कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1205, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंविश्वम्भरका विश्वास रखकर अपने धर्मपर स्थिर रहना चाहिये । कोई क्यों न हो जबतक अपने कर्तव्यपर दृढ़ और स्थिर रहेगा, सुखसे रहेगा, जब अपना धर्म (कर्तव्य) छोड़कर पराये, धर्ममें प्रवृत्त होगा अवश्य दुःख और कष्ट भोगेगा ।
तीसा यन्त्रकी साखी ।
अपने २ धर्ममें सबको सुख उपजे सब काल ।
जिन निज धर्म दृढ़कै गह्यो तेई भये निहाल ॥
अध्याय २३
गजलोंसे उपदेश
गजल ।
न पावे राह कोई साधु गुरु बिन । दिखावै चाह सूली साधु गुरु बिन ॥
बजारी जोर घर हरगिज न पावै । हो नालः आह सदहा साधु गुरु बिन ॥
करे तदबीर सदहा गर शबो रोज । गदा और शाह नहिं कोई साधु गुरु बिन ॥
कवाकिब ओर सवाबित सब खड़े हैं । मेहर और माहनहिं कोई साधु गुरु बि०
बहर जानिव तमाशा साधु गुरुका । न क़िबला गाह पावै साधु गुरु बिन ॥
जिधर जावे उधर हैरांही आजिज । न हो आगह आदम साधु गुरु बिन ॥
गजल— चल उतर पार साधु सेवासे । पावै खुद यार साधु सेवासे ॥
होवे हरदो जहामें बख्तावर । गुल होवे खार साधु सेवासे ॥
जहां न पहुँचे कोई तू जाय वहां । पेश सरकार साधु सेवासे ॥
अक्ले इन्सानकी है रसा न जहां । पहुँचे दरबार साधु सेवासे ॥
पावै बहु न्यामत न जाने कोई । अस्ल इसरार साधु सेवासे ॥
बस्ल बेशक हो अस्ल अपनेसे । कुलके करतार साधु सेवासे ॥
आवे हरगिज न कालके पञ्जे । हो छुटकार साधु सेवासे ॥
पागलोंका जो घर है भवसागर । छोड़ संसार साधु सेवासे ॥
आगके घरमें आपड़ा आजिज । होवे गुलज़ार साधु सेवासे ॥
अटका जो काली धार हो, सत्गुरु न जिसका यार हो ।
हरगिज न बेड़ा पार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥
सल्लाह नहिं मल्लाहसे, मुहूरिभ नहीं उस राहसे ।
इस बहर में न करार हो, खिदमत बिना गुरु साधु की ॥
गुरु साधुको जो सेवता, पावे सो पूर्ण देवता ।
रहबर न सो सत्तार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥