कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 29, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंउसमें प्रविष्ट हो गया इसी भगवान् के नाभिकमलसे ब्रह्मा उत्पन्न हुआ उसने ब्रह्माण्डकी जड़ बूट डालनेका प्रयत्न किया, नारायणने इसे ओम्का उपदेश दिया उसीसे वेद हुए इनका जगत्मुख अर्थ देखनेपर संसार बन गया। महाविष्णु या निरंजनसे ब्रह्मा विष्णु और महेश हुए। ब्रह्माण्डके प्राणी सुखके लिये प्रयत्न कर रहे हैं। पर सुखके साधनोंको बिना जाने सुख नहीं पा सकते। कबीर साहिब कहते हैं कि, फिर हमें जीवोंके उद्धारके लिये भेजा कि अपने उपदेशसे जीवोंको सुखी करो। यह आदिमंगल बीजकमें दिया हुआ है। हमने इसी ग्रन्थमें इसका अर्थ किया। इसकी तरह और भी इसी पन्थके ग्रन्थ कहते हैं।
दूसरे ग्रन्थों की—सृष्टि भी इससे ही मिलती जुलती हैं वे सत्य पुरुष से सहज, अंकुर, इच्छा, सोहम् अचिन्त्य और अक्षर पुत्र को प्रकट हुआ कहते हैं तथा आद्या भी इसी से हुई। सत्यपुरुष का छठा पुत्र अक्षर जब जलीय स्थलमें बैठता था उस समय योगमाया से उसे नींद आ गई। उस समय अक्षरके ध्यान एवम् सत्य पुरुष के शब्द से एक अण्ड बनकर पानी पर तैरने लगा। उसी से निरंजन की उत्पत्ति हुई।
अण्डसे निरंजन हुआ इस विषयमें तो श्रीविश्वनाथजीका मत भेद नहीं है किन्तु वे अक्षर को ही अण्डमें प्रविष्ट हुआ मानते हैं, इसने सत्य पुरुषके पुत्र कूर्मजीसे सृष्टि रचनाका सामान लिया। आद्या और इसकी जोट होगई इससे ही त्रिगुण ब्रह्मा विष्णु और महेश उत्पन्न हुए। आद्याने अपने अंशसे सुकुमारियां उत्पन्न कीं, जो कि, इन तीनोंकी पत्नियां बनी हैं। अक्षर पुरुषने वेद दिये निरंजनने पाये उससे ब्रह्माको दिये इसने इनका यथेष्ट प्रचार किया, वाकी सब रचना अन्य दर्शनों जैसीही है। इसी अध्यायके पन्चीसवें प्रकरणमें वेदके प्राकट्यको अन्य दार्शनिकोंके साथ मिलाया है तथा निरंजनको अग्निरूप सिद्ध किया है। दूसरे लोग तो सिकन्दर लोधीके समयमेंही कबीर साहिबका प्रादुर्भाव मानते हैं पर कबीर पन्थका ऐसा मन्तव्य नहीं है। वे कबीर साहिब तथा साहिबमें अभेद देखते हुए युग २ में कबीर साहिबका विभिन्न नामोंसे होना स्वीकार करते हैं एवम् सिकन्दर लोधी के समय के प्राकट्य को सबसे बाद का स्वीकार करते हैं।
जन्मके—विषयमें भक्तमालने तो कुछ लिखाही नहीं है। दूसरे २ उनके पन्थके ग्रन्थोंमें बहुत कुछ लिखा हुआ है उसमें बीजककी विश्वनाथी टीकाका मत भेद है। वे रामानन्दजी महाराजके दिव्य आशीर्वादसे एक सुपात्र विधवा ब्राह्मणीके गर्भसे प्रगट हुए बताते हैं पर काशीके लहर तालाबके किनारे नीमा नीरूको मिले। इस बातमें किसीका मतभेद नहीं है।
शेखतकीके कहनेसे सिकन्दरने आपके मारनेके अनेकों प्रयत्न किये पर किसी तरह भी उनके प्राण न लेसका वरन उनके अलौकिक चमत्कार देखकर धर्मन्धतासे निवृत्त होगया। इनके सामान्य धर्मके उपदेश तथा दोनोंकी समताके दिखानेसे सहृदयताका बीज बोया गया। इस बातमें किसीका भी मतभेद नहीं है। इस कबीर मन्थूरने इस बातको और भी आगे बढ़ाया है इसने वेदोंकी तरह हा मूसाको तोरत, दाऊदको जबूर, ईसाको इजील तथा मुहम्मद साहिबको कुरानका देना कहा है एवम् इनके ढंगकी सृष्टिकी उत्पत्ति भी दिखाई है। इतना ही नहीं किन्तु यह भी सिद्ध किया है कि, नाम भेद भले हों पर गुण कर्मके मिलापसे इस बातका पूरा निश्चय हो जाता है कि पौर्वात्य और पाश्चात्य दोनोंही एक विष्णुकीही उपासना करते हैं।
बलि दान में भी — सबका एक मत दिखाया है वेद और तोरत आदिमें उनके धर्मका आधार दिखाकर सर्व देशी सिद्धान्तसे इनका निःशेषही दिखाया है साथही कबीरजीका भी मत दिखा दिया है। सबके मत मतान्तरोंसे यह सिद्ध करके दिखा दिया है कि बलि और कूर्मानीकी आज्ञा असली परमात्माकी तरफसे नहीं है किन्तु भावनाके बनाये हुए ईश्वरकी ओरसे हैं यह अच्छी तरहसे समझा दिया है।