कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
है एवम् बाजीगरके विवरणमें लिखा है कि, मैं मेरे जन्म स्थान आजमगढ़में था वह मेरे विद्यो-पार्जनका समय था। जौनपुर और आजमगढ़ ये दो अवधके भिन्न २ जिले हैं जौनपुरसे १२ तथा अपनेसे पाँच कोश कहनेसे इनका जन्म स्थान इन दोनोंके बीच ताखा ग्रामसे पाँचकोशकी दूरीपर सिद्ध होता है। अवधवाला अवधको भी अपनी जन्म भूमि कह सकता है। इनकी शिक्षा आजमगढ़में हुई थी। सहपाठीके तहसीलदार होनेसे इनकी भी अंग्रेजीकी उच्च कोटिकी शिक्षा प्रतीत होती है। मोरके प्रकरणको देखकर इनकी एकात्म प्रियता तथा अनेक जगहोंके हाल लिखनेसे विदित होता है कि, इन्होंने खूब पर्यटन किया था तथा सेवके गायब होनेकी बातसे पता चलता है कि, धोखेसे उन्हें कबीर साहिबने दर्शन और फल भी दिया था। फीरोजपुरमें साधु होनेके पीछे आ विराजे इतनी बातका उनके ग्रन्थसे पता चल जाता है।
इनके दिलमें पन्थका सन्धा प्रेम था यही कारण है कि, इनका संग्रह संप्रदायके समर्थनसे सब तरह पुष्ट था। इन्होंने किसी भी धर्माचारोकी स्वतः विवेचना नहीं की है किन्तु दोनों तरहकी आलोचनाओंका संग्रहकर दिया है। इन्होंने सब धर्मोंके तत्त्वोंमें शरणागतिकोही मुख्य बताया है तथा अखिल धर्मोंके व्यक्तियोंको इसीको अपना लेनेका उपदेश दिया है। यद्यपि इन्हें खण्डनकी ओर विशेष प्रेम नहीं था पर विचार स्वातंत्र्यमें इन्हें किसी बातके कहनेमें कोई भयभी प्रतीत नहीं हुआ है, यदि सिद्धान्तकी दृष्टिसे देखा जाय तो।
खण्डन—भी उसी तरह प्रयोजनीय है जैसे कि, मण्डन है। सत् सिद्धान्तका प्रतिपादन बिना असत्यके खण्डन किये नहीं हो सकता। इसकी दो युक्तियाँ हैं। एक तो यह है कि, सबके ऐसे सत् सिद्धान्तोंको संमेलन पूर्वक सबके सामने रखना जिससे उसके प्रतिहन्दी असत् सिद्धान्त आपही खण्डित हो जायें। दूसरी रीति स्वयम् मुखसे कह कर करनेकी है जैसा की, आज कलके व्यक्ति प्रयोगमें लाते हैं। इस ग्रन्थमें दोनोंही शैलियोंका प्रयोग किया है। पूर्वीय और पश्चिमीय माने हुए सिद्धान्तोंको उन्हींके धर्म ग्रन्थों से खण्डित किया गया है तथा सत् सिद्धान्तोंके कबीर साहिबके वचनोंके साथ सबके सामने रखा है।
इस कार्यमें कहीं २ ग्रन्थ लेखकने जहाँ दूसरेके किये खण्डन जैसेके जैसे उद्भूत किये हैं वे उस लेखकोंके विमर्शीविमर्शोंको लेकरही आये हैं अतः उनके अविमर्शके कार्यों इस ग्रन्थमें भी वैसेही रह गये थे जो कि इसकी सार्वजनीकतामें कुछ दूसराही रूप करते थे। अनुवादकी दृष्टिमें जहाँ ऐसी बातें आई हैं उनसे ग्रन्थको जितना भी हो सका है निर्मुक्त करनेकी चेष्टा की है तथा विषम विषयोंपर टिप्पणी देकर जितनाभी हो सका है इसे सरल बनानेका भी प्रयत्न है।
प्रमाण तो—इस ग्रन्थमें प्रायः सभी सम्प्रदायोंके धर्म ग्रन्थोंके आये हैं जिनके कि नाम हम यहीं दिखाते हैं—चारों वेद छःओं दर्शन, मुण्डकोपनिषद्, माण्डूक, भारत, गीता, मनुआदिक स्मृतियाँ, श्रीमद्भागवत, देवी भागवत, कालिका पुराण, वसिष्ठ पुराण, शिवतंत्र और योग साधनाके ग्रन्थ इत्यादिकोंके तो हिन्दू धर्मशास्त्रोंके प्रमाण आये हैं। ईसाकी इजील, मूसाकी तोरैत, दाऊदकी जबूर तथा मुहम्मद साबहकी कुरानके भी अनेकों प्रमाण आये हैं इसके सिवा नबियोंकी पुस्तक तथा और भी कई इस्लामकी पुस्तकोंका उद्धरण दिया है। इसके सिवा सेखशादी आदि और भी अनेकों महत्त्वपूर्णोंके वचन उद्भूत किये हैं।
कबीर पन्थके ग्रन्थ—बीजक कबीर कसोटी, अनुराग सागर, अम्बुसागर, ज्ञान सागर, कमाल बोध, कबीर चरित्र बोध, श्वास गुंजार, कबीरवानी, कर्मबोध, जैनधर्म बोध, जीवधर्मबोध, अमर-सिंह बोध, वीरसिंहबोध, जगजीवन बोध, गरुडबोध, -हनुमान बोध, मुहम्मद बोध, सुलतानबोध
निरंजनबोध, आगम निगम बोध, ज्ञानप्रकाश, सन्तोष बोध, ज्ञानबोध आदि सभी कबीर पन्थके ग्रन्थोंके प्रमाण आये हैं तथा इनके सारासारकी विवेचना भी की गई है। इन्हीं ग्रन्थोंके आधार-पर वीरसिंह बबेले आदि अनन्य शिष्योंके भी जीवन लिखे हैं। तारीख आईनानुमा, इंडियन इम्पायर, नानक साहिबकी जन्म साखी, सारवचन, सैर आलम् फिजा, एवम् और भी कई एक इतिहास और जीवों संबंधी पाश्चात्य विद्वानोंकी पुस्तकोंका संग्रह है। इसके अनुवाद तथा संशोधन एवम् परिष्कारके समय और भी बहुतसे ग्रन्थोंकी अवश्यकता पड़ी थी। यह ग्रन्थ पौने दो साल पहले छपना शुरू हुआ था। कितनेही दिनोंतक अनवरत परिश्रम करनेपर प्रकाशित हुआ है। इसका सारा श्रेय विश्व विख्यात श्रीवेंकटेश्वर प्रेसके सत्त्वाधिकारी एवम् खेमराज श्रीकृष्णदास नामके प्रसिद्ध फर्मके मालिक सनातन धर्म भूषण राय साहेब श्रीरंगनाथजी श्रीनिवासजी को ही है जिनकी प्रेरणासे इसका प्रकाशन हुआ। यही क्यों? आपने बहुतसा धन व्यय करके कबीर पन्थके बड़े २ ग्रन्थोंका संग्रह कर संशुद्ध कराकर प्रकाशित किया है।
इस ग्रन्थमें जिन कबीर पन्थी ग्रन्थोंका प्रमाण दिया गया है वे सब श्रीवेंकटेश्वर प्रेसमें प्रकाशित हैं। उनके सिवा और भी अनेकों ग्रंथ इस प्रेससे प्रकाशित हैं। यदि थोड़े शब्दोंमें कहें तो यह कह सकते कि, सनातन धर्मके ग्रन्थोंकी तरह कबीर पन्थके सांप्रदायिक सभी ग्रन्थोंके सौभाग्य प्राप्त करनेका श्रेय भी कबीर साहिबने आपको ही सौंपा है। इस पन्थका कोई भी ऐसा प्राचीन प्रतिष्ठित ग्रन्थ नहीं है जिसको कि खोज करके आपने प्रकाशित न किया हो। प्रायः सभी आपकी प्रेरणासे श्रीवेंकटेश्वर प्रेससे प्रकाशित हुए हैं। इस ग्रन्थ पर कबीर पन्थका अविचल अनुराग देखकर आपने “कबीराश्रमाचार्य परमार्थी वैद्य भारत पथिक स्वामी श्री युगलानन्द विहारीजी” से परिष्कृत हिन्दी अनुवाद कराकर प्रकाशित करना चाह्ता पर स्वामी पन्थकी अन्य सेवाओंमें व्यग्र रहनेके कारण दोसी बहत्तर पूछ तकही संपादन कर सके। इसके बाद मुझे प्रेरणा हुई। यह उक्त श्रीमानोंकी प्रेरणाकाही फल है जो इस ग्रन्थको इस रूपमें जनताके सामने रख रहा हूँ।
जब मैं सन्त महात्मा सत्य पुरुष पुरुषोत्तमके सच्चे प्यारे महाभागवतोंकी दिव्य तात्पर्य-मयी भव्यवाणियोंकी ओर ध्यान देता हूँ तो अपने अन्दर उनके जाननेकी कोई भी विशेषता नहीं पाता। यह उन्हींका दिया उत्साह एवम् उन्हींसे प्राप्त हुई धारणाका फल है जो उनके वचनोंपर विशेष विचार करता हुआ उनकेही अनुसार यह कर सका हूँ इसमें मेरी स्वयम् अपने आपकी कोई भी विशेषता नहीं है।
मानव जन्म गलतियोंके कारण है मनुष्यका हृदय गलतियोंसे भरा पड़ा है। जीवके सब साधन दोषसे ग्रसे हुए हैं। फिर इसके कामही निर्दोष हों यह आशा कभी नहीं की जा सकती पर एक निःपक्षपातिनी शुद्ध सनातनी, कबीर साहिब पर हुई श्रद्धाकी कृति समझ दोषोंको क्षमा करते हुए इसके सार पदार्थका ग्रहण करेंगे यही कबीर पन्थी भारतके सभी सांप्रदायी लोगोंसे सतत अभिलाषा करता हूँ।
आपका विनीत;
सर्वतन्त्र स्वतंत्र रिचर्स स्कालर,
पं. माधवाचार्य.
कबीरमन्शूर - विषयानुक्रमणिका
<!-- image: ★ --> <table border="1" style="width: 100%; border-collapse: collapse;"> <thead> <tr> <th style="text-align: center;">विषय.</th> <th style="text-align: center;">पृष्ठ.</th> <th style="text-align: center;">विषय.</th> <th style="text-align: center;">पृष्ठ.</th> </tr> </thead> <tbody> <tr> <td>प्रारंभिक उपोद्घात</td> <td style="text-align: center;">३१</td> <td>चार गुरुओंका वर्णन, स्वसंवेदका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">६०</td> </tr> <tr> <td>ग्रन्थकर्ताकी विज्ञप्ति</td> <td style="text-align: center;">३२</td> <td>वेद रक्षक, वेद व्यास</td> <td style="text-align: center;">६१</td> </tr> <tr> <td>स्वामी परमानन्दजीकी रचना</td> <td style="text-align: center;">३२</td> <td>कबीर साहबकी चार वाणी और चारों</td> <td></td> </tr> <tr> <td>कबीर मानु प्रकाशकी रचनाका समय</td> <td style="text-align: center;">३२</td> <td>वेदोंका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">६२</td> </tr> <tr> <td>कबीर मन्शूर (छोटा)</td> <td style="text-align: center;">३३</td> <td>चार ज्ञान, वेदके विषयमें, कुण्डलिनी</td> <td style="text-align: center;">६२</td> </tr> <tr> <td>तालीम कबीर कलियुग</td> <td style="text-align: center;">३४</td> <td>वेद तब और अब</td> <td style="text-align: center;">६४</td> </tr> <tr> <td>बड़ा कबीर मन्शूर</td> <td style="text-align: center;">३५</td> <td>वेद मंत्रोंकी शक्तिका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">६६</td> </tr> <tr> <td>तारीख खातमा</td> <td style="text-align: center;">३८</td> <td>वेद मंत्रकी शक्तिपर दृष्टान्त</td> <td style="text-align: center;">६६</td> </tr> <tr> <td>मंगलाचरण</td> <td style="text-align: center;">४१</td> <td>वेदकी श्रेष्ठतामें दूसरा दृष्टान्त</td> <td style="text-align: center;">६७</td> </tr> <tr> <td>प्रथमावृत्तिका मंगलाचरण</td> <td style="text-align: center;">४५</td> <td>स्वसंवेदकी शुद्धता</td> <td style="text-align: center;">६८</td> </tr> <tr> <td>१ अध्याय, सृष्टि रचना</td> <td style="text-align: center;">४६</td> <td>संसारके सब धर्मोंका मूल वेद</td> <td style="text-align: center;">"</td> </tr> <tr> <td>सत्यपुरुषका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">"</td> <td>अनुवादकका भ्रमविमोचनी विवेचन</td> <td style="text-align: center;">६९</td> </tr> <tr> <td>सत्यपुरुषके प्रतिनिधि</td> <td style="text-align: center;">४७</td> <td>श्रीमद्भगवद्गीता अ. ३ श्लो. ४५ विवेचन</td> <td style="text-align: center;">७२</td> </tr> <tr> <td>स्वसंवेदके प्राकट्यका वृत्तान्त</td> <td style="text-align: center;">४८</td> <td>दूसरी व्याख्या</td> <td style="text-align: center;">७६</td> </tr> <tr> <td>ब्रह्मसृष्टिका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">४९</td> <td>लोकमान्य तिलक</td> <td style="text-align: center;">७६</td> </tr> <tr> <td>कालपुरुषके प्राकट्यका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">४९</td> <td>वेदके प्राकट्यपर मतभेद</td> <td style="text-align: center;">७८</td> </tr> <tr> <td>कालपुरुषके तप करके तीनों लोकोंके</td> <td></td> <td>ब्रह्मासे ऋषिमुनियोंकी श्रेष्ठता</td> <td style="text-align: center;">८०</td> </tr> <tr> <td>राज्य पानेका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">५१</td> <td>वेद और किताबोंके मूलका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">८१</td> </tr> <tr> <td>निरंजनका कूर्मके पास जाकर तीनों लोकोंकी</td> <td></td> <td>वेदोंकी आज्ञा माननीय है</td> <td style="text-align: center;">८२</td> </tr> <tr> <td>रचना सामग्रीके मांगनेका विवरण</td> <td style="text-align: center;">५२</td> <td>समुद्र मंथन वृत्तान्त</td> <td style="text-align: center;">८२</td> </tr> <tr> <td>कूर्मजीका सत्पुरुषके पास फरिहाद करना</td> <td></td> <td>ब्रह्माका वेद पाठ और पिताकी जिज्ञासा</td> <td style="text-align: center;">८३</td> </tr> <tr> <td>और निरंजनको दण्ड मिलना</td> <td style="text-align: center;">५३</td> <td>गायत्रीका प्रकट होना</td> <td style="text-align: center;">८४</td> </tr> <tr> <td>निरंजनका पुनः तपस्याकर बीज खेत मांगना</td> <td style="text-align: center;">५४</td> <td>पुष्पावतीकी उत्पत्ति और ब्रह्माकी वापसी</td> <td style="text-align: center;">८४</td> </tr> <tr> <td>बीज खेत अर्थात् आदि भवानीका</td> <td></td> <td>ब्रह्मा गायत्री और पुष्पावतीकी कथा</td> <td style="text-align: center;">८५</td> </tr> <tr> <td>उत्पत्तिका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">"</td> <td>निरंजनका आद्याको शाप देना</td> <td style="text-align: center;">८७</td> </tr> <tr> <td>आद्यानिरंजनका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">५५</td> <td>विष्णुका पिताके दर्शन राज्य पाना आदि</td> <td style="text-align: center;">"</td> </tr> <tr> <td>तीनों देवोंके प्राकट्यका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">५६</td> <td>विष्णुको पिताका दर्शन होना</td> <td style="text-align: center;">८८</td> </tr> <tr> <td>चारों वेदोंके प्रागट्यका वर्णन</td> <td style="text-align: center;">५७</td> <td>शिवका शाप और वर पाना</td> <td style="text-align: center;">८९</td> </tr> <tr> <td>वेदकी उत्पत्ति प्रथम अक्षर पुरुषसे</td> <td style="text-align: center;">५७</td> <td>कर्मका बदला</td> <td style="text-align: center;">९०</td> </tr> <tr> <td>वेदके प्रचारक ब्रह्मा</td> <td style="text-align: center;">५८</td> <td>विष्णुका ब्रह्माको आश्रय देना</td> <td style="text-align: center;">"</td> </tr> <tr> <td>अथर्वण वेद मंडूक उपनिषदकी कथा</td> <td style="text-align: center;">५८</td> <td>माया सृष्टिकी उत्पत्तिका वृत्तान्त</td> <td style="text-align: center;">९१</td> </tr> <tr> <td>वेदके साथ क्रोड मंत्र, वेदोंका सार</td> <td style="text-align: center;">५९</td> <td>माया सृष्टिका विवरण</td> <td style="text-align: center;">"</td> </tr> </tbody> </table>इति कबीर मन्शूर विषयानुक्रमणिका समाप्त ।