कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1265, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंउत्तर — उसका यही कारण है कि, मायाके दो रूप हैं । एकको ब्रह्म एवं दूसरेको माया कहते हैं । जैसे पुरुष और स्त्री दोनों माया हैं । संसारका व्यवहार जोड़ेके बिना नहीं चलता । द्वैतही संसारका मूल कारण है । मायानेही अपने दो स्वरूप बनाकर संसारको खड़ा किया है । माया और ब्रह्मके संयोगसे संसारकी उत्पत्ति, स्थिति और नाश है । प्रथम पुरुषसे प्रकृति, प्रकृतिसे महात्त्व, महात्त्वसे अहंकार, अहंकारसे तीनों गुण, तीनों गुणोंसे आकाश, आकाशसे वायु, वायुसे अग्नि, अग्निसे जल और जलसे पृथिवी होती है । मायाही शरीरका कारण है । ब्रह्म चैतन्य है । जो आपको जानता है (ज्ञानस्वरूप) चैतन्य है । जो आपको जाने, अन्तःकरणको जाने, ज्ञान इन्द्रियको जाने, पाँचतत्त्व और तीनों गुणोंको जाने, सर्वको जाने वो चैतन्य ब्रह्म है । जड़ माया है दोनोंका सदाका सम्बन्ध है ।
दर्शन हुआ या नहीं ।
५ प्रश्न — लोग कहते हैं कि, आदम, नूह, इब्राहीम, मूसा तथा भारतवर्षके भक्तलोगोंने ईश्वरका दर्शन पाया । यह उनका दर्शन पाना सत्य है अथवा असत्य ?
उत्तर — समस्त संसार पठित अपठित मृतकके समान है । जिसको ज्ञान है वही जीवित है । मृतक दर्शन नहीं करते जीवितही दर्शन करपाते हैं । हाँ, सदाचारियोंने जो कुछ अपनी आँखोंसे देखा है वो उनका शुद्ध अन्तःकरण होनेके कारण उन्हींका संकल्प उनके ईश्वरके रूपमें देख पड़ा । वह संकल्प मात्रही हुआ । इस कारण जो उनने देखा सब मायाही देखी । ब्रह्म जो आवाङ्ग-मनसगोचर है उसको आत्मज्ञानके बिना जानना दुर्लभ है । जो कुछ बहिर्दृष्टिसे देखनेमें आता है वो असत्य जड़ माया मात्र है । मूसा और दूसरे नबियोंका ईश्वर आत्म ज्ञानसे रहित था । उसको अन्तर्दृष्टि नहीं थी । हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, यहूदी, पारसी, आदि सभी धर्मवाले ईश्वरके यथार्थ स्वरूपको जाने बिना परस्पर रागद्वेष करके एक दूसरेसे लड़ते झगड़ते हुए सुखी दुखी होते हैं । सारे संसारमें जो ईश्वरको व्यापक नहीं जानता वह पशु है । पशुमें और उसमें कुछ विभिन्नता नहीं है । जैसे पशु अज्ञानतासे मृतकके समान हैं उसी प्रकार आत्मज्ञान रहित सभी मनुष्य अविद्याके अन्धकारमें पड़े मृतक हो रहे हैं ।
दृष्टान्त — जब मुसलमानोंका राज्य हुआ तो धर्म द्वेषमें पड़कर उन्होंने हिन्दुओंके ऊपर बहुत अत्याचार करना आरम्भ कर दिया । हिन्दुओंके यज्ञोपवीत तोड़ लिये जाते थे, मायेके तिलक चाटलिये अथवा मिटा दिये जाते थे, इसी प्रकार अनेक उपद्रव और अत्याचारोंसे हिन्दुओंके धर्म और वैभवको नाशकर अनन्त दुःख पहुँचाये जाते थे । यह बात प्रसिद्ध है कि, उसी समय मुथरेशाह नामक एक