भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पुरुषका हृदय असहाय दुःखी भारतवासियोंकी कर्षणा से पूर्ण हो गया जले हृदयोंकी उन्हाँने निरंजनके शरीरसे भी अगाडी निकलकर सत्यलोकका द्वार जा खट खटाया।

कबीर साहिबको आज्ञा :—हुई कि, आप पुण्य भूमि भारतमें जाकर दुःखी जीवोंको दुःखसे मुक्त करो सच्चे सामान्य धर्मका उपदेश करो जो सबका एकसा है। हिन्दू मुसलमान दोनोंको उसके प्रकाशसे प्रकाशित कर दो जो कि, वे आपसके कलहको छोड़कर सच्ची शांतिको ग्रहण करलें। सभी कबीर साहेबके विषयमें मुक्त कण्ठसे स्वीकार करते हैं कि, कबीर साहिबका सामान्य धर्मका उपदेश था जो कि, सभी धर्मवालोंको एकसाही हितकारी हैं, उनकी युक्तियाँ भी सर्व धर्म विषयिणी थीं।

कबीर साहिबका प्रागट्य

संवत् १४५५ ज्येष्ठ शु० पूर्णिमा सोमवारके दिन काशीके लहर तालाबमें कबीर साहिबका प्राकट्य हुआ था, महापुरुषोंके जन्मोपर जो २ प्राकृतिक सुषुमाएँ दीखा करती हैं वे इनके जन्मपर भी कम नहीं थीं सभी प्राकृतिक दृश्य सन्त पुरुषोंको विशेषताएँ बताते हुए दीख रहे थे। उस समय जुलाहे नीमा नीरू नामक मुसलमान दम्पती आपको उस तालाबसे उठा लाए एवं पुत्रकी भावनासे ओत प्रोत होकर आपका लालन पालन करने लगे, आपने बाल्यकालमें वे लोकोत्तर चरित्र दिखाये जो कि, महापुरुषोंकी बाल लीलासे स्वाभावसेही चमका करते हैं। बड़े होनेपर तात्कालिक देहलीके बादशाह सिकन्दर लोधीको दिव्य सिद्धियाँ दिखाने एवम् अपने नामसे कमाल कमालीको जिन्दा कर देनेके बाद आप खूब चमके। आपकी सर्व धर्म विषयक युक्तियोंने अच्छा उच्च स्थान पाया जैसे मध्यस्थकी आवश्यकता थी वैसेही हुआ आपने यावत्स्थिति सांप्रदायिक द्वेष मिटानेकी सदा चेष्टा की। आपके सर्व श्रेष्ठ शिष्यश्री धर्मदासजी थे जिनके कि, वंशधर आजकी उनके पन्थकी गुरुआई कर रहे हैं तथा कमाल कमाली आदिके वंशधर भी आपके उपदेशोंका प्रचार कर रहे हैं। आज कबीर साहिबके पन्थके अनेकोंही ग्रन्थ हैं, जिनमेंसे अनेकोंको उच्च कोटिके हिन्दी दार्शनिक साहित्यमें संमाला जा सकता है पर ऐसा कोई भी ग्रन्थ नहीं था जिससे कि, दूसरे संप्रदायोंके आक्षेपसे कबीर पन्थकी रक्षा हो सके।

कबीर पन्थकी इस कमीको इस कबीर मन्शूरने पूरा कर दिया इसके लेखक महात्मा परमानन्दजीने इसे इस प्रोक्तासे लिखा है कि, इससे कबीर दर्शनके सिद्धान्त साङ्गोपाङ्ग पुष्ट बहो जाते हैं।

कबीर मन्शूरके विषय

भी अति उत्तमतासे क्रमपूर्वक समाविष्ट किये गये हैं उनकी क्रमपंक्ति पूर्वके साथ सम्बन्ध रखती हुईही चली है। जिस तरह अन्य सांप्रदायिक ग्रन्थ अपने अपने सिद्धान्तोंके अनुसार सृष्टि रचनासे प्रारम्भ होते हैं उसी तरह इस ग्रन्थमें भी सबसे पहिले अपने ढंगका सृष्टि रचनाका निरूपण किया है, सतयुग त्रेता और द्वापरमें संसारकी आवश्यकताके अनुसार सत्य पुरुषके दिव्य सन्देश देश देशान्तरोंमें सुनाकर कबीर साहिबने सबको सुखी किया यह बात दूसरी अध्यायमें गंनकी गई है। तीसरी अध्यायमें कबीर साहिबके कलियुगके प्रादुर्भाव हैं सबसे पिछले सिकन्दर लोधीके समयके प्राकट्यकी कथा है। व्यक्तिभावसे लेकर श्रीरामानन्दाचार्यजीके शिष्य होने आदिके वृत्तान्त विस्तारपूर्वक लिखे गये हैं। अध्यायों चारसे लेकर १२ तक उनकी दिव्य सिद्धियोंके दिखानेका विशद वर्णन किया है कि, किस प्रकार अपने नामसे मुरदे कमाल कमालीतकोंको पुनः जीवित करके अश्वद्वालुजनोंपर भी अपना पूरा प्रभाव प्रगट कर दिया था। इसके साथही साथ-कबीर पन्थके संस्थापक धर्मदासजीके व्यालीस वंश एवम् कमाल कमाली आदि बारह पन्थोंका