भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1191

अधीनतासे नहीं निकल सकता । इसमें कुछ भी संदेह नहीं कि, सारे संसारके लिये एकही ईश्वर है । ईश्वर और शास्त्र होनेपर भी भिन्न भिन्न मजहब व रीति क्यों हुई ? इसका कारण यही है कि, मनुष्य अपने यथार्थ मनुष्यत्वसे रहित हो रहे हैं, देखनेकोही मनुष्य हैं पर यथार्थमें मनुष्य नहीं हैं । यदि इनको अपने धर्मकी सुधि होती तो एक धर्मको छोड़ दूसरे धर्मको ग्रहण न करते । जब कि, सब धर्मोंका प्रवर्त्तक एकही आचार्य है तो दूसरे धर्मको धारण करने एवं एकको छोड़नेसे क्या लाभ ? लोगोंकी बुद्धिपर अन्धकार छा रहा है, जिससे अपने धर्मके आशयको न समझकर, एक दूसरेके साथ, लड़ते झगड़ते, वाद-विवाद करते और भला बुरा कहते हुए मरते मारते हैं ।

विशेषतः वे हिन्दू लोग जो किसी कारणसे मुसलमान हो जाते हैं, यदि उनसे पूछो कि, तुम मुसलमान क्यों हुये ? तो प्रगटमें तो वे बहुत बातें बताते और अपने अवगुणोंको छिपानेका यत्न करते हैं पर भीतर ही भीतर हृदयमें पछताते हैं । कोई कोई स्पष्टही कह देते हैं कि, अपने धर्मकी अनभिज्ञता के कारण हमने अपना धर्म छोड़ दिया, अब हिन्दू लोग मुझे अपने धर्ममें नहीं लेते ।

भवतारण ग्रन्थमें लिखा है कि, कबीर साहबका वचन है कि, पूर्व जन्मके बड़े पुण्य और शुभ कर्मोंके प्रतापसे उच्चकुलमें जन्म होता है सांसारिक वैभव सम्पन्न होता है । पूर्वजन्मके ही पुण्य प्रतापसे रूप यौवन और उत्तम कुल मिलते हैं, जितने धनी और राजा महाराजा अथवा उच्चपद पर स्थित हैं, सब उत्तम और श्रेष्ठ कुलकेही होते हैं । अतः ब्राह्मण, क्षत्रियादि जो उत्तम श्रेष्ठ जातिके हैं वे कैसे प्रतिष्ठाके पात्र हैं ? यहाँतक कि, यदि इन जातियोंमें कोई विशेष गुण भी न हो तो भी अपनी उत्तम जातिके कारण प्रतिष्ठाको प्राप्त कर लेते हैं । यह उत्तम कुलकी विशेषता और गुण हैं । इसी प्रकार मुसलमानोंमें भी कुलवान् सैयदोंकी सब सेवा और भक्ति करते हैं वरन् ईश्वर भी श्रेष्ठ कुलवानोंपर विशेष दया करता है । देखो तौरेतमें—इब्रानी उत्तम कुलके थे उनपर ईश्वरकी विशेष दया थी । जो हिन्दू मुसलमान हो जाते हैं, अथवा ईसाई धर्मको स्वीकार कर लेते हैं वे क्या प्राप्त करते हैं ? उच्चकुल और श्रेष्ठ स्थानसे भ्रष्ट हो नीचकुल और अधम स्थानको ग्रहण करते हैं, अन्तमें जब वे समझते हैं तब शोककर पश्चात्ताप करते हैं । जैसे कि, बादशाह दरिद्र हो जानेपर करता है वैसेही हिन्दू अपने धर्मको छोड़कर दूसरे धर्मरूपी दरिद्रताको स्वीकार करते हैं । कोई हिन्दू उच्च और श्रेष्ठ कुलका ईसाई अथवा मुसलमान नहीं होता वरन् आठ कारणोंसे कोई कोई अपने धर्मको छोड़ता है ।