भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1212

पढ़ लिया हिन्दू इल्म अंगरेजी । भर गया जबकि इल्म अंगरेजी ॥
औबल अल्लाह नामको भूला । आ बसा जब कि इल्म अंगरेजी ॥
जब न अदलाह रहा कहाँ गुरु पीर । आ समा जब कि इल्म अंगरेजी ॥
नहीं गुरु पीर पेशवा नहीं रब्ब । घर किया जह्य कि इल्म अंगरेजी ॥
जब न रब्ब है तो साधु कहाँ आजिज । हक भला जबकि इल्म अंगरेजी ॥

अंग्रेजी कुतुब कित्सा जो मेरे नज़र आया ।
आगाज़ अल्लाह नामसे भी सो सब हज़र आया ॥
कोई न कहै राम नहीं गाड़ न यहबाह ।
बेसमझीहीमें सारी उमरका गुज़र आया ॥
अल्लाह जो किया तर्क तो दिल साफ़ कहाँहो ।
तनपरवरीको फेर तनासुखका घर आया ॥
इन्सानी व हैवानी हालतसे गुज़र कर ।
फिर जामः नबातात जमादात दर आवा ॥
गरदाब चौरासी यही दरियामें है आजिज ।
खागोता सद आदम तन यह फिर आया ॥

बैठ जा साधु सङ्ग़तमें । सरझुका जल्द साधु सङ्ग़तमें ॥
तनो मन धनको अपने कर कुरबान । धर बना जल्द साधु सङ्ग़तमें ॥
साधु रहबर हैं दीन दुनिया के । बखश ला जल्द साधु सङ्ग़तमें ॥
जाके तू अपने अस्ल रूपको देख । इल्म पा जल्द साधु सङ्ग़तमें ॥
जगमें ऐसा न दोस्त कोई आजिज । दरदरा जल्द साधु सङ्ग़तमें ॥

कर दिया खार तूने ऐ कलियुग । दूरकी यार तूने ऐ कलियुग ॥
न बफ़ाही नहीं है खुश बुलकी । घर दिया नार तूने ऐ कलियुग ॥
नेकहै कोई और सबको क्या । बद बिकिरदार तूने ऐ कलियुग ॥
नहीं गुल है कहीं नहीं बुलबुल । की है पतझाड़ तूने ऐ कलियुग ॥
अब कहाँ मौसिमे बहारी है । भर दिया खार तूने ऐ कलियुग ॥
गुल नहीं है तू उड़ गई बुलबुल । बूम बैठा ऐ ऋतूने ऐ कलियुग ॥
दी भर सारे जगमें जागो ज़मन । सिम्तहर चार लूले ऐ कलियुग ॥
इक ज़हरदार जो हवा लाया । नाग फुंकार तूने ऐ कलियुग ॥
मुरदः सारे हुये कोई ज़िन्दा । दाब दर गार तूने ऐ कलियुग ॥
है रम्क जान बाकी आजिजके । कर दिये मुरदार तूने ऐ कलियुग ॥