कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1207, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंनहीं तन है नहीं धन तेरा । हुआ गाफिल है कालके घेरा ॥
जोनि सदहामें हो तेरा फेरा । मौत अपनी तू याद कर बन्दे ॥
रात दिन मौत हर घड़ी कर याद । कर दिया उम्र अपनी तू बरबाद ॥
पापका बोझ सर पै लीहै लाद । मौत अपनी तू याद कर बन्दे ॥
दोस्त अपनेसे तूने पीठ दिया । दुश्मनाने रख प्यार डीठ दिया ॥
ज्ञान और ध्यान गहरा गीठ दिया । मौत अपनी तू याद कर बन्दे ॥
दोस्त दुनियाके तुझको मारेंगे । आग दोजखमें खींच डारेंगे ॥
कौन आजिज तुझे उवारेंगे । मौत अपनी तू याद कर बन्दे ॥
श्रृङ्गल ।
सङ्ग सोजांसै है न डर जिनको । रह बदोजखके रख है दर जिनको ॥
सालहों की सलाह इनसे कहाँ । साजे सुबहों सजें घर जिनको ॥
जानै सो हेच खाकसारोंको । हक करे जेर और जबर जिनको ॥
डूब कर सारे मर गये भोंदू । अकल आला मदद न सर जिनको ॥
दीदना दीद इनकी है आजिज । आता है बहुत करों फर जिनको ॥
यथा—बदोदारैन सुर्खरू गुरुमुख । होवे तहसीन चारसू गुरुमुख ॥
उनसे कोई न जगमें बख्तावर । खल्क खुश और नेकखू गुरुमुख ॥
दोस्त इनका है सब जमीनो ज़मा । कोई बाकी नहीं अदो गुरुमुख ॥
सारे कामोंसे हो गये फ़ारिग । रही कोई न जुस्तुजू गुरुमुख ॥
तर गये सो जहाज गुरु पर बैठ । देख हरगिज न कालको गुरुमुख ॥
अम्बरो ऊद इत्रियात बराह । पुर बहर सिम्त मुश्को बू गुरुमुख ॥
दस्तगीरी हैं जिनको सत गुरुकी । बेकार होवै एक मू गुरुमुख ॥
तन मन व धनजो अपना बार आजिज । इससे बढ़कर न गुफ्तुगू गुरुमुख ॥
श्रृङ्गल ।
प्रह्लाद पिता साधुकी तौहीन किया । रावनभी गया साधु की तौहीन किया ॥
निवंश हुआ कंस जो था उसका चिरागादी । उसको बुझा साधुकी तौहीन किया ॥
दुर्योधन मगरूर हुआ शौकतों शान । बाकी न रहा साधुकी तौहीन किया ॥
राजा सगर पूत जो थे साठ हजार । सब गर्द मिला साधुकी तौहीन किया ॥
कृष्ण औलाद ज़बरदस्तो मगरूर हुये । गारतसो किया साधुकी तौहीन किया ॥
शह्राद जो तामीर किया बागे बिहिश्त । पत्ताल चला साधुकी तौहीन किया ॥
नमरुदहो मरदूद भरा कुब्र जो मराज । मच्छरसे खिला साधुकी तौहीन किया ॥