कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 28, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंसामान्य परिचय, कबीर पन्थके धार्मिक नियम उनके भक्त एवम् पीर्वात्य और पाश्चात्य उपास्य देव ऋषि मुनि धर्माचार्य, यज्ञ पुस्तक एवम् उपासना आदिका साथही साथ विशद वर्णन किया है। अध्याय तेरहमें कबीर शब्दके अर्थ उनके विषयमें ऋषीयवरोंके वचन तथा अन्य प्रमाण दिये गये हैं। चौदह और पन्द्रह अध्यायमें कबीर साहबके लोमश आदि प्राचीनतम शिष्य, सत्ययुग त्रेता और द्वापरके हंस एवम् कलियुगके हंसोंका वर्णन विस्तारके साथ करते हुए कबीर पन्थसे भिन्न उन पन्थोंके प्रवर्तक शिष्योंका वर्णन किया है जिनके कि शिष्य आज कबीरसाहबको अपना आद्य आचार्य नहीं मानते। १६ वें अध्यायमें प्रकृतिजय और शरणागतके धर्म आदि अनेक उप-युक्त विषय वर्णित हैं। सत्रहवें अध्यायमें बन्धनके कारण मन कर्म आदिका विचार किया है। अठारहवें अध्यायमें पुनर्जन्मका वर्णन है जो पाश्चात्य अथवा चार किताबोंवाले पुनर्जन्मको आज हिन्दुओंकी तरह नहीं मानते उन्हें उन्हींके ही, धर्म ग्रन्थोंसे समझाया गया है कि, अपने श्रद्धेय ग्रन्थोंको विचार पूर्वक देखो। ये कारण पुनर्जन्म माननेके हैं। उन्नीसवीं अध्यायका जीव वैचित्र्य भी इसीका पोषक है उसमें अनेक तरहके संस्कारी जीवोंको केवल इसी लिये दिखाया है कि, पशु आदि योनियोंमेंसे भी पूर्व जन्मकी कर्त्तृकी फलसे कितना दिव्य ज्ञान दीख रहा है। बीसवें अध्यायमें कबीर साहबके दार्शनिक सिद्धान्तको सूक्ष्म रूपसे प्रतिपादन करनेवाले आदि मंगलको कह कर सार्वधार्मिक युक्तियों और धर्म ग्रन्थोंके प्रमाणोंसे जीवहत्या और मदिरा मांसका निषेध किया गया है तथा सब धर्मोंको बताया है। इक्कीसवीं अध्याय जीवके वर्णनमें ही पूरा हुआ है इसमें जीवके अच्छे बुरे स्वाभाविक उपकरण तथा औचित्य लानेके साधनोंके साथ सत्य-लोककी हंसा देहका भी वर्णन किया है इसके साथ मुक्ति होनेके अनेकों उपाय भी लिखे हैं। बाईसवीं अध्यायमें संसार भरके मजहबोंका विचार है। तेईसवीं अध्यायमें विविधोपदेशके गजल तथा चौबीसवीं अध्यायमें अनेकों विषयोंका प्रश्नोत्तरके रूपमें निर्णय किया है। इस तरह कबीर मन्शुरका यह परिष्कृत अनुवाद चौबीस अध्यायोंमें पूरा होता है। इसमें किसी भी मजहबका उपकारी कोई भी विषय बाकी नहीं रह जाता सभी आजाते हैं। उनके समन्वय करनेके बाद यह कबीर दर्शनको सोपपत्तिक पूरा करता है।
सृष्टि रचना — भी इस दर्शनकी अन्य दर्शनों की तरह भिन्न प्रकारकी ही है, कबीर साहबके हंस सत्य साकेत लोकवासी महाराजा विश्वनाथ सिंहजीदेव रीवां नरेशने आदि मंगलपर टीका की है, उसमें सृष्टि प्रकरण अत्यन्त सावधानीके साथ समझाया है कि, पहिले सत्यलोकवासी सत्यपुरुष भगवान् अकेलेही थे, वहाँके सब निवासी साहबके ही रूपके थे। उनके लोकका प्रकाश चैतन्याकाशमें पड़ रहा था यही समष्टि जीव है। इसपर साहबने दया की इसे शब्दसे चैतन्य करके अपनी ओर खींचनेकी इच्छा की। समष्टिजीवमें सुरति होगई इसके पीछे उसे अनेक होनेकी इच्छा हुई, क्रमशः मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और मैं ब्रह्म हूँ यह अनुभव हुआ। उसीसे जीव भी हो गया। जो इसे सारशब्दका उपदेश दिया गया था उसका इसने परा आद्या शक्ति, अक्षर, नारायण, संकर्षण और महाविष्णु अर्थ समझा—समष्टिजीवमें जो कारण रूपा इच्छा थी जिसने कि, इसे जगतमुख किया है। दूसरी इच्छा परा आद्या शक्ति है इसीको योगमाया भी कहते हैं इन दोनोंने ही अक्षर ब्रह्म किया है पर ये दोनों इच्छाएँ गुप्त हैं इन्हे कोई देख नहीं पाता। अनुभवगम्य ब्रह्म मैं हूँ यह बात समष्टि जीवके श्वाससे ही उत्पन्न होती है। आठों सिद्धियाँ भी उसीसे उत्पन्न हुई हैं।
आद्या शक्तिने संसारको बनाकर खड़ा कर दिया वही इसकी चोटी पर बैठकर इसे प्रकाशित कर रही है, अचिन्त्य रामके प्रेमसे ओम् का प्रादुर्भाव हुआ उसीसे चारों वेद उत्पन्न हो गये योगमायाने अक्षरको नींद दी। उस समय एक अण्ड पानीपर तैरने लगा। नींद बुलने के बाद आप