भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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गरीबदासजी व ऋषि मुनि सदासे करते आते हैं। वही जिन्दा बाबा सब संसारका गुरु आचार्य है।

मुखम्मस तरजीया बन्द ।

तुही था इन्ददा आइन्दा बाबा । तेरा सत नाम जम अरजिन्दा बाबा ॥

तुही हर हाल है खुरसन्द बाबा । गुनह गारों का तू बखिश्न्दः बाबा ॥

तुही बन्दा खुदामें जिन्दा बाबा ।

जो पैदायश के पहिले नाम ज्ञानी । निरंजन पर तू किया हुक्मरानी ॥

तू खुद खुदरम रिहाई चार खानी । तुही है नावमें अरविन्दः बाबा ॥ तु० ॥

जो सतयुग सत सुकृत साहबको टेरा । है त्रेता में मुनिन्दर नाम हेरा ॥

कहा पहचान सबमें जलवः मेरा । हमा मौजूद हूं पायन्दः बाबा ॥ तु० ॥

सों द्वापर जुगमें करुणामय गुरु है । नबी पीरो फकीरों खबरू है ॥

जहां देखो वहां ही तूही तू है । जो ढूढेंगे तुझे याविन्दः बाबा ॥ तु० ॥

जो कलयुग पापने आदम डुवाया । तुही कब्बीर साहब तब कहाया ॥

तुही सत नाम इन्सांसं जपाया । तुझे पहिचान सो फर्खुदः बाबा ॥ तु० ॥

जो चारों युगमें और तीनों जमानः । बता इन्सानको नामे निशानः ॥

बनी आदम पड़े जम कैंद खाना । तुही काट कानकर जमफन्द बाबा ॥ तु० ॥

जो ब्रह्मा विष्णु शिव यह तीनों भाई । तेरी तालीम इनमें नहीं समाई ॥

न रमताराम सो पहिचान पाये । सो पावें प्रेमसे जोइन्दः बाबा ॥ तु० ॥

सिखाया योग तू रघुनाथजीको । मिले जिस ढंग से सो अपने पीको ॥

तुझे देखे जो छोड़े खुदखुदीको । तुही सत्त पुरुष जम गरिन्दः बाबा ॥ तु० ॥

बता रह कृष्ण और दत्ते दिगम्बर । सिखाया तूने सब पीरो पगम्बर ॥

मुहम्मदको दिखाया अपना घर । तुझे देखे शिवा शर्मिन्दः बाबा ॥ तु० ॥

तुही मुशिद हकीकी सबका सब जा । न तू नुतफा रेहमसे होवे पैदा ॥

जमानेके आशिकों सब तुझपैशेद । तू दूत और भूतका तरसिन्दः बाबा ॥ तु० ॥

जो था आदम फरिश्तोंमें गिरामी । वह आया देखकर बे इन्तजामी ॥

बना गुरु अपना रामानन्द स्वामी । बहर शै नूर तुझ ताविन्दः बाबा ॥ तु० ॥

दिथा वैराग मारगको बुजुर्गी । दिखाया काल पुरुषकी सतर्गी ॥

जो खावे जीवको अजराह सर्गी । तुही जम दूत सरबरिन्दः बाबा । तु० ॥

तुही सारे जमानेमें और जिमीमें । तुही सबकार दुनिया और दीमें ॥

तुही तातार तुकोँ अर्ब चीमें । फरंगिस्तां हवशो हिन्दूबाबा ॥ तु० ॥

जिसे तूने बताया अपनी तदबीर । सो बेपरवाह गया दरियाके तीर ॥