कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
पृष्ठ 32, कुल 1367 में से
संदर्भ में पढ़ेंहै एवम् बाजीगरके विवरणमें लिखा है कि, मैं मेरे जन्म स्थान आजमगढ़में था वह मेरे विद्यो-पार्जनका समय था। जौनपुर और आजमगढ़ ये दो अवधके भिन्न २ जिले हैं जौनपुरसे १२ तथा अपनेसे पाँच कोश कहनेसे इनका जन्म स्थान इन दोनोंके बीच ताखा ग्रामसे पाँचकोशकी दूरीपर सिद्ध होता है। अवधवाला अवधको भी अपनी जन्म भूमि कह सकता है। इनकी शिक्षा आजमगढ़में हुई थी। सहपाठीके तहसीलदार होनेसे इनकी भी अंग्रेजीकी उच्च कोटिकी शिक्षा प्रतीत होती है। मोरके प्रकरणको देखकर इनकी एकात्म प्रियता तथा अनेक जगहोंके हाल लिखनेसे विदित होता है कि, इन्होंने खूब पर्यटन किया था तथा सेवके गायब होनेकी बातसे पता चलता है कि, धोखेसे उन्हें कबीर साहिबने दर्शन और फल भी दिया था। फीरोजपुरमें साधु होनेके पीछे आ विराजे इतनी बातका उनके ग्रन्थसे पता चल जाता है।
इनके दिलमें पन्थका सन्धा प्रेम था यही कारण है कि, इनका संग्रह संप्रदायके समर्थनसे सब तरह पुष्ट था। इन्होंने किसी भी धर्माचारोकी स्वतः विवेचना नहीं की है किन्तु दोनों तरहकी आलोचनाओंका संग्रहकर दिया है। इन्होंने सब धर्मोंके तत्त्वोंमें शरणागतिकोही मुख्य बताया है तथा अखिल धर्मोंके व्यक्तियोंको इसीको अपना लेनेका उपदेश दिया है। यद्यपि इन्हें खण्डनकी ओर विशेष प्रेम नहीं था पर विचार स्वातंत्र्यमें इन्हें किसी बातके कहनेमें कोई भयभी प्रतीत नहीं हुआ है, यदि सिद्धान्तकी दृष्टिसे देखा जाय तो।
खण्डन—भी उसी तरह प्रयोजनीय है जैसे कि, मण्डन है। सत् सिद्धान्तका प्रतिपादन बिना असत्यके खण्डन किये नहीं हो सकता। इसकी दो युक्तियाँ हैं। एक तो यह है कि, सबके ऐसे सत् सिद्धान्तोंको संमेलन पूर्वक सबके सामने रखना जिससे उसके प्रतिहन्दी असत् सिद्धान्त आपही खण्डित हो जायें। दूसरी रीति स्वयम् मुखसे कह कर करनेकी है जैसा की, आज कलके व्यक्ति प्रयोगमें लाते हैं। इस ग्रन्थमें दोनोंही शैलियोंका प्रयोग किया है। पूर्वीय और पश्चिमीय माने हुए सिद्धान्तोंको उन्हींके धर्म ग्रन्थों से खण्डित किया गया है तथा सत् सिद्धान्तोंके कबीर साहिबके वचनोंके साथ सबके सामने रखा है।
इस कार्यमें कहीं २ ग्रन्थ लेखकने जहाँ दूसरेके किये खण्डन जैसेके जैसे उद्भूत किये हैं वे उस लेखकोंके विमर्शीविमर्शोंको लेकरही आये हैं अतः उनके अविमर्शके कार्यों इस ग्रन्थमें भी वैसेही रह गये थे जो कि इसकी सार्वजनीकतामें कुछ दूसराही रूप करते थे। अनुवादकी दृष्टिमें जहाँ ऐसी बातें आई हैं उनसे ग्रन्थको जितना भी हो सका है निर्मुक्त करनेकी चेष्टा की है तथा विषम विषयोंपर टिप्पणी देकर जितनाभी हो सका है इसे सरल बनानेका भी प्रयत्न है।
प्रमाण तो—इस ग्रन्थमें प्रायः सभी सम्प्रदायोंके धर्म ग्रन्थोंके आये हैं जिनके कि नाम हम यहीं दिखाते हैं—चारों वेद छःओं दर्शन, मुण्डकोपनिषद्, माण्डूक, भारत, गीता, मनुआदिक स्मृतियाँ, श्रीमद्भागवत, देवी भागवत, कालिका पुराण, वसिष्ठ पुराण, शिवतंत्र और योग साधनाके ग्रन्थ इत्यादिकोंके तो हिन्दू धर्मशास्त्रोंके प्रमाण आये हैं। ईसाकी इजील, मूसाकी तोरैत, दाऊदकी जबूर तथा मुहम्मद साबहकी कुरानके भी अनेकों प्रमाण आये हैं इसके सिवा नबियोंकी पुस्तक तथा और भी कई इस्लामकी पुस्तकोंका उद्धरण दिया है। इसके सिवा सेखशादी आदि और भी अनेकों महत्त्वपूर्णोंके वचन उद्भूत किये हैं।
कबीर पन्थके ग्रन्थ—बीजक कबीर कसोटी, अनुराग सागर, अम्बुसागर, ज्ञान सागर, कमाल बोध, कबीर चरित्र बोध, श्वास गुंजार, कबीरवानी, कर्मबोध, जैनधर्म बोध, जीवधर्मबोध, अमर-सिंह बोध, वीरसिंहबोध, जगजीवन बोध, गरुडबोध, -हनुमान बोध, मुहम्मद बोध, सुलतानबोध