भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 1264

अध्याय २४.

प्रश्नोत्तर ।

ब्रह्म और माया ।

१ प्रश्न-ईश्वर क्या है ?

उत्तर - ईश्वर, खुदा, गाड़, एवाह, रहीम, राम, करीम, अल्लाह, आदि ईश्वरके जितने नाम जगमें प्रसिद्ध हैं वे सब मायाके नाम हैं क्योंकि, नाम रूप माया है । सृष्टिको उत्पन्न करनेवाली भी माया है । ईश्वर भी मायासे है । वही माया सृष्टिमें शासन करती है । सब खेल उसीका है ।

२ प्रश्न-माया क्या है ?

उत्तर - माया ब्रह्मकी अर्द्धांगिनी है । ब्रह्म शुद्ध और चैतन्य है । माया अचेत और जड़ है । माया सर्वदा ब्रह्मके सङ्ग रहती है जैसे कि, वृ के साथ छाया रहती है । जिस प्रकार नदीमें वृक्षका प्रतिबिम्ब पड़ता है उसी प्रकार ब्रह्म जीव में रहता है इसी कारण ब्रह्म जीवसे लिप्त और अलिप्त है अर्थात् भिन्न और अभिन्न है । मायासे पार ब्रह्मही ब्रह्म है दूसरा कुछ नहीं है । सर्वव्यापक ब्रह्म है, उसीके सङ्ग माया रहती है । जिस प्रकार वायुसे जलमें तरङ्ग उठते हैं जबतक वायु नहीं डोलती तबतक तरङ्ग नहीं उठते उसी प्रकार ब्रह्ममें माया अर्थात् फुरना उठती है तब सब कुछ होता है । जब शान्त हो जाती है तब रचनाभी शान्त हो जाती है ।

३ प्रश्न - ब्रह्मका नाम क्या और मायाका नाम कौनसा है ?

उत्तर - ब्रह्मके पाँच नाम हैं । ब्रह्म, काल, कर्म, जीव, स्वभाव । जो अखण्ड है, अविभाज्य और अविनाशी है उसको ब्रह्म कहते हैं । स्वयम् होनेवाले को काल कहते हैं । समस्त कर्मोंको कर्म कहते हैं । जो अपनेको न जाने उसे जीव कहते हैं । स्वभाव उसको कहते हैं जिससे शुभ अशुभ दुःख सुखका ज्ञान हो ।

ऐसेही मायाके पाँच नाम हैं । शून्य, शक्ति, माया, आकाश और प्रकृति । माया इस कारन कहते हैं कि, ब्रह्मके सङ्ग रहती है । आकाश इससे कहते हैं कि, शरीरकी आदि सृष्टि उसने की है । इस लिये शून्य बोलते हैं कि, जड़ हैं । शक्ति इस वास्ते कहते हैं कि, सब सृष्टिपर प्रबल है । सबपर अधिकारिणी है । प्रकृति इस कारण कहते हैं कि, यह ब्रह्मकी अर्द्धाङ्गिनी है ।

४ प्रश्न - प्रथम आपने कहा था कि, जो कुछ जाननेमें आता है सो सब नाम रूप माया है । अब ब्रह्मकी और मायाकी भिन्न भिन्न व्याख्या बतलाते हो इसका क्या कारण है ?