कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
भित्र २ उत्पत्तिका निर्णय
नानकसाहबकी सब वाणीका ठिकाना कहीं भी नहीं लगता । यद्यपि इन लोगोंने कबीर साहबकी बड़ाई और महिमा अपने ग्रन्थोंसे निकाल दी है किसी २ साखीको पलट दिया है, तित परभी कबीरपंथकी सबचाल और वाणीकी रीतिको अबतक नहीं पलट सके हैं । कारण यही है कि, यथार्थको कोई कहाँ तक झूठ बना सकेगा ।
दादुरामके ग्रन्थकी पिण्ड पहचानकी साखी देखो —
दादूपंथी वचन ।
जो था कंत कबीरका, सोई बर बरिहों ।
मनसा वाचा कर्मना, चित और न धरिहों ॥
कबीरपंथी वचन ।
मेरा कंत कबीर हैं, बर और न बरिहों ।
दादू तीन तिलाक है, चित और न धरिहों ॥
दादूपंथी वचन ।
साध अंगकी १६९ साखी ।
कबीर विचारा कह गया, बहुत भांति समझाय ।
दादू दुनिया बावरी, ताके संग न जाय ॥
कबीरपंथी वचन ।
कबीर साहब कहगये, बहुत भांति समझाय ।
दादू दुनिया बावरी, ताके संग न जाय ॥
सूरातन अंगकी ३५ साखी ।
काया कब्ज कमान करि, सार शब्द करि तीर ।
दादू यह शर साधिके, मायों मोटे मीर ॥
जानना चाहिये कि, जो सार शब्दका भेद दादू साहने बतलाया है वो कहाँसे ? यह बात तो किसी धर्म ग्रन्थमें है ही नहीं केवल कबीर पंथमें एवं कबीर पंथके ग्रन्थोंमें है । कबीर साहब एवं कबीरपंथी सदासे इसी सारशब्दका वर्णन करते हैं यही सारशब्द मुक्तिका कारण है ।
नानक शाह दादुराम आदि हंस कबीर सतपुरुषकी भक्ति सिखाते और उपदेश करते फिर सदा अपने गुरुकी प्रशंसा प्रगट करते रहे ।
एक समय किसीने नानक साहबसे कहा कि बाबाजी दण्डवत । तब नानक साहबने कहा कि, तू मुझे बाबा मत कह बाबाकी पदवी केवल जिन्दःबाबाको है । दूसरेको यह पदवी शोभती नहीं । इसी जिन्दा बाबाकी प्रशंसा धर्मदासजी तथा
सृष्टिका हेतु मुक्तपदका निर्णय
गरीबदासजी व ऋषि मुनि सदासे करते आते हैं। वही जिन्दा बाबा सब संसारका गुरु आचार्य है।
मुखम्मस तरजीया बन्द ।
तुही था इन्ददा आइन्दा बाबा । तेरा सत नाम जम अरजिन्दा बाबा ॥
तुही हर हाल है खुरसन्द बाबा । गुनह गारों का तू बखिश्न्दः बाबा ॥
तुही बन्दा खुदामें जिन्दा बाबा ।
जो पैदायश के पहिले नाम ज्ञानी । निरंजन पर तू किया हुक्मरानी ॥
तू खुद खुदरम रिहाई चार खानी । तुही है नावमें अरविन्दः बाबा ॥ तु० ॥
जो सतयुग सत सुकृत साहबको टेरा । है त्रेता में मुनिन्दर नाम हेरा ॥
कहा पहचान सबमें जलवः मेरा । हमा मौजूद हूं पायन्दः बाबा ॥ तु० ॥
सों द्वापर जुगमें करुणामय गुरु है । नबी पीरो फकीरों खबरू है ॥
जहां देखो वहां ही तूही तू है । जो ढूढेंगे तुझे याविन्दः बाबा ॥ तु० ॥
जो कलयुग पापने आदम डुवाया । तुही कब्बीर साहब तब कहाया ॥
तुही सत नाम इन्सांसं जपाया । तुझे पहिचान सो फर्खुदः बाबा ॥ तु० ॥
जो चारों युगमें और तीनों जमानः । बता इन्सानको नामे निशानः ॥
बनी आदम पड़े जम कैंद खाना । तुही काट कानकर जमफन्द बाबा ॥ तु० ॥
जो ब्रह्मा विष्णु शिव यह तीनों भाई । तेरी तालीम इनमें नहीं समाई ॥
न रमताराम सो पहिचान पाये । सो पावें प्रेमसे जोइन्दः बाबा ॥ तु० ॥
सिखाया योग तू रघुनाथजीको । मिले जिस ढंग से सो अपने पीको ॥
तुझे देखे जो छोड़े खुदखुदीको । तुही सत्त पुरुष जम गरिन्दः बाबा ॥ तु० ॥
बता रह कृष्ण और दत्ते दिगम्बर । सिखाया तूने सब पीरो पगम्बर ॥
मुहम्मदको दिखाया अपना घर । तुझे देखे शिवा शर्मिन्दः बाबा ॥ तु० ॥
तुही मुशिद हकीकी सबका सब जा । न तू नुतफा रेहमसे होवे पैदा ॥
जमानेके आशिकों सब तुझपैशेद । तू दूत और भूतका तरसिन्दः बाबा ॥ तु० ॥
जो था आदम फरिश्तोंमें गिरामी । वह आया देखकर बे इन्तजामी ॥
बना गुरु अपना रामानन्द स्वामी । बहर शै नूर तुझ ताविन्दः बाबा ॥ तु० ॥
दिथा वैराग मारगको बुजुर्गी । दिखाया काल पुरुषकी सतर्गी ॥
जो खावे जीवको अजराह सर्गी । तुही जम दूत सरबरिन्दः बाबा । तु० ॥
तुही सारे जमानेमें और जिमीमें । तुही सबकार दुनिया और दीमें ॥
तुही तातार तुकोँ अर्ब चीमें । फरंगिस्तां हवशो हिन्दूबाबा ॥ तु० ॥
जिसे तूने बताया अपनी तदबीर । सो बेपरवाह गया दरियाके तीर ॥
जीवका ईश्वरशा होनेका निर्णय एकसे अनेक एवं अनेकका एक परमाणुमें राज्य ईश्वरका प्रमाण, इसीपर अगस्तीन
तुही साधु और पीरानका पार । तुही सिद्ध सूफीकलन्दरजिन्दः बाबा ॥ तु० ॥
दिया धर्म दासको तूही ने बाचा । तूही नानक शाहका गुरु है साँचा ॥
दिया जो छोड़ तुझके सोई काँचाँ । तुही सत पुरुष गुरुगोविंद बाबा ॥ तु० ॥
तुझे जो छोड़ दरिया सङ्ग पूजे । सुनो सन्तो इन्हें घर कौन सूझे ॥
मिला गुरु कौन और क्या ज्ञान बूझे । यह दुनिया दीनमें है निन्दः बाबा ॥ तु० ॥
जो तूने सब तमाशाको मचाया । तुही खिलकतकी रचनाको रचाया ॥
पकड़कर हाथ आजिजको बचाया । तुही कर दूर सब दुःख दुन्द बाबा ॥
तुही बन्दा खुदामें जिन्दः बाबा ।
कुछ और प्रमाण ।
येही जिन्दा बाबा धर्मदास साहबको मिले येही नानक शाहके गुरु हैं । इसी बाबाकी स्तुति गरीबदासजी करते हैं । पर नानकपंथी लोग इसको एकदम भूलगये । इस कारण में चौदह प्रमाण पहले लिख आया हूँ अब अंगरेजी इतिहासोंसे यहाँ और भी प्रमाण लिखता हूँ ।
(1) Honorable Mounttuart Elphinstone, one of the greatest and most trustworthy British writers of Indian History, ingiving his account of Nanak shah, testifies that he (Nanak) was a descpile of Kabir, but he does not give any separate account of Kabir as none of his followers played any part in the political drama of Indian History. If he may have, there is a little trace of it at present period.
Elphinstone's History of India Book XII. Chapt. I page 678 writing of Sikhs says thus —
Their (the sikh's) founder Nanak flourished about the end of the fifteenth century. He was a descpile of Kabir and consequently a sort of Hindu deist but his peculiar tenet was universal toleration &c. &c. &c.
१—एच एम० एलफिन्स्टन साहब जो कि अंग्रेजी इतिहास लिखनेवालों में नामी और बहुत बड़े इतिहास लेखक होगये हैं वह अपने भारतके इतिहासमें इस प्रकार लिखते हैं और नानकशाहके विषयमें साक्षी देते हैं कि, नानकशाह कबीर साहबके शिष्योंमें से एक शिष्य थे । पर उन्होंने अपने लेखमें कबीर साहबके विषयमें कोई पृथक् हाल नहीं लिखा । कारण यह है कि उसके अनु-गामियोंमेंसे किसीने भारतके देशी इतिहासमें कोई भाग नहीं लिया ।
एलफिन्स्टन साहबके भारत इतिहासके १२ वें जिल्दके प्रथम भागके ६७८ पृष्ठमें देखो वह सिकखोंके विषयमें इस प्रकार लिखते हैं कि, इस धर्मके
अवस्था साम्य
आचार्य्य नानक पन्द्रहवीं शताब्दीके अन्तमें प्रगट हुये। वे कबीर साहबके शिष्य थे। इस कारण वह एक प्रकारके हिन्दू एक ईश्वरवादी थे पर उनके धर्मका मुख्य अभिप्राय सबको एक धर्ममें मिलानेका था।
(2) H. H. Willson, in his Essays on the religions of Hindus in section III Page 69 treating of Kabir Panthis says :—
The effect of his (Kabir's) lessons as confined to his own immediate followers, will be shown to have been considerable, but their indirect effect has been still greater; several of the popular sects: being little more than ramifications from his stock, while Nanak the only Hindu Reformer who has established a national faith, appears to have been chiefly indebted for his religious notions his predecessor Kabir.
२-एच० एच० विलसन साहब अपनी दरसनामक किताब (हिन्दुओंके धर्मके विषयमें ६९ पृष्ठ तीसरे प्रकरण) में कबीरपंथियोंके विषयमें लिखते हैं कि, कबीरसाहबकी शिक्षाका प्रभाव उनके मुख्य २ शिष्योंपर बहुत पड़ा था। उनकी शिक्षाका प्रभाव उनकी अनुपस्थितिमें उससे बढ़कर हुआ। क्योंकि, सब पंथोंको इस पन्थकी शाखायें कह सकते हैं। नानक साहबने जो हिन्दुओंमें एक विशेष धर्मके आचार्य्य हुये। प्रायः अपने धार्मिक ध्यानोमें कबीर साहबका अनुकरण किया है।
(3) In giving a note on the above mentioned he (Willson) quote following from Malcarm, "that Nanak constantly referred to the writing of celebrated Kabirs and the Kabir Panthis assert that he has incorporated several thousand passages from Kabir's writings.
३-ग्रन्थ रचयिताके पूर्व लिखितका व्याख्यान करनेके समय मालकाम साहबके लेखसे निम्नलिखित अनुवाद किया है कि,
"नानकने प्रख्यात तथा सुप्रसिद्ध कबीरके विषयका अनुकरण किया है। कबीरपंथी कहते हैं कि, नानकने कई सहस्र साखियों कबीर साहबकी पुस्तकोंसे ली हैं।" यह बात मालकम साहबकी पुस्तक भारतके इतिहासमें देखो।
(4) Monier Williams a noted man, who personally visited India and who was the Professor of Sanskrit in Bialal College, Oxford, in his book named "Religious Thoughts and Life in India" in Chapter VI under the heading of Theistic sect founded by Kabir in page 158, writes :—
There can be no doubt that the teaching of Kabir exercised a
जीवकी ईश्वर प्राप्ति
most important influence through out upper India in the fifteenth and sixteenth centuries. That it formed the basis of Sikh movement in Punjab, is clear from the fact Kabir's sayings are constantly quoted by Nanak and his successors, the authors of the Sacred writing which constitute the bible (Granth) of the Sikh religion.
४-मोनियर विलियम् साहब एक सुप्रसिद्ध अंग्रेज हैं जिन्होंने स्वयम् भारत वर्षका भ्रमण किया है ये ब्लेयल कालेज आक्सफोर्डमें संस्कृतके प्रोफेसर थे, भारतके धार्मिक ध्यान तथा आयुके छठे प्रकरणके १५८ पृष्ठमें लिखते हैं कि, इसमें कोई सन्देह नहीं कि, पन्द्रहवीं तथा सोलहवीं शताब्दीके बीच उत्तरीय भारतमें कबीर साहबके धर्मका बड़ा प्रचार हुआ। इसमें सन्देह नहीं कि, यही धर्म पञ्जाबी सिक्ख धर्मकी जड़ है। इस बातसे जाना जाता है कि, कबीर साहबकी वाणी, नानक तथा उनके स्थानापत्रोंके स्थान २ पर अपनी पुस्तकोंमें लिखी हैं।
(5) On page 162 under the heading of the Sikh theistic sect founded by Nanak, the same author gives the following account of Nanak in the light of Professor Trump's investigations (as he himself admits) and in the light of his own enquiries which he made at Lahore when he visited it.
Nanak However made no claim to be the originator of a new religion. His teaching was mainly founded on that of his predecessors, especially on that of Kabir whom he constantly quoted.
५-येही महाशय अपनी पुस्तकके १६२ पृष्ठमें सिक्ख धर्मके ग्यारहवें प्रकरणमें नानक साहबका विवरण करते हैं कि, जो कुछ वह करते हैं वह ट्रम्प साहबके ज्ञातव्यकी उस विज्ञताके अनुसार कहते हैं जैसे कि, उन्होंने स्वयम् लाहौरमें आकर प्राप्त किया, नानक शाहने नये धर्मके बनानेकी बात नहीं कही। यथार्थमें उस धर्मकी जड़ कबीर साहबकी वाणी पर है। क्योंकि, कबीरके धर्म पुस्तकका अनुवाद वह अपनी पुस्तकमें करते हैं।
(6) Following extracts are given by Kailas Chandra Manna B. A. and Devendra Nath Roy B. A. of L. M. S. College, Bhawanipur, in a brief sketch of the History of India page 105.
"Kabir was the most celebrated of the twelve disciples of Ramanand.....He lived in the fifteenth century. Nanak appears to have been chiefly indebted for his religious notions to Kabir.
Nanak founded the Sikh brotherhood in the fifteenth century. He is said to have derived his religious notions from Kabir.
(Page 108.)
पुरुषार्थ और प्रारब्ध सिद्धान्तोंकी भिन्नता कियेका बदला, अगम्यकी गति
६-जिसको कैलाशचन्द्र मन्ना बी० ए० और देवेन्द्रनाथ राय बी० ए० आफ एल० एम० एस० कालेज भवानीपुरन भारतके इतिहासका संक्षेप लिखा है। उसके एकसौ पाँच पृष्ठमें लिखा है कि, रामानन्दके बारह शिष्योंमें कबीर बड़ेही सुप्रख्यात हुए। नानकने सर्व धार्मिक युक्तियाँ कबीर साहबसे ही सीखा हैं।
उसी पुस्तकके एकसौ आठ पृष्ठमें लिखा है कि, नानकने सिक्ख धर्म पन्द्रहवीं शताब्दीमें स्थापित किया, उन्होंने सब धार्मिक रीतियाँ कबीर साहबसे सीखीं। पृष्ठ १०८
(7) "The Indian Empire" by W. Hunter C. I. E. L. L.D. page 194 writes of the miracles of Kabir.
Further one he (Hunter) gives an account of Kabir and his doctrines and about Nanak & c. Page 203 & 204.
७-डबल्यू० हण्टर सी० आइ० ई० एल० एल० डी० ने अपनी इण्डियन इम्पायर पुस्तकके एक सौ चौरानवे पृष्ठमें कबीर साहबके कौतुकोके विषयमें लिखा है। फिर इसी पुस्तकके २०३ और २०४ पृष्ठमें कबीर साहब तथा नानक शाहके विषयमें लिखा है।
(8) "A History of the Sikhs" from the origin of the nation to the battles of Satluj, by Joseph Cunningham, Lieutenant Engineer and Captain in the army of India in page 41 from 13th line writes thus—
"Nor it is improbable that the homilies of Kabir and Gorakh had fallen upon his (Nanak's) susceptible mind with a powerful and enduring effect. (Note) Extractions from the writings of Kabir appear in "Adi Granth" and Kabir is often and Gorakh sometimes noted or referred to."
८ "सिक्खोंका इतिहास" इस जातिके आरम्भसे लेकर सतलजकी लड़ाई तकका इतिहास जोसेफ़ डेवी किंथम साहब लेफ़टेन्ट इनजीनियर और कप्तान फौज हिंदुस्थानने लिखा है। स्वामी रामानन्द, गोरख नाथ और कबीर साहबकी धार्मिक कर्तव्योंका मुफ़्तिसल हाल ४१ पृष्ठ १३ पंक्तिते लिखते हैं—सम्भव है कि कबीर और गोरखकी शिक्षाने नानकके अन्तःकरण पर बड़ाभारी और स्थिर प्रभाव डाला है।
(नोट) कबीर साहबकी बाणी आदि ग्रन्थमें बहुत स्थानपर मौजूद है। कबीर साहबका और प्रायः गोरखनाथका प्रमाण स्थान स्थानपर दिया है।
नानक साहबके कृत्योंमेंसे अपजी सबसे अधिक प्रसिद्ध है जिसकी टोका बहुत लोगोंने अपनी बुद्धि अनुसार की है पर उनका कहना यह है—
कबीर पन्थकी विशेषता पूजाका निर्णय, पापके कारण मोक्ष मार्ग, कर्मकी स्थितिनियामक सृष्टि स्वाभाविक है कार्य सिद्ध न होनेका कारण
जपजी ।
एक ओंकार सत्तनाम कर्ता पुरुष निभों निर्वैर अकाल मूर्ति अयूनी सई
भंगुर प्रसाद जप आदि सच युगादि सच है भी सच नानक होसीभी सच ।
टीका ।
एक ओंकार — नानक साहब कहते हैं कि, पहले एक ओंकार कर्ता पुरुष उत्पन्न हुआ जिसने समस्त ब्रह्माण्डको उत्पन्न किया । तीन लोक, चार वेद, और ग्यारह इन्द्रिये तथा संसारमें जितने धर्म कर्म हैं वे सब उसीसे प्रगट हुये, तीन लोक उसीकी उपासना करता है । निगुण और सगुण उसीके सब रूप हैं । ब्रह्मा, विष्णु महेश और आदि भवानी तथा सारे ऋषि मुनि सिद्ध साधु पंगम्बर आदि सब उसीकी आज्ञा में रहते हैं । उसीने चार खानि, चौरासी लाख योनि नरक, स्वर्ग, शुभ अशुभ, पाप, पुण्य आदि बनाकर संसारके जीवोंको बन्धनमें डाल दिया है । उसीने सबको आवागमनमें फसाया है । सत्पुरुषकी भक्ति छिपाकर मुक्तिका मार्ग बन्द कर दिया है । संसारके मनुष्योंकी बुद्धि भ्रष्ट कर किताबोंमें फँसा मारा । मनुष्य आँधोंके समान टटोलते फिरते हैं पर किसीको शु मार्ग नहीं मिलता । सब किसीकी आत्मापर झूठी आत्माकी चौँकी बिठादी है कि, कोई भी सत्यकी ओर न जाने पावे ।
नानक साहब कहते हैं कि, एक ओंकार अर्थात् ओंकार एकही है उससे समस्त संसार पूर्ण हो गया । दुःखियोंकी दुःखको दूर करनेकी दयाकर सत्त नाम कर्ता पुरुष प्रगट हुआ । जो जीवधारी उसकी शरणमें आये उसने उन सबका बन्धन काट दिया इसीसे वो बन्दीछोर कहलाता है ।
सत्त नामकर्ता पुरुष—जब एक कर्ता पुरुषने इस प्रकार संसारमें अन्धेर मचाया तो सत्त नाम कर्ता पुरुष प्रगट हुआ । वह सत्त नाम कर्ता पुरुष सब अव-गुणों से शुद्ध पवित्र है उसके विषयमें नानक साहब यों कहते हैं ।
एक अर्ज गुफ़्तम पेश तू दरगोश कुन करतार ।
हक्का कबीर करीम तू बे ऐब परवर दिगार ॥
जो है वो बा ऐब (अवगुण सहित) परवरदिगार है । और हक्का कबीर बे ऐब परवर दिगार है । जब वह सत्त नाम कर्ता पुरुष पृथ्वीपर आया तब असत्त नाम कर्ता पुरुषका सब धोखा छल कपट, नष्ट हो गया । जितनी प्रशंसा और उत्तम गुण हैं वे सब सत्त नाम कर्ता पुरुषके हेतु हैं । फिर वह कँसा है ।
१ जो टीकाकी गई है यह शिष्योंके मतसे नहीं किन्तु ग्रन्थ कर्तक स्वयंके मतसे है सिद्ध ऐसा अर्थ नहीं करते ।
सत्य परमात्माका धर्म भक्ति विना मुक्तिका दाता कबीर पन्थसे मुक्ति वेदान्ती और कबीर पन्थियोंमें भेद
निर्भव-भव नाम भव सागरका है। उनचासकोटि योजन विराट पुरुषका शरीर है। उसीमें ये तीन लोक बसे हैं उसीका नाम भवसागर है यही उत्पत्ति सागर है। इसीके मध्य सब जीवधारियोंका आवागमन होता है। निरञ्जन भवरूपही है और भवादि उद्भवका अर्थ उत्पन्न होना है जन्म मरण सदा इस ओंकारके देहके अन्तर होता है। यह तो असत नामकर्ता पुरुषका हास है जिसके प्रेममें पड़ा हुआ बारम्बार बन्धनकोही पाता है। सत नामकर्ता पुरुष निर्भव है कोई उससे मिलता है वह भी निर्भव हो जाता है, उसका आवागमन कभी नहीं होता। वह परमानन्द पदको प्राप्त होजाता है।
निर्वैर - वह सत नामकर्ता पुरुष निर्वैर है वह किसीसे शत्रुता नहीं रखता। वह सब जीवधारियोंका समान मित्र है। उससे बढ़कर जीवधारियोंका दूसरा हित चिन्तक नहीं है। जब दैत्यों और राक्षसोंकी अधिकता होती है तो वो शरीर धरकर उनसे युद्ध करता है। यह असत नाम कर्ता पुरुष छल कपट और वैर विरोधसे पूर्ण है। सत नाम कर्ता पुरुष अपनेसे विरोध माननेवालोंका भी मित्र है।
अकालमूर्ति - अकालमूर्ति इस लिये कहा, कि वह पूर्ण दयाकी मूर्ति है। उस मूर्तिके भयसे काल दूर भागता है। वह अकालमूर्ति सबका सुख देनेवाला है। कालमूर्ति दुःख देनेवाला है।
अयोनी - अयोनी उसको कहते हैं जो कभी मातृगर्भमें कंद न होवे। सो सत नामकर्ता पुरुष अयोनी है। असत नामकर्ता पुरुष सयोनी है। चार खानि चौरासी लाखयोनि असत नामकर्ता पुरुषसे उत्पन्न हुए हैं, वही योनिकी इच्छा रखता है, उसको आवागमन होता है सतनाम कर्ता पुरुष न कभी कामातुर होता है, न कभी मातृगर्भमेंही आता है।
सइमं - पञ्जाबी भाषामें सई और सेवकका अर्थ सखी और सहेली है। पूर्वी भाषामें सईका अर्थ अधिकता और विशेषता है। भ्रमका अर्थ यहाँ अर्थात् प्रगट होना। यह सतनाम कर्ता पुरुषकी प्रशंसा है अर्थात् तू पहले एक था अब अनेक हो गया। मन और इन्द्रिय आदि सब तुमसेही प्रगट हुये हैं। तू इन सबसे मिला भी है अलग भी है। सतनाम कर्ता पुरुषमें दोनों गुण हैं, सबमें मिला एवं सबसे अलग योग और भोग दोनोंमें एक सम रहता है। वह आग जिससे सृष्टि उत्पन्न हुई है यदि वह उसमें भी न हो तो उसका कुछ ठिकाना न हो। सतनाम कर्तापुरुष अविनाशी है असत् नाम कर्ता पुरुष विनाशी है।
गुरु प्रसाद - नानक साहब कहते हैं कि, जो सतनाम कर्ता पुरुष है वो गुरुकी दयासे जाना जाता है, जिसपर गुरुकी कृपावृष्टि होती है वह उसका
चर्म चक्षुसे देख लाम न पाया शत्रु मित्र, नामरूपसे छूटनेका मार्ग ब्रह्माण्ड दर्शन न्याय और दया एक साथ कोई पार न होगा
दर्शन पाता है। गुरुकी शिक्षासे उसके नामको जप। वह पुरुष कँसा है “आदि सच युगादि सच, है भी सच और होगा भी सच”।
नानक साहबका सब कथन कबीर साहबसे मिलता हुआ है कुछ भी भेद नहीं है देखो ग्रन्थ साहब श्लोक महला पहला नानक शाह वचन —
पढ पुस्तक संध्या वादंग । शिल पूजस बकुल समाधंग ॥
मुख झूठ भयो खन सारंग । तरे पाल ते हाल विचारंग ॥
गल माला तिलक लिला टंग । दोय धोती वस्तर कपाटंग ॥
जो जानन ब्रह्मंग कर मंग । सब निश्चे फोकट धरमंग ॥
कह नानक निश्चयं ध्यावे । बिन सतगुरु बाट न पावे ॥
आसा महल्ला पहला आदिकी साखी ।
बलिहारी गुरु आपने, घड़ी घड़ी सौ सौ बार ।
मानुषसे देवता किया, करत न लागी बार ॥
जो सौ चन्द्रा उंगवै, सूरज कोटि हजार ।
ऐसे चादन होत हो, गुरु विन घोर अँधार ॥
नानक साहबने ग्रन्थमें पहले अपने गुरुकी साखी रखकर फिर अपनी वाणी रखी है। आजकल नानक पंथके लोग कबीर गुरुको केवल एक भक्त मानते हैं। इसी कारण यथार्थ आशयको न समझकर बहुत बातें बनाते हैं।
सब लोग वाहगुरु बोलते हैं पर कोई नहीं समझता कि, वाहगुरु कौन है? कबसे है? किस वास्ते है? सिक्ख लोग इस वाहगुरुके विषयमें अपनी बुद्धिसे इस प्रकार अर्थ लगाते हैं कि, व से वासुदेव। ह से हरि। ग से गोविन्द। र से राम। इन्हीं चारों अक्षरोंसे वाहगुरु बना है। सो यह परमेश्वरका नाम है।
वे यथार्थसे एकदम अनभिज्ञ हैं यथार्थ तो यों है कि, जब नानक साहबको सत गुरु मिले तो उन्होंने सत गुरुकी स्तुति की।
नानक साहब ।
शब्द— वाह वाह कबीरके गुरु पूरा है, वाह वाह कबीर गुरु पूरा है।
पूरे गुरुके मैं बलि जैहों, जाका सकल जहूरा है ॥
अधर दुलीचा परे हैं गुरुनके, शिव ब्रह्मा जहाँ झूला है ॥
स्वेत ध्वजा फहरात गुरुनके, बाजत अनहद तूरा है ॥
पूरन कबीर सकल घट दरसे, हरदम हाल हजूरा है ।
नाम कबीर जपें बड़ भागी, नानक चरणके धूरा है ॥
कबीर साहबको भविष्य वाणी भेष बनानेसे लाभ क्या भेषके विषयमें एक कथा
सतकबीर वचन शब्द ।
वाह वाह लड़के जीता रह, वाह वाह लड़के जीता रह ।
मँडुवीकी रोटी वथुईकी भाजी, ठंढा पानी पीता रह ॥
प्रेमकी सुई सुरतिका धागा, ज्ञान गुदड़िया सीता रह ॥
इस लड़केकी बड़ी २ अँखिया, निशिदिन दर्शन करता रह ।
कहैं कबीर सुनो हो नानक, राम रसिक रस पीता रह ॥
सर्व हंस सदा इस सत गुरुकी प्रशंसा किया करते हैं। उसकी प्रार्थनासे बढ़कर दूसरी कोई बातही नहीं समझते। जैसा कि, गरीबदासजी कहते हैं कि —
ऐसो ख्याल विशाल सतगुरु अटल दिगम्बर थीर है ।
भक्ति हेतु काया धराये अविगत सत्य कबीर है ॥
नानक दादू अगम अगादू तेरे जहाजके खेवट सही ।
सुख सागरके हंस आये भक्ति हिरम्बर उर गही ॥
कोटि भानुप्रकाश पूरन रूप रोम रोमकी लार है ।
अचल अभंगी है सतसंगी अविगतिका दीदार है ॥
धन्य सत्यगुरु उपदेश देवा चौरासी भ्रम जो मेट है ।
तेज पञ्चतन देह धारिके इस विधि हमको भेंट है ॥
शब्द निवास आकाश वानी यह सतगुरुका रूप है ।
चन्द सूरज पवन पानी जहाँ नहीं छाया धूप है ॥
रहता रमिता राम साहब अविगत अल्लह अलेख है ।
भूले पन्थ विडम्ब वादी कुलका खाविन्द एक है ॥
रोम रोमसे जाप जपले अष्ट कमल दल मेल है ।
सुरति निरतिको कमल बैठो जहाँ न दीपक मेल है ॥
हरहम खोज हनोज हाजिर त्रिवेनीके तीर है ।
दास गरीब तबीब सतगुरु वन्दी छोर कबीर है ॥
नानक शाहू साहबको कबीर साहब नदी पर मिले, इसी कारण सिक्ख नदीको पूजते हैं उसको गुरु दरिया बोलते हैं। यथार्थ गुरुको भूल गये दरियाको पूजने लगे। नानक शाहूने कबीर साहबको बाहगुरु कहा सो तो सिक्ख लोग उस बाहगुरुको भूल गये अपना मन माना अर्थ कहना आरम्भ किया।
वा (वासुदेव) ह (हरि) ग (गोविन्द) र (राम) ये चार नाम ईश्वरके माने। सत गुरु कबीरके बिना कोई भी बन्धन नहीं काट सकता, चाहे कोई सहस्रों प्रकारकी बुद्धिमानी क्यों न करे।
स्वसंबेदसे वेदका प्राकट्य
कबीर साहबके चेलोंमेंसे नानक साहब और धर्मदास साहब इन दो चेलोंका बड़ा प्रभाव फँला । धर्मदास साहब सम्बत् १५१९ वि० में उत्पन्न हुए । नानक साहब १५२६ में हुए थे ।
कबीर साहब १५५० में जिन्दा भेषमें धर्मदास साहबको मथुरामें मिले उनका काम पूरा कर दिया नानक साहबको १५५३ में पंजाबमें मिले । उनका हृदय प्रकाशित कर दिया । पूरब उत्तरकी ओर धर्मदासजीको तथा पश्चिम भारतकी गुरुआई नानक शाहको प्रदान की ।
जिस प्रकार धर्मदास साहब, महम्मद साहब, नानक साहब, राजा बीरसिंह, राजा भूपाल, राजा अमरसिंह, दादुराम, गरीबदास साहब आदि महान् पुरुषोंको कबीर साहबने अपना देश दिखलाया उसी तरह दूसरे भी अनन्त जीवोंके हृदयको ज्ञानसे प्रकाशित करके मुक्त कर दिया जिसका कि वर्णन करना असम्भव है ।
अनन्त हंस तो लोक सिधार गये पर कोई २ हंस जिनसे कि दूसरे शरीरमें ले जानेका वचन हो चुका था वे ठोका पूरनेपर मुक्त होंगे ।
१२ प्रश्न — शरण हो भी गुरु विमुख होनेका कारण — जो लोग सतगुरुकी शरणमें आते हैं उनमेंसेभी कोई विमुख हो जाते हैं । उनका ऐसा होना बड़े आश्चर्यकी बात है ।
उत्तर — यह आश्चर्य बात नहीं कि, क्यों विमुख हो जाते हैं, बरन् यह आश्चर्यकी बात है कि, वे कालपुरुषकी भक्ति छोड़कर सत पुरुषकी भक्ति करने लग जाते हैं क्योंकि, कालपुरुषने सबकी बुद्धिको ऐसा बद्ध कर दिया है कि, उसमें कभी भी सत्य मार्गका विचार न होने पावे । कालपुरुषका ऐसा प्रताप है कि, जीव उसके जालसे निकलकर कभी सत्य पुरुषकी भक्तिकी ओर झुकही नहीं सकता । सतगुरुदयालुको धन्य है जिसकी कि कृपासे जीवोंका उद्धार होता है ।
कालपुरुष रूप मालीने संसार रूप बगीचा लगाया है, उसीका अखतिyar है, जब चाहे रखे जब चाहे नाश करदे । केवल सगुतरु कबीर साहबमेंही यह शक्ति है कि, जीवोंको कालके पाशसे छुड़ाकर भवसागरके पार ले जाय । कबीर साहब कहते हैं कि, कालपुरुषने सबकी बुद्धिको भ्रष्ट कर दिया है इसी कारण सत्य पदको नहीं पहचान सकते । सतगुरु सदा मार्ग बताता है पर जीव अंधा अज्ञानी समझता नहीं है । जब सत गुरुने सत्य युगमें पृथ्वीपर पदार्पण किया तब सबको उपदेश करने लगे । सुकृत ध्यानमें सत्य कबीरजीने कहा है —
भजनकी विधि, एक देशी और सर्व देशीका निर्णय भक्ति करने योग्य और बन्धमुक्त
रमैनी - ररंकार माया ठहरावा । सब जग आन कर्ता बतलावा ॥
मृत्युलोकमें प्रगटचो जाई । बालक रूप दियो दिखाई ॥
घर घर सबसे भाष्यो ज्ञाना । चीनोरे नर पुरुष पुराना ॥
जो देखे सो लेई उठाई । गोद उठायके मोहि खेलाई ॥
काको सुत यह परचो भुलाई । मातु पिता केहि देश हैं भाई ॥
दियो ढील यह काको बारा । होय दुखिया नगर मँझारा ॥
यदि विधि सबहिढील मोहिदीना । कोइ यक जीव जो हमको चीना ॥
बालक रूप त्याग हम दीना । तब तरुन भेष धरि लीना ॥
घर घर सबसे कियो पुकारा । चीन्होरे नर सिर्जनहारा ॥
नाना विधि मैं कहूँ बुझाई । तऊ न अंध मोहि पतियाई ॥
सब मिलि कहें तरुन यह आही । ग्रह माहि नहीं या कोई चाही ॥
सुन्दर वदन जो बहुत विराजा । बिन चिन्हे वाको नहीं काजा ॥
तरुण त्यागा हम तबहीं । कीन स्वरूप वृद्धको जबहीं ॥
आदि ब्रह्म निर्गुण कह भाई । ताको सब मिलि गहो बनाई ॥
तिन पुनि माया ज्योति बनाई । काहि नरक सब परयो भुलाई ॥
शिव शक्ति त्रिगुण उत्पानी । ब्रह्मा विष्णु महेश्वर जानी ॥
इतना भेद कहा हम जबही । क्रोध भयो जीवनको तबही ॥
सब मिलि कहै बुढ़ापा आई । आन की आना कहे लछु भाई ॥
ब्रह्मा विष्णु कर्ता हैं भाई । ताहि छोड केहि सेवा लाई ॥
यहि विधि सब मिली कीन पुकारा । तब हम घटमें कीन बिचारा ॥
होय गुप्त आकाशहि गयऊ । रह्यो छपाय दरश नहि दयऊ ॥
होय अधर मैं बोल्यो बानी । जाते जीव करे पहिचानी ॥
नाम निःअक्षर गहो निज डोरी । त्रिगुण फन्द ते लैहौं छोरी ॥
जबहि गुप्त होय बोल्यो बानी । तबहि सब मिली अचरज मानी ॥
देव दैत्य भयो यह बानी । ना जानू कुछ होईहि हानी ॥
कोई कहै यह भलो न बाता । कोई कहे यह जान विधाता ॥
कोई यक जीव अंकुरी होई । तब निज हमको चीन्हे सोई ॥
यहि विधि देखा सकल जहाना । तब पुनि कीना लोक पयाना ॥
भावार्य - आदि सृष्टिमें जब सत्य युग आरम्भ हुआ तब कबीर साहब पृथ्वीपर प्रगट हो बालकका स्वरूप धारण कर सत् पुरुषकी भक्तिका उपदेश
धर्मके चार चरण
करने लगे । आपके वचनको सुनकर लोग आश्चर्य मान गोदमें उठाकर प्यार करते हुए कहते कि, यह किसका बालक है ? यह यहाँ भूलकर आगया है । इसको बाहर छोड़ आओ ।
जब लोग सतगुरुको बाहर छोड़ आये, तो सुन्दर युवकका स्वरूप धारण कर उपदेश करने लगे । लोग कहने लगे कि, यह अपरिचित पुरुष है इसको घरमें मत आने दो. इसका कुछ विश्वास नहीं । जब इस प्रकार लोगोंने उस अवस्थाका भी विश्वास नहीं किया तो वृद्ध पुरुषका स्वरूप धारण कर उपदेश किया तब लोग क्रोध करके कहने लगे कि, यह बूढ़ा हो गया इस कारण इसकी बुद्धि भ्रष्ट होगई है कुछका कुछ बकता है ।
जब प्रगटमें लोगोंका यह रङ्ग ढङ्ग देखा तो अन्तर्धान होकर आकाश वाणी द्वारा उपदेश करने लगे । लोगोंको महान् आश्चर्य हुआ कि, यह अंतरिक्षसे कौन बात करता है ? इसी सोच और विचारमें सन्देहही करते रह गये । किसी किसी अंकुरी जीवोंने मान भी लिया । फिर सतगुरु सत लोकको पधार गये ।
९३ प्रश्न—भारतमें भाव भक्तिकी अद्वैतता, भारतवर्षमें जैसी भक्ति और सेवा है ऐसी और कहीं है कि, नहीं ?
उत्तर—आज कल पृथ्वीका जो जो एशिया, अफ्रिका, अमेरिका और योरप आदि द्वीप जाने गये हैं उन सभोंमें भारतके तुल्य भाव भक्ति और आत्म उन्नति नहीं है ।
भारतमें भी उत्तम मध्यम और कनिष्ठ भेदसे तीन प्रकारके साधु रहते हैं । कबीर पंथियोंकी उत्तम श्रेणी है, मध्यम श्रेणीमें सब तपस्वी और योगीआदि हैं । निकृष्ट श्रेणीमें वे हैं जिनके कि, ऊपर आकाशी पुस्तकें उतरी हैं जैसे पैगम्बर और सिद्ध लोग, ये लोग केवल उसी अंतरिक्षकी वाणी आज्ञाका भरोसा रखते हैं । जिनका उन्हें कुछ ज्ञान नहीं कि, कहाँसे आता है ? कौन भेजता ?
स्वपत्र सुदर्शन केवल पाँच ग्रास खाते थे; महाराजा युधिष्ठिर के यज्ञमें स्वपत्र सुदर्शनके भोजन किये बिना घण्ट नहीं बजा । महारानी द्रौपदीने दुर्वासा को केवल एक लंगोटीका दान दिया था जिसके पुण्यसे द्रौपदीकी प्रतिष्ठा रही यानी दुःशासन जैसा पहलवान द्रौपदीको नंगी करनेके लिये उनका कपड़ा खोलने लगा तो उस समय कपड़ा इतना बढ़ा कि, बड़ा ढेर लग गया पर द्रौपदीजी नंगी नहीं हुई इसपर गोस्वामी गरीबदासजी कहते हैं कि—
गरीब, इन्द्र भयै है धरम ते, यज्ञ है आदि युगादि ।
शंख पंचायन जब बजै, पंच ग्रासी साधु ॥
गरीब, द्रौपदी दिल जाना, स्वपत्र चरण पिय धोय ।
बाजे शंख सरब कला, रही आवाज न गोंय ॥
गरीब, द्रौपदी चरण जल, व्रत लिय सुपत्र संग नहीं कीन ।
बाजे शंख असंख धुन, गण गंधर्व भये लीन ॥
गरीब, पीताम्बरको फाड़िके, द्रौपदी कीनी लीर ।
अंधेको कौपीन कस, घनी बधायो चीर ॥
९४—प्रश्न—संसारीकी मुक्ति, जो संसारी बहुत जंगलमें फँसा है इसकी मुक्ति किस तरह होगी ?
उत्तर — साधु सेवाके बिना संसारीको भक्ति और मुक्तिकी राह नहीं मिल सकती । सतगुरु साधु सेवासेही प्रसन्न होता है, जहाँ साधुसेवा नहीं होती है वहाँ स्वयं सतगुरु जाता है साधु सेवाही है जो सतगुरुका कृपापात्र बना देती है ।
श्रीनगरके राजाकी कथा ।
श्रीनगरका राजा राममोहनराय महान् विद्वान् वेद पाठी और वेद विधिपूर्वक सब कर्म करनेवाला एवं साधु सेवी था । काश्मीरसे लेकर पहाड़के किनारे के प्रदेश सबही उसके अधिकारमें थे । जिस समय वह राज करता था वह सतयुग का समय था, सतगुरु सतसुकृतके नामसे प्रसिद्ध थे । गुरु महात्ममें लिखा है, धर्मदासजी प्रश्न करते हैं और सतगुरु उत्तर देते हैं ।
सत्त कबीर वचन ।
चौ०— पुरुष आवाज आये भौसागर । सत्त सुकृत हम नाम उजागर ॥
उत्तर दिशा गयो निज ठामा । पहुँच्यो श्रीनगर तहाँ ग्रामा ॥
मोहन राव तहाँको राजा । भक्ति करे मेटि कुल लाजा ॥
सुन्दर बदन रूप अधिकाई । प्रजा सुखी राज सुख पाई ॥
सुचि सज्जन अतिज्ञान उजागर । दीन लीन सन्तनसे आगर ॥
करत खोज साधनसे प्रीती । अति आनन्द रूप सुख रीती ॥
भांति भांतिके मण्डप छावे । साधु संत आदर करि लावे ॥
करे महोत्सव साधु बुलाई । परम पुरुष निशिदिन मन भाई ॥
निशि दिन वेद कथासे प्रीती । कौन भांति जीव यमसे जीती ॥
दोहा— खोज करत चित व्याकुल, ढूँढा सकलो भेख ।
सिरजन हार बतावहूँ, सबहीं कहत अलेख ॥
शौच या शुद्धि
चौ०— चले राव जहाँ बद्रीनाथा । सुत कलत्र रानी ले साथा ॥
साधुरूप हमहूँ करि लीना । राव संग तत्छन पग दीना ॥
गये नृपति जहाँ प्रतिमा साजा । भौति भौति कर बाजत बाजा ॥
कछुक द्रव्यले आगे राखा । विनय दण्डवत बहुविधि भाखा ॥
होत कोलाहल मङ्गल चारी । भौति भौति गावैं नरनारी ॥
बद्री परसि राव करि आसन । नृपति बैठो जाइ सिंहासन ॥
हम जीवनसे शब्द पुकारा । घर घर फिरचो सबनके द्वारा ॥
चैतो प्राणी शब्द संदेशा । चलो तहाँ जहाँ हंस नरेसा ॥
जहैंवाँ जाव बहुरि नहिं आओ । यकचित होय नाम लौलाओ ॥
सकल जीवसे कहो चित्ताई । एको जीव न हम पतियाई ॥
सात दिवस ऐसे करि बीता । कौतुक एक तहाँ हम कीता ॥
छन्द— गयो मन्दिर पास ततक्षण जहाँ बद्रीनाथ हो ।
रूप पाहन कीन पारस दीन मस्तक हाथ हो ॥
प्रीति निशि भिनुसार भव तब आय पण्डा पूजहीं ।
करत आरति भयो चकित देख द्विज चित बूझहीं ॥
सोरठा— आरति आय कुधातु, प्रतिमा यह कंचन भयो ॥
कहैं सकल सो बात, राव जाय सिर नायऊ ॥
चौ०— राजा सुनत हरषि चित दीना । प्रभु दया कोइ जान न लीना ॥
भयो अचम्भो लोगन सबही । लीला आप कीन जो अबही ॥
स्तुति करें बहुत हरषाई । सत्य भेद कोई जानत नाहीं ॥
राजा दल फेरा सब साधू । चले संत सब युत्थय बांधू ॥
राजा झारी लीने हाथा । सकल भेषको नायो माथा ॥
रानी साधुन चरन पखारे । राजा अपने कर जलढारे ॥
सकल भेष बैठे जेवनारा । जय जय मंगल होत अपारा ॥
तब हम तहैंवाँ बैठे जाई । पूरन शसि सम रूप दिखाई ॥
स्वेत अंग कीन्हो अति पावन । अधर बैठि सुकृत मन भावन ॥
देखि लोग सब भये अचम्भा । हर्षित राय चरन गहि थम्भा ॥
बहुतक साधु मम गूह आवा । ऐसा साधु हम नहिं पावा ॥
को तुम काहु कहाते आये । अपनो परचो कहो बुझाये ॥
सुकृत वचन ।
जो तुम पूछे राय सुजाना । अपनी कथा कहूँ सहिदाना ॥
अमर लोक ते पुरुष पठाये । जीव उबारन हम जग आये ॥
आये उत्तर दिशि चित भाये । श्री नगर तुर्म कारण आये ॥
बद्री नाथ आये तुम जहिया । हमहूँ संग आये नृप तहिया ॥
छन्द-- जीव सबसे कह्यो घर घर शब्द काहू ना गह्यो ।
गयो बद्रीनाथ मन्दिर चित्त मम हर्षित भयो ॥
दीन मस्तक हाथ तब जड़ रूप पारस कर लियो ।
प्रीति तुम यह देखि दृढ़ होय दरस अब तोहिको दियो ॥
सोरठा- भक्ति हेतु तुव अंग, साधु प्रीति तुव अंग अहै ॥
निशि दिन साधू संग, ताते चित तोहि राचेयो ॥
राजा वचन ।
चौ०- एतिक वचन राव सुन जबहीं । बिहँसि पदपंकज गहि तवहीं ॥
निशि गति रवि जिमि उगे अकासा । कोक शोक मिटि होत हुलासा ॥
यहि मर्याद दरस आनन्दा । जिमि चकोर पाये निशि चन्दा ॥
रानी राय चरन उर धारी । कृपा कीन मम विथा विसारी ॥
मोहि सनाथ कीन प्रभु पावन । हम अपकर्मी यम मन भावन ॥
अपना करि कीजे मोहि दाय। हम चीन्हा यह तुम्हरी माया ॥
सकल जीव चकित मन भयऊ । नगर लोग सब देखन धयऊ ॥
तरुण वृद्ध बालक सब धाये । सबहीं देखि प्रदक्षिणा लाये ॥
संत वृद्ध बहु जुरे अपारा । स्तुति करहि सकल बहु बारा ॥
छन्द-- पाणि जोरिके राव ठाढे देहु पद मोहि पावनो ।
चरण कमल अधार तुम मोहि उभय और न भावनो ॥
छोड़ी नारि पुत्र पुत्री तुरी गज धन सम्पदा ।
राज काज कान छरडयो देखि पद तुम मनरता ॥
सोरठा- अब प्रभु तुम ते काज, यहि विधि मन मानिया ।
तज्यो लोक कुल लाज, सत पद चित अनुराग मोहि ॥
तात्पर्य - जब सत्ययुगमें कबीर साहब श्रीनगरमें प्रगट हुये वहाँके राजा राममोहन रायको (जो बड़ा विद्वान् वेदपाठी, वेदविधिपूर्वक कर्म करनेवाला और संत सेवी था) उपदेश देने लगे । पर राजाने विशेष ध्यान नहीं दिया । फिर राजा सब परिवार सहित बद्रीयात्राको चला तब कबीर साहब भी साधुके भेषमें उसके साथ हो लिये ।
जब राजा बद्रीनाथमें पहुँचकर दर्शन आदि कर अपने आवासपर आ निश्चित हो बैठा तब कबीर साहबने मंदिरमें जाकर मूर्तिके माथेपर हाथ रखा
जिसके प्रभावसे मूर्तितो पारसकी और मूर्तिके नीचेकी चौकी सोनेकी दीख पड़ी । सबेरा होनेपर पण्डालोग मंदिरमें गये । आश्चर्यमय कौतुक देख अचम्भित हो राजा आदि सबको दिखलाया पर किसीको यह ज्ञात नहीं हुआ कि, यह कौतुक किसका कर्तव्य है । अबभी राजाने सतगुरुको नहीं पहचाना ।
पश्चात् राजाने देश देशमें पत्र भेजकर साधुओंको निमंत्रित किया बड़ा भारी भण्डारा आरम्भ किया । साधुओंकी पंक्ति बंठी तो उनके मध्य कबीर साहब भी पूर्णचन्द्रके समान प्रकाशित पृथ्वीसे अधर बंठे हुये देख पड़े । ऐसी लीलाकी देख सब लोग चकित हो बारम्बार स्तुति करने लगे । राजाको पूर्ण विश्वास हुआ कि, इसी साधुसे मेरा उद्धार होगा । राजा रानी दोनों हाथ जोड़कर खड़े हो स्तुति करने लगे । राजाने विनय पूर्वक प्रार्थना करके पूछा कि, महाराज ! आप कौन हो ? कहाँसे एवं किसलिये पधारें हो ?
कबीर साहबने उत्तर दिया कि, हे राजन् ! हम अमर लोकसे आये हैं, जो हमारा उपदेश ग्रहण करेगा वह भी अमर हो जायेगा । यदि तुम्हें अमरलोक जाना है तो मेरे साथ चलो । राजाने सब संसारी राजवंश त्यागकर अपने साथ रानी और अनेक पुत्र तथा ( १७००० ) सत्रह हजार परिवार और प्रजाको साथ लेकर परम धामकी यात्रा की ।
१५ प्रश्न-संगका फल-सत्संग और कुसंगका फल कहिये ?
उत्तर - सत्संगके प्रतापसे बड़े पापी अधर्मी परम धामको गये । कुसंगसे बड़े २ तपस्वी महात्मा ज्ञानी नरकको अथवा नीच योनियोंको प्राप्त होगये ।
सत्संग अंगकी साखी ।
कबीर- संगति साधुकी, नित प्रति कीजे जाय ।
दुर्मति दूर बहावसी, देसी सुमति बताय ॥ १ ॥
कबीर- संगतिसे सुख ऊपजे, संगतिसे दुख होय ।
कहैं कबीर जहाँ जाइये, साधू संगति होय ॥ २ ॥
कबीर- संगति साधुकी, कभी न निष्फल जाय ।
ज्यों पै बोवैं भूमिके, फूले फले अघाय ॥ ३ ॥
कबीर- संगति, साधुकी, हरे औरकी व्याध ।
संगति बुरी कुसाधुकी, आठों पहर उपाधि ॥ ४ ॥
कबीर- संगति कीजै साधुकी, जौकी भूसी खाय ।
खाँड भोजन मिले, साकर संग न जाय ॥ ५ ॥
दान देनेकी रीति
कबीर- संगति, साधुकी, ज्यों गंधीको पास ।
जो गंधी कछु देवे नहीं, तौ हू बास सुवास ॥ ६ ॥
कबीर- एक घड़ी आधी घड़ी, आधी हूमें आधि ।
संगति कीजै साधुकी, कटे कोटि अपराध ॥ ७ ॥
कबीर- मथुरा जा भावै द्वारिका, भावे बदरी नाथ ।
साधु संग हरि भजन बिन, कछू न आवै हाथ ॥ ८ ॥
कबीर- मेरा संगी दोय जनाँ, एक वैष्णव एक राम ।
वे दाता हैं मुक्तिके, वे सुमरावें नाम ॥ ९ ॥
कबीर- संगति साधुकी, जो करि जाने कोय ।
चन्दनवन चन्दन भया, वांस न चन्दन होय ॥ १० ॥
कबीर- मलया गिरिके पेड़में, सरप रहे लपटाय ।
रोम २ विष भीनिया, अमृत कहाँ समाय ॥ ११ ॥
कबीर- चन्दन जैसा संत है, सर्प यथा संसार ।
वाके अंग लपटा रहै, भागे नहीं विकार ॥ १२ ॥
कबीर- जाघर हरिकी भक्ति नहीं, सन्त नहीं मिहमान ।
ताघर यम डेरा किया, जीवत भया मसान ॥ १३ ॥
कबीर- राम तलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय ।
जो सुख साधू संगमें, सो सुख वैकुण्ठ न होय ॥ १४ ॥
कबीर- खाई कोटका, पानी पिये न कोय ।
जाइ परे जब गंगमें, तब गंगोदक होय ॥ १५ ॥
कबीर- मन पंछी भया, मन माने तहाँ जाय ।
जो जैसी संगति करे, सो तैसो फल पाय ॥ १६ ॥
कुसंगका अंग ।
कबीर- उज्ज्वल देखिये, बक ज्यों माँड़े ध्यान ।
धोरे बैठि चपेटिहै, यों लें बूड़े ज्ञान ॥ १ ॥
कबीर- भेष अतीतका, करतूत अपराध ।
बाहर दीसे साधु गति, माहि बड़ा असाध ॥ २ ॥
कबीर- वामी कुटे बावरा, सरप न मारा जाय ।
मूरख वामी ना डसे, सरप जगतको खाय ॥ ३ ॥
कबीर- बेटी ब्राह्मणकी, मांस शराब न खाय ।
संगति भई कलालकी, मद बिन रहा न जाय ॥ ४ ॥
दान देनेवालेका कर्तव्य, दया
दीक्षाकालके कर्तव्य ।
९६ प्रश्न—गुरु करने और दीक्षा लेनेके समय क्या क्या करना आवश्यक है ?
उत्तर—जो रीति और व्यवहार गुरु बतलावे वह करे । गुरुको प्रतिष्ठाके साथ वस्त्र आदि पहनवावे । उच्च आसनपर बैठकर, रुपया आदि सब यथाशक्ति भेट धरे । साधुओंको भण्डार दे जहाँतक अपनेसे होसके साधुओंको भेटादि देकर प्रसन्न करे । जिसने अपना सर्वस्व तन मन धन गुरुके अर्पण किया उसकासर्व कार्य सिद्धि हुआ । अपने गुरुका आज्ञाकारी रहना गुरुको गोविन्दसे बढ़कर मानना शिष्य का मुख्य कर्तव्य है ।
गुरु अंगकी साखी ।
कबीर—गुरुको कीजे दण्डवत, कोटि कोटि परणाम ।
कीट न जानें भूङ्गीको, गुरु करले आप समान ॥ १ ॥
कबीर—गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काको लागों पाय ।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दिया बताय ॥ २ ॥
कबीर—बलिहारी गुरु आपने, घड़ि घड़ि सौ सौ बार ।
मानुषसे देवता किया, करत न लागी त्रार ॥ ३ ॥
कबीर—ते नर अंध हैं, गुरुको कहते और ।
हरि रुठेतें ठौर है, गुरु रुठे नहिं ठौर ॥ ४ ॥
कबीर—गुरु हैं बड़े गोविंदते, मनमें देखु विचार ।
हरि सुमिरे सो बार है, गुरु सुमिरे सो पार ॥ ५ ॥
कबीर—गुरुसे ज्ञान जो लीजिये, शीस दीजिये दान ।
केतिक भोंदू पछि मुये, राखि जीव अभिमान ॥ ६ ॥
कबीर—गुरु मुख गुरु आज्ञा सुने, छोड़ि देइ सब काम ।
कहैं कबीर गुरु देवको, तुरत करे परनाम ॥ ७ ॥
कबीर—उलटे सुलटे वचनको, शिष्य न मानै दुख ।
कहैं कबीर संसारमें, सो कहिये गुरु मुख ॥ ८ ॥
कबीर—गुरु और पारसमें, बडो अंतरो जान ।
वह लोहा कंचन करे, वह करे आप समान ॥ ९ ॥
कबीर—राम नामके पटतरे, देवेको कछु नाहिं ।
क्या ले गुरु संतोषिये, हवस रही मन माहिं ॥ १० ॥
कबीर—निज मन तो नीचा किया, चरण कमलके ठौर ।
कहैं कबीर गुरु देव बिन, नजर न आवै और ॥ ११ ॥
जैन साहित्यका मेघकुमार
कबीर- तनमन दिया तो भल किया, शिरका जासी भार ।
जो कबूँ कहैं कि मैं दिया, धणी सहेगा मार ॥ १२ ॥
कबीर- जो दीसे सो बिनसे, नाम धरे सो जाय ।
कबीर सोई सत्य है, सत गुरु दियो बताय ॥ १३ ॥
कबीर- चित्त चोखा मन मसकला, बुद्धि उत्तम मति धीर ।
सो धीवान सोसंचरे, जो सत गुरु मिले कबीर ॥ १४ ॥
कबीर- सत गुरु बड़े जहाज हैं, जो कोई बैठे आय ।
पार उतारे औरको, अपनो पारसलाय ॥ १५ ॥
कबीर- विनु सत गुरु बांचे नहीं, फिर लोडे भव मांहि ।
भव सागरके बीचमें, सतगुरु पकड़े बाँहि ॥ १६ ॥
कबीर- गुरु मुख गुरु चित्तवत रहे, जैसे मणिहि भुवंग ।
कहैं कबीर विसरे नहीं, यह गुरुमुखको अंग ॥ १७ ॥
कबीर- गुरु मुख गुरु चित्तवत रहे, जैसे शाह दिवान ।
और कबीर न देखई, वाहीक ओर ध्यान ॥ १८ ॥
कबीर- चौसठ दीवा जोयके, चौदह चन्दा मांहि ।
तिस घर किसका चांदना, जाघर सतगुरु नाहि ॥ १९ ॥
कबीर- कोटिक चन्दा ऊगवे, सूरज कोटि हजार ।
सतगुरु मिलिया बाहिरें, दीसे घोर अंधार ॥ २० ॥
कबीर- गुरु विचारा क्या करे, शिष्यहिमें है चूक ।
भावे ज्यों परमोधई, बाँस बजावे फूंक ॥ २१ ॥
कबीर- सेवक मुखहि कहावे, सेवामें दूढ़ नाहि ।
कहैं कबीर सो सेवका, लख चौरासी माहि ॥ २२ ॥
कबीर- फल कारण सेवा करे, निशि दिन चाहे राम ।
कहैं कबीर सेवक नहीं, चहे चौगुना दाम ॥ २३ ॥
कबीर- सेवक स्वामी एक मत, जो मतसे मत मिलि जाय ।
चतुराई रीझे नहीं, रीझे मनके भाय ॥ २४ ॥
कबीर- सतगुरु शब्द उलंघिके, जो कोई शिष्य जाय ।
जहाँ जाय तहाँ काल है, कहैं कबीर समझाय ॥ २५ ॥
कबीर- गुरु बरजा शिष्य नाकरे, क्यों कर बाँचे काल ।
शु कहा बलि ना कियो, ताते गये पताल ॥ २६ ॥
कबीर- द्वार धनीके पड़ा रहे, धका धनीका खाय ।
कबहूँ धनी निवाजि है, जो दर छोड़ि न जाय ॥ २७ ॥