कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 242, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंइन्द्रमती स्तुति करती है ।
तुम धन्य हो दयानिधान सुजान नाम अचिन्तयं ।
अकथ अविचल अमर अस्थिर अनघ अज सु अनादियं ॥
असंशय निः काम धाम अनाम अटल अखंडितं ।
आदि सबके तुमहि प्रभु हो सर्व भूत समीपतं ॥
सोरठा-मोपर भये दयाल, लियहु जगाई जानि निज ।
काटेहु जमको जाल, दीन्हो सुखसागर करी ॥
कबीरवचन धर्मदास प्रति ।
संपुट कमल लगे तेहि बारा । चले हंस निज दीप मंझारा ॥
करुणामय (ज्ञानी) वचन इन्द्रमती प्रति ।
ज्ञानी बूझें रानी बाता । कहो हंस तुम्हरे विख्याता ॥
अब दुख द्रन्द तोर मिटि गयऊ । षोडश भानु रूप पुनि भयऊ ॥
ऐसे पुरुष दया तोहि कीन्हा । संसय सोग भेटि तुव दीन्हा ॥
इन्द्रमती का अपने पति राजा चन्द्रविजयको लोकमें लाने के
लिये विनती करना । इन्द्रमतीवचन ।
इन्द्रमती कह दोउ कर जोरी । हे साहिब इक विनती मोरी ॥
तुम्हरे चरण भागते पायी । पुरुष दर्श कीन्ह हम आयी ॥
अंग हमार रूप अति सोही । इक ससय व्यापे चित मोही ॥
मो कहैं भयो मोह अधिकारा । राजा तो पति आहि हमारा ॥
आने ताहि हंसपति राई । राजा मोर काल मुख जाई ॥
करुणामय वचन ।
कहे ज्ञानी सुन हंस सुजाना । राजा नहि पाये परवाना ॥
तुव तो हंस रूप अब पाया । कौन काज कहैं राव बुलाया ॥
राजा भाव भगति नहि पाया । सत्त्व हीन भव भटका खाया ॥
इन्द्रमती वचन ।
हे प्रभु हम जग महँ रहेऊ । भगति तुम्हार बहुत विधि करेऊ ॥
राजा भगति हमारी जाना । हम कहैं वरजेउ नाहि सुजाना ॥
कठिन भाव संसार सुभाऊ । पुरुष छोड़ि कहूँ नारि रहाऊ ॥
सब संसार देहि तिहि नारी । सुनतिहि पुरुष डार तेहि मारी ॥
राजा काज अति मान बडाई । पाखंड क्रोध और चतुराई ॥