भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

Devanagarihipublished1,367 पृष्ठ

पृष्ठ 243, कुल 1367 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 243

साधु संतकी सेवा करऊँ । राजाकेर त्रास ना डरऊँ ॥
सेवा करों सन्तकी जबहीं । राजा सुनि हरषित हो तबहीं ॥
जो मोहि ताजन देतो राजा । तो प्रभु मोर होत किमि काजा ॥

छन्द-रायकी हम हती प्यारी, मोहि कबहु न बरजेऊ ।

साधु सेवा कीन्ह नित हम, सब्द मारग सिरजेऊ ॥

चरन मो कहैं मिलत कैसे, मोहि हटकत राज जो ।

नाम पान न मिलत मो कहैं, कैसे सुधरत काज जो ॥

सोरठा-धन्य राय सुजान, आनहु ताहि हंसनपति ।

तुम गुरु दयानिधान, भूपति बंद छुडाइये ॥

कबीर बचन धर्मदास प्रति ।

सुन ज्ञानी बहुतै विहैंसाये । चले तुरंत बार नहिं लाये ॥

गढ गिरनार बेगि चलि आया । नृपति केरि अवधि नियराया ॥

घेन्या ताहि लेन जमराई । राजहिं देत कष्ट बहुताई ॥

राजा परे गाढ महैं आई । सतगुरु कहे तहां गुहराई ॥

छोडे नृप नाहीं जमराई । ऐसी भगति चूक है भाई ॥

भगति चूक कर ऐसे ख्याला । अवधि पूर जम करै विहाला ॥

चन्द्रविजयका कर गहि लीन्हा । ततछन लोक पयाना दीन्हा ॥

रानी देखि नृपति ढिग आई । राजा केर गह्यो तब पाई ॥

इन्द्रमती बचन ।

इन्द्रमती कहे सुनहु भुवारा । मोहि चीन्हों मैं नारि तुम्हारा ॥

राजा चन्द्रविजय बचन ।

राय कहैं सुनु हंस सुजाना । बरन तोर षोडस ससि भाना ॥

अंग अंग तोरे चमकारी । कैसे कहों तोहि मैं नारी ॥

तुम तो भगति कीन्ह भल नारी । हमहू कहैं तुम लीन्ह उबारी ॥

धन्य गुरु अस भगति दिढाये । तोरि भगति हम निजघर पाये ॥

कोटिन जन्म कीन्ह हम धर्मा । तब पाई अस नारि सुकर्मा ॥

हम तो राज काज मन लाया । सतगुरु भगति चीन्ह नहि पाया ॥

जो तुम मोरि होत ना रानी । तो हम जात नरककी खानी ॥

तुव गुन मोहि वरनि ना जाई । धन्य गुरु धन्य नारि हम पाई ॥

जस हम तो कहैं पायउ नारी । तैंसे मिले सकल संसारी ॥