कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 1321, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंनानकसाहबकी सब वाणीका ठिकाना कहीं भी नहीं लगता । यद्यपि इन लोगोंने कबीर साहबकी बड़ाई और महिमा अपने ग्रन्थोंसे निकाल दी है किसी २ साखीको पलट दिया है, तित परभी कबीरपंथकी सबचाल और वाणीकी रीतिको अबतक नहीं पलट सके हैं । कारण यही है कि, यथार्थको कोई कहाँ तक झूठ बना सकेगा ।
दादुरामके ग्रन्थकी पिण्ड पहचानकी साखी देखो —
दादूपंथी वचन ।
जो था कंत कबीरका, सोई बर बरिहों ।
मनसा वाचा कर्मना, चित और न धरिहों ॥
कबीरपंथी वचन ।
मेरा कंत कबीर हैं, बर और न बरिहों ।
दादू तीन तिलाक है, चित और न धरिहों ॥
दादूपंथी वचन ।
साध अंगकी १६९ साखी ।
कबीर विचारा कह गया, बहुत भांति समझाय ।
दादू दुनिया बावरी, ताके संग न जाय ॥
कबीरपंथी वचन ।
कबीर साहब कहगये, बहुत भांति समझाय ।
दादू दुनिया बावरी, ताके संग न जाय ॥
सूरातन अंगकी ३५ साखी ।
काया कब्ज कमान करि, सार शब्द करि तीर ।
दादू यह शर साधिके, मायों मोटे मीर ॥
जानना चाहिये कि, जो सार शब्दका भेद दादू साहने बतलाया है वो कहाँसे ? यह बात तो किसी धर्म ग्रन्थमें है ही नहीं केवल कबीर पंथमें एवं कबीर पंथके ग्रन्थोंमें है । कबीर साहब एवं कबीरपंथी सदासे इसी सारशब्दका वर्णन करते हैं यही सारशब्द मुक्तिका कारण है ।
नानक शाह दादुराम आदि हंस कबीर सतपुरुषकी भक्ति सिखाते और उपदेश करते फिर सदा अपने गुरुकी प्रशंसा प्रगट करते रहे ।
एक समय किसीने नानक साहबसे कहा कि बाबाजी दण्डवत । तब नानक साहबने कहा कि, तू मुझे बाबा मत कह बाबाकी पदवी केवल जिन्दःबाबाको है । दूसरेको यह पदवी शोभती नहीं । इसी जिन्दा बाबाकी प्रशंसा धर्मदासजी तथा