ते हैं उन्हींके धर्म गुरुओंसे उपदेश लेते हैं तो हिन्दू धर्म क्यों न अवनति हो ईश्वर और मृत्यु दोनोंके भयको मुलाकर लोग अधर्ममें फँस गये धर्म छो बैठे ।

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