कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 30, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुख्य उद्देश— तो यह था कि, हिन्दू मुसलमान आदि आपसके भेद भावोंको छोड़कर एक होजाय, एक दूसरेके धार्मिक भावोंका आदर करे व्यर्थ के पाषण्डसे निवृत्त होकर सच्चे धर्म ग्रहण करें एक दूसरेके वास्तविक तत्त्वको देखें मुख्यतः वे जीवहत्यासे बड़े दुखी थे यही कारण है उनके मुहसे ऐसे शब्द निकल जाते थे कि—“उनकी बहिष्कृत कहाँसे होइहै सांझहि मुरगी मारे” कि, जो दिन भर रोजा आदि रखकर रातको मुरगी मारते हैं उनकी बहिष्कृत कहाँसे हो सकेगी, इसी तरह देवी आदिके नामपर बलि करनेवाले हिन्दुओंसे कहा है कि—“सन्तो पांडे निपुण कसाई” है महात्माओं ! यह पांडे तो चतुर कसाई दीख रहा है। इस एकताको इस ग्रन्थने और भी आगे बढ़ाया है जो बातें आजतक विशेष समन्वयके साथ नहीं कही गई थी इसने वे भी दिखायी हैं।
आजतक किसी भी कबीर पन्थी ग्रन्थने इतनी सत्यता नहीं दिखाई थी, जो कि इसने दिखाई है। कलमेंका अर्थ करती बार बताया है कि, जब उस परमात्माको कृपालु और दयालु कहा जाता है तो फिर जीवहत्याकी उसकी आज्ञा नहीं हो सकती। इसी बातका हिन्दुओंकी ओर भी इशारा किया है कि जीववध मनोवृत्ति या वृणित स्वार्थोंसे है ईश्वरार्थ नहीं। इसी विषय पर पश्चिमकी चारों पुस्तकोंके मत दिखाये हैं तथा कुरानमें गौहत्याकी आज्ञाका अभाव दिखाते हुए गऊके शापसे याकूबकी दुर्दशाका वर्णन किया है।
मूर्तिपूजा— भी श्रद्धा विश्वासकी महत्ता समझाते हुए दिखाई है कि, भक्त मीराबाई भगवान् कृष्णको भोग लगाकर विषभी पीगई थी पर उसका उसपर कुछ असर न हुआ। इस विषयमें और भी कई प्रभावोत्पादक उदाहरण दिये हैं। इसी तरह अरबकी भी १ लात, २ मनात और गुरी नामक तीन कुर्शजातिकी प्रतिष्ठित देवियोंका उदाहरण दिया है कि, मुहम्मद साहिबने जब इनको तोड़ा तो मन्दिरमेंसे काली २ मूर्तियाँ स्त्रियोंका रूप धारण कर रोती हुई बाहिर निकलीं, इससे सिद्ध होता है कि, मुहम्मद साहिबके पूर्वज भी मूर्तिपूजा किया करते थे, मूर्तियाँ देखनेको ही जड़ती दीखती हैं वास्तवमें नहीं हैं, नहीं तो अरबकी देवीकी मूर्तियाँ स्त्री होकर रोती हुई क्यों निकलतीं। यही नहीं किन्तु इस ग्रन्थने उन आयतोंका उल्लेख भी कर डाला है जिनसे कि मूर्तिपूजा सिद्ध होती है इस प्रकार इसने इस विषयमें भी पूर्वात्य और पाश्चात्यों तथा हिन्दू और मुसलमानोंका एकसा मन्तव्य दिखाया है इस तरह यह पुस्तक कबीर पन्थी हिन्दू तथा मुसलमान सबके लिये समानही हितकारी है।
**जड़ोंकी बातचीत—**के पौराणिक प्रकरणोंको देखकर लोग उनकी सत्यताके सन्देहमें डूबा करते थे ऐसेही लोगोंके लिये कबीर मन्शूरने पश्चिमकी चारों किताबोंमें भी ऐसी ही बातें दिखाई है कि, आदमके पुतला बनानेके लिये मिट्टीलेती बार भूमि रोई कि मनुष्य बनकर बड़े पाप करेंगे तथा मुझपर बड़े पाप होंगे। वह जड़ भूमिका रोना पुरानोंकी तरह इसलामी पुस्तकोंमें भी देखा जाता है इसी तरह प्यालोंका आशीर्वाद भी है।
कबीर साहिबने अपने समयमें यह आवाज उठाई थी कि सबका परमात्मा एक है उनके बीजकमें एक शब्द है कि, “दो जगदीश कहाँसे आयें” दो ईश्वर कहाँसे आगये ? वो सबके लिये एक है। कबीर मन्शूरने कितनी ही जगह विस्तारके साथ सिद्ध किया है कि परमात्माको मानने वालोंका परमात्मा एक है उसके यहाँ हिन्दू मुसलमान आदिका भेद भाव नहीं है सभी उसके पुत्र हैं उसकी दृष्टिमें उसकी किसी भी सन्तानको सतानेवाला अच्छा नहीं है।
हिंसा और मछमांसके निषेध— पर चार वेद और बड़े २ सकल ऋषि महर्षि आचार्य और कबीर साहिबका मत उद्भूत किया है कि ये सब इन कर्मोंको कुकर्म तथा नरक देनेवाले मानते हैं ये सर्वतः हेय नारकीय कर्म किसी भी मतमें ग्राह्य नहीं है यहाँ तक कि ४० दिनके