भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 344

कबीर साहबके पास भेजकर कहा कि, मैं तब विश्वास करूँगा जब आप उन समस्त पुस्तकोंको ढाई दिवसमें लिख देंगे। वे पुस्तकें कबीर साहबके पास पहुँचें। उन्होंने अपनी लाठी उनपर घुमाई। वे उसी समय लिखी गई। बाद-शाहको यह लीला देख विश्वास होगया। कबीरसाहबने उस ग्रंथोंको दिल्लीमें गडवा दिया। सुनते हैं कि, जब मुक्तामणि महाशयका समय आवेगा, उनका झंडा दिल्ली नगरीमें गडेगा। तब वे समस्त पुस्तकें पृथ्वीसे बहिर्गत होंगी। मुक्तामणि साहबका अवतार वंशकी तेरहवीं पीढ़ीमें होगा। तब वंशगुरुगद्दी दिल्लीाम स्थिर होगी।

त्रेतायुगमें कबीर साहबने हनुमान्जीको सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश दिया। मुक्तिमार्ग दिखाकर कहा कि, ऐ हनुमान्जी ! तू मुझको पञ्चतत्त्व तथा तीन गुणोंमें पृथक् मान मैं स्वयम् जगत् रचयिता हूँ। हनुमानने कहा कि, मुझको किस प्रकार विश्वास हो ? जबलों मैं अपनी आखोंसे न देखलूँ। कबीर साहबने हनुमानको देखनेका बल दिया। अपना वह तेज दिखलाया। जो पाँच तत्त्वों तथा तीनों गुणोंसे पार था। हनुमान्ने कहा कि, मैं आपका वह स्वरूप देखूँ तब विश्वास करूँ। उस समय कबीर साहब अपना महाप्रताप दिखा अन्तर्धान हो गए। हनुमान्जी अनेक प्रार्थनाएँ करने लगे कि, मुझको पुनः दर्शन हो। बहुत स्तुति करनेपर पुनः प्रगट हुए। हनुमान्बोध ग्रंथमें लिखा है यह कबीर सागरके पाँचवें भागमें पूर्ण प्रकाशित है। हनुमान उस स्वरूपको देखकर सत्यगुरुके चरणोंपर गिरा। उनका विश्वास उसके मनमें जम गया। सत्यगुरुने हनुमान्को अपना पान दिया।

सर्वानन्द एक धुरीण विद्वान् ब्राह्मण था। वह भारतवर्षके समस्त प्रांतोंमें जाकर पण्डितोंके साथ शास्त्रार्थ करके विजयी हुआ। जब कोई भी पण्डित उसके सामने न ठहरा तब वह अपने घर आ मातासे कहने लगा कि, मातः ! अब तुम मेरा नाम सर्वजित् रखो क्योंकि, अब मेरा सामना करनेको क्लोई पण्डित नहीं रहा। तब माताने कहा कि, ए पुत्र तूने काशीमें जाकर कबीर साहबके साथ भी वाद विवाद किया था ? उसने कहा कि, नहीं। तब मताने कहा कि, जबतक तू कबीर साहबपर विजयी न होगा तब तक तेरा नाम सर्वजित् नहीं रखूँगी। तब सर्वानन्दने कहा कि, कबीर कैसा बड़ा पण्डित है ? मैं अब चलकर उसके साथ वाद विवाद करता हूँ। बहुतसे ग्रंथ और वेद इत्यादि लादकर काशीमें कबीर साहबके पास पहुँचे। कबीर साहबने कितनी लीलाएँ दिखलाई उन सब बातोंका विवरण करनेसे पुस्तकके सुविस्तीर्ण होजानेका भय है। इस कारण, उनको छोड जाता हूँ किन्तु उसे विश्वास न हुआ।