कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 295, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंभूला वे अहमक नादाना । हरदम रामहिं ना जाना ॥ टेक ॥
बरबस आनिके गाय पछारा, गला काटि जिव आप लिया ।
जीता जिव मुर्दा करि डारा, तिसको कहत हलाल किया ॥
जाहि मांसको पाक कहत है, ताकी उत्पत्ति सुन भाई ।
रज बीरज सो मास उपाना, सोई नापाक तुम खाई ॥
अपने दोष कहत नहिं अहमक, कहत हमारे बडेन किया ।
उनकी खूब तुम्हारी गर्दन, जिन तुमको उपदेश दिया ॥
सियाही गयी सुफेदी आयी, दिल सुफेद अजहूं न हुआ ।
रोजा निमाज बांग क्या कीजै, हुजरे भीतर बैठ हुआ ॥
पण्डित वेद पुरान पढें, मुलना पढें जो कुराना ।
कहै कबीर वे नरके गये, जिन हरदम रामहिं ना जान ॥
इतना कहकर कबीर साहब मरी हुई गौके निकट गये—
बहुविधिसे काजीको समझायी । महा पाप जिव घात बतायी ॥
फिर कबीर गऊ ढिग जायी । मरी गाय तिहिं काल जियायी ॥
गऊके पीठपर हाथ फेरतेही वह जीवित होकर उठ बैठी, फिर कबीर साहब उसको लिये हुए गंगा पर गये और गंगाजलसे स्नान कराकर नगरमें स्वतंत्र फिरनेको छोड़ दिया । उस दिनसे वह गऊ कबीर साहबकी गऊके नामसे प्रसिद्ध हो गयी और सब जगह आदर पाने लगी, और कबीर साहबनेभी उस दिनसे नीरूके घरका रहना त्याग दिया । कुछ दिनोंतक तो उनको कबीर साहबका दर्शन नहीं हुआ । किन्तु जब वे कबीर साहबके विरहमें बहुत विकल हो पागलों-के समान दर दर और घाट घाट फिरने लगे तब करुणामय साहबने करुणा करके उन्हें दर्शन दिया, किन्तु उनके घर नहीं गये । बल्कि काशीके बाहर एक स्थानमें कुछ भक्तोंने कुटी बांध दी, उसीमें रहने लगे । उसी स्थानको अब कबीरचौरा कहते हैं । जहाँ बड़ा भारी मुहल्ला बसा है, और कबीर पन्थियोंका बड़ा भारी स्थान है । कबीर साहबके वहाँ रहनेपर नीमा और नीरूभी वहाँ आकर रहने लगे । उन्होंने अपना पहला घर छोड़ दिया ।
इसी प्रकारसे कबीर साहबकी बाललीला अनेक आश्चर्य और उपदेश भरी हुई है, इस छोटेसे ग्रंथमें इससे अधिक लिखनेका अवकाश नहीं है । जिनको विस्तारपूर्वक हाल जाननेकी इच्छा होवे हमारे बनाये हुए कबीर दर्शन नामक ग्रन्थका प्रथम दर्शन देखें ।