कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1206, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसदहा करे तदवीर जो, हरगिज न पहुँचे तीरसो ।
गरदावमें लाचार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥
खेवट नहीं गुरु साधु जहां, किशती न होवे पार वहां ।
वेशक अज्ञाबुननार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥
यह कौल सत्य कवीरका, हर दो जहाँ गुरु पीरका ।
नहिं पुरुषका दादार हो, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥
सदहा जो गोता खायेगा, आजिज बड़ा पछतायगा ।
पावे नहीं गङ्कारको, खिदमत बिना गुरु साधुकी ॥
बिन साधु गुरुसारेही मुरदार हुये । इनकेही मेहरसे सुर मुनि सरदार हुये ॥
खाक पा सुरमैं जिनसेहै मनौवर मह व मेहर । गुरुसन्तकदम चूमते भवपार हुये ॥
सतसङ्गको पाये सोई सतपदको मिले । बिन साधुगुरु कोई न गमख्वार हुये ॥
सतसङ्गही हर सित्म व हर कूचा गली । बदबख्त न देखते हैं लाचार हुये ॥
सत्सङ्गकी तारी जहांमें आजिज । बिन सन्त गुरु दालिख दर नार हुये ॥
पावे आराम साधु गुरु सेवा । लाभ सत नाम साधु गुरु सेवा ॥
काल जञ्जाल दूर हो लारेव । टूट जा दाम साधु गुरु सेवा ॥
जब मेहर इनकेसे हुआ पुरख्त । फिर न हो खाम साधु गुरु सेवा ॥
दर्द हासिल हो तुझको रोजो शव । सुबह और शाम साधु गुरु सेवा ॥
लात घर जा ऊपर मुअल्लें अर्श । पहुँचे बदबाम साधु गुरु सेवा ॥
आजिजे अबदी हयातको पावै । जिन्दगी तआम साधु गुरु सेवा ॥
मुरब्बा ।
वहां जाऊँ मेरा दिलबर जहां है । दिखा इसको जो दर परदा निहां है ॥
किधर ढूंढूं वह मुरशिद मिहरबाँ है । हुये सन्मुख हैं सब गुरु मुख कहाँ है ॥
कोई गुरुमुख होवै सो राह पावै । जो मन्मुख शौर दरियामें बहावै ॥
यह आलम भूल सदहा गोता खा े । हुये मन्मुख हैं सब गुरुमुख कहाँ है ॥
कोई गुरुमुख मुझे वह गुरु मिला दो । बला सद जन्मकी पलमें टला दो ॥
इस आजिज नातवां वह रह चला दो । हुये हैं मन्मुख सब गुरुमुख कहाँ है ॥
तन व मन धनसे हो गये गन्दे । जिससे तू पडगया है यम फन्दे ॥
है तू मेहमांसरामें दिन चन्दे । मौत अपनी तू याद कर बन्दे ॥