कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)
Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)
कबीर साहेब द्वारा
स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)
कबीररोपदेश कबीर साहिब और रामानन्द स्वामीका वृत्तान्त
कबीर साहबके पास भेजकर कहा कि, मैं तब विश्वास करूँगा जब आप उन समस्त पुस्तकोंको ढाई दिवसमें लिख देंगे। वे पुस्तकें कबीर साहबके पास पहुँचें। उन्होंने अपनी लाठी उनपर घुमाई। वे उसी समय लिखी गई। बाद-शाहको यह लीला देख विश्वास होगया। कबीरसाहबने उस ग्रंथोंको दिल्लीमें गडवा दिया। सुनते हैं कि, जब मुक्तामणि महाशयका समय आवेगा, उनका झंडा दिल्ली नगरीमें गडेगा। तब वे समस्त पुस्तकें पृथ्वीसे बहिर्गत होंगी। मुक्तामणि साहबका अवतार वंशकी तेरहवीं पीढ़ीमें होगा। तब वंशगुरुगद्दी दिल्लीाम स्थिर होगी।
त्रेतायुगमें कबीर साहबने हनुमान्जीको सत्यपुरुषकी भक्तिका उपदेश दिया। मुक्तिमार्ग दिखाकर कहा कि, ऐ हनुमान्जी ! तू मुझको पञ्चतत्त्व तथा तीन गुणोंमें पृथक् मान मैं स्वयम् जगत् रचयिता हूँ। हनुमानने कहा कि, मुझको किस प्रकार विश्वास हो ? जबलों मैं अपनी आखोंसे न देखलूँ। कबीर साहबने हनुमानको देखनेका बल दिया। अपना वह तेज दिखलाया। जो पाँच तत्त्वों तथा तीनों गुणोंसे पार था। हनुमान्ने कहा कि, मैं आपका वह स्वरूप देखूँ तब विश्वास करूँ। उस समय कबीर साहब अपना महाप्रताप दिखा अन्तर्धान हो गए। हनुमान्जी अनेक प्रार्थनाएँ करने लगे कि, मुझको पुनः दर्शन हो। बहुत स्तुति करनेपर पुनः प्रगट हुए। हनुमान्बोध ग्रंथमें लिखा है यह कबीर सागरके पाँचवें भागमें पूर्ण प्रकाशित है। हनुमान उस स्वरूपको देखकर सत्यगुरुके चरणोंपर गिरा। उनका विश्वास उसके मनमें जम गया। सत्यगुरुने हनुमान्को अपना पान दिया।
सर्वानन्द एक धुरीण विद्वान् ब्राह्मण था। वह भारतवर्षके समस्त प्रांतोंमें जाकर पण्डितोंके साथ शास्त्रार्थ करके विजयी हुआ। जब कोई भी पण्डित उसके सामने न ठहरा तब वह अपने घर आ मातासे कहने लगा कि, मातः ! अब तुम मेरा नाम सर्वजित् रखो क्योंकि, अब मेरा सामना करनेको क्लोई पण्डित नहीं रहा। तब माताने कहा कि, ए पुत्र तूने काशीमें जाकर कबीर साहबके साथ भी वाद विवाद किया था ? उसने कहा कि, नहीं। तब मताने कहा कि, जबतक तू कबीर साहबपर विजयी न होगा तब तक तेरा नाम सर्वजित् नहीं रखूँगी। तब सर्वानन्दने कहा कि, कबीर कैसा बड़ा पण्डित है ? मैं अब चलकर उसके साथ वाद विवाद करता हूँ। बहुतसे ग्रंथ और वेद इत्यादि लादकर काशीमें कबीर साहबके पास पहुँचे। कबीर साहबने कितनी लीलाएँ दिखलाई उन सब बातोंका विवरण करनेसे पुस्तकके सुविस्तीर्ण होजानेका भय है। इस कारण, उनको छोड जाता हूँ किन्तु उसे विश्वास न हुआ।
स्वामी रामानन्दका कबीर साहिबको शिष्य स्वीकार करना
अन्तमें सर्वानन्द कबीर साहबके साथ सामना करनेको उद्यत हुए। बड़ा वाद विवाद हुवा। सर्वानन्दने श्लोकोंकी झड़ी लगादी। यद्यपि कबीर साहब समझाते पर वह न मानते। बात बतापर श्लोकोंका प्रमाण तथा पुस्तकोंकी साक्षी देते। कबीर साहबने देखा कि, इसके पीछे तो घमंडका भयानक रोग लगा है। यह कदापि न हटेगा। न कहना मानेगा। तब कबीर साहबने कहा कि, ए सर्वानन्द ! अब तुम्हारी क्या कामना है किस बातके इच्छुक हो ? सर्वानन्दने कहा कि, मेरी विजय लिखदे। कबीर साहबने कहा कि, मैं तो लिखना नहीं जानता तुम स्वयम् लिख लो। सर्वानन्दने लिख लिया कि, कबीर साहब हार गए। सर्वानन्द जीत गए। भली भाँति लिखकर यथा वह विजयपत्र कबीर साहब तथा अन्यान्य लोगोंको दिखलाकर अपने घरको चले। आनेपर अपनी मातासे कहा कि, माता मैं कबीर साहबसे वाद विवाद करके उनपर विजय पागया हूँ। तब माताने कहा कि, ए पुत्र ! मुझको तो विश्वास नहीं होता कि तू कबीर साहबपर विजयी हुवा है। सर्वानन्दने कहा कि, मैं विजयपत्र लिखवा लाया हूँ तू देखले। माताने कहा कि कागज निकालो। जब कागज निकाला और पढ़ा तो उसमें लिखा था कि, सर्वानन्द परास्त हो गए कबीर साहब विजयी हुए। यह लिखा देखकर आश्चर्यान्वित हुए कि, यह तो मेराही लिखा था यह कैसा उलटा हुआ। कदाचित् मैं लिखने में भूल गया। मातासे कहा कि, मातः ! मैं लिखनेके समय भूल गया। अब पुनः जाता हूँ अत्यंत सावधानी पूर्वक ले आऊँगा। सर्वानन्द कबीर साहबके पास आए और कहा कि, मैं लिखनेमें भूल गया अबकी बार सँभालकर लिखूँगा। कबीर साहबने कहा कि, भली प्रकार सँभालकर लिखो। सर्वानन्दने उसी विषयको भली प्रकार सँभालकर लिखा। अपनी माताके समीप आकर प्रगट किया कि, अब मैं सँभाल कर लिख लाया हूँ। कागज खोला तो वही पूर्वकी बात लिखी पाई कि, कबीर साहब विजयी हुए तथा सर्वानन्द हार गये। इस प्रकार तीन बार हुए। तब सर्वानन्दको निश्चय होगया, कि, निस्संदेह कबीर साहब ईश्वर हैं। चरणों पर आन पड़े और शिष्य हो गए। कबीर साहब तथा सर्वानन्दका विवरण भिन्न भिन्न स्थानोंमें लिखा है।
एक स्थानपर नवनाथचौरासी सिद्ध कबीर साहब तथा नानक साहब सब इकट्ठे थे। उस समय एक महाजन जो नानक साहब का परिचयी या सेवक था, जा पहुँचा। उसने विचारा कि, सन्त गुरुके समीप बिना कुछ लिए जाना उचित नहीं। कुछ भेंटके निमित्त ले चलना ठीक है। उसने अपनी जेबमें हाथ मारा पर कुछ न निकला। बहुत खोजने पर उसके वस्त्रोंमें एक तिल मिला !
कबीर साहिब और स्वामी रामानन्द- जीकी गोष्ठी
उसने उसी तिलको नानक शाहके समक्ष रक्खा । नानक शाहने कबीरसाहबसे कहा कि, मैं इस तिलको इतने साधुओंमें किस प्रकार बाँटूँ ? कबीर साहबने कहा कि, इस तिलको जलमें घोटकर सकल साधुओं में बाँटों, नानक शाहने कहा कि, यहाँ जलभी नहीं है । किसे घोटें ? यह बल तो आपहीमें है, इसको बाँटिये । उस स्थानपर एक शुष्क नदी थी, उसको कबीर साहबने जारी किया । उसमेंसे जल भरकर उस तिलको घोटा, सब साधुओंको पिलाया । जिससे उन्हें अत्यंत आनंद आया । कबीरजीसे कहा कि, कबीरजी ! माँगो जो माँगोगे वही हमलोग आपको देंगे । कबीर साहबने कहा कि, तुम लोग तो दरिद्री जान पड़ते हो । मैं तुमसे क्या माँगूँ तुम मुझको क्या दोगे ? उन लोगोंने कहा कि, जो कुछ तुम माँगोगे वह सब हम तुमको देंगे । कबीर साहबने कहा कि, पाँच पैसेभर दरिद्रता मुझको दो । नवनाथ चौरासी सिद्धोंने परामर्श किया कि, यह गुण तो हम लोगोंमें नहीं । कारण यह कि, हम लोगोंको तो अपनी सिद्धि जप तपका मान है । चलो ब्रह्मासे पाँच पैसेभर दरिद्रता माँगें । ब्रह्मलोकमें जा पाँच पैसेभर दरिद्रता ब्रह्माजीसे माँगो, ब्रह्माजीने विचार कर उत्तर दिया कि, मेरे पास दरिद्रता कहाँ ? मैं तो इस बातपर अहंकार करता हूँ कि, मैं सृष्टिका उत्पन्न करता हूँ । तब नवनाथ और सब सिद्ध कंलासमें शिवजीके पास जा वही प्रश्न किया । शिवजीने भी वही उत्तर दिया कि, मुझमें दरिद्रता नहीं क्योंकि, मुझमें तो यह अहंकार है कि, मैं मिटाता हूँ । सब ओर दूँदते २ थक गये परन्तु दरिद्रता कहीं न मिली । अन्तमें विष्णुके पास गए दरिद्रताके लिये प्रार्थना की । विष्णुने कहा कि, ए सिद्ध साधुओ ! पाँच पैसेभर दरिद्रता या जो कुछ दरिद्रता है वह सब उसीके पास है जिसने तुमको भेजा है । मेरे पास तो केवल तीन पैसे भरही दरिद्रता है, जिसके कि कारण, मैं सारे संसारका रचयिता कहलाता हूँ । दरिद्रताके समूह तो स्वयम् कबीर साहबही हैं दूसरा कोई नहीं । तब सब सिद्ध साधु कबीर साहबके पास लौट आए । आपको दण्डवत् प्रणाम करके प्रदक्षिणा की, सारी बातें प्रगट कीं । कबीर साहबने कहा कि, क्या मैंने तुमसे पहिलेही न कहा था कि, तुम लोग तो दरिद्री हो, मैं तुमसे क्या माँगूँ ।
इससे यह परिणाम निकला कि, अहंकारसे सब फँसे हुए हैं । दरिद्रता तथा नम्रता यह गुण सबसे विशेष हैं । क्योंकि अहंकारके वश यह जीवन अपने स्वरूपसे गिरा इसीसे यह इतना बड़ा सिद्ध शौतान और नारकी हुवा । अहंकारहीके कारण हारूत मारूत जैसे भले देवता बाबिलके कुएँमें बंद किए गए । अहंकारने मनुष्य जातिको सदाके लिये बंधनमें डाल दिया है ।
कबीर साहब नानक साहबके पास पञ्जाब देश आए, नानक शाहने अत्यंत आवभगत तथा सम्मानके साथ उनसे मिलकर कहा कि, जिस सेवाके निमित्त आप आज्ञा दें उसको मैं करूँ । कबीर साहबने आज्ञा दी कि, पाँच दिवसकी उत्पन्न हुई बछियाके स्तनमें दूध दुहकर मेरा कमण्डलु भर दो । नानक शाहने कहा कि, पाँच दिनकी पैदा हुई बछिया कैसे दूध दे सकती है ? कबीर साहबने कहा कि, यही मेरी सेवा है इसे ही तुम करो । नानक शाहने ढूँढ ढाँढ कर पाँच दिनकी उत्पन्न हुई बछियाको ला उपस्थित किया । उसके समीप दूध लेने गये । वह बछिया लात चलाकर भाग गई । नानक शाहसे कबीर साहबने कहा कि, अब तुम जाओ, मेरे नामसे उस बछियासे दूध माँगकर कमण्डलु उसके स्तनके नीचे रख दो, नानक शाहने बछियाके नीचे कमण्डलु रखकर कबीर साहबके नामसे दूध माँगा । बछियाके स्तनसे आपसे आप इतना दूध निकला कि, वह भर गया । कबीर साहबने नानक साहबसे कहा कि, ऐ नानकजी ! आपने बंदना तो बहुत की परन्तु अभीतक आपकी कमाईमें कमी है । आपका पंथ चलेगा बहुत लोग आपकी आज्ञामें चलेंगे । भविष्यत्में ये रङ्ग ढङ्ग होंगे । ऐसा बहुत कुछ नानक शाह से कबीर साहबने कहा । इसी ग्रंथमें नानक शाहके विषयमें भविष्य वाणी है । नानक धर्मका विवरण किया गया है जो कि, भविष्यत्में होनेवाला है । इसी स्थानपर यह साखी है । “तिल घोंटतारे लगे” इत्यादि है और इसी स्थानपर यह है :—
ऐसो दाता सत्य कबीर, सूखी नदी बहावे नीर ।
शूखेको खिलावैं खीर, नङ्गेको पहनावे चीर ॥ इत्यादि ॥
महाराजा श्रीरामचन्द्रजीको कबीर साहब (मुनीन्द्रजी) ने योगयुक्ति सब कुछ सिखलायी । सीताके चुराये जानेके समय अत्यंत कठिनाता उपस्थित हुई समुद्रोल्लंघन करना अत्यंत कठिन था । रामचन्द्रजीपर कबीर साहब की दया हुई । पत्थरोंपर सत्य नाम लिखा । उसके कारण बहुतेरे पर्वत तथा पत्थर तैरने लगे, पुल बन गया । इसी साहबकी दयादृष्टिसे लंकापर विजय पाकर मङ्गल-पूर्वक अपने घर पहुँचे । देखो ग्रंथ ज्ञानसंबोध तथा अन्यान्य ग्रंथोंमें ।
कृष्णचन्द्र बाँसुरी बजाकर गोपियोंका मन चुरा लिया करते थे, कबीर साहबने बाँसुरी बजायी, तीनों लोक मोह गये, जड़ चैतन्य सभी मोहित हुए । यमुना नदीका जल स्थिर होगया । स्थावर जङ्गल सभीको आनन्द आगया वह बाँसुरी ऐसी बजी कि, फिर कभी न बजी होगी । लोगोंने जाना कि, कृष्णचन्द्रने बजायी थी । गोप तथा गोपियोंकी बड़ी कामना थी कि, वैसी बंसी फिर बजे क्योंकि, उस बाँसुरीके बजानेवाले तो सत्य पुरुष थे । अभेद भावनामें होते हैं ।
कबीर साहब, इस बाँसुरीकी प्रशंसा हंस कबीर किया करते हैं जिनको इसका ज्ञान है ।
जब प्रथम कबीर साहबका गोरखनाथसे सामना हुवा, गोरखनाथ कबीर साहबकी श्रेष्ठता तथा कीर्तिते अनभिन्न थे, तब गोरखनाथने कबीर साहबसे कहा कि, आओ हम तुम वाद-विवाद करें। उस समय गोरखनाथने अपना त्रिशूल गाड़कर कहा कि, आओ कबीर साहब ! उस त्रिशूलकी एक शाखापर बैठ जाओ मैं बैठता हूँ पीछे वाद-विवाद करेंगे, कबीर साहबने सूकते एक तारको आकाशकी ओर चलाया । और शून्यमें उस सूकते ऊपर बैठकर कहा कि, नाथजी ! आओ, हम और तुम इस सूतपर बैठकर वाद-विवाद करें क्योंकि, तुम्हारा त्रिशूल तो पृथ्वीसे लगा हुवा है । कबीर साहबकी यह लीला देखकर गोरखनाथजी दङ्ग हो गए ।
गोरखनाथने कबीर साहबसे कहा कि, मैं छिपता हूँ आप मुझे ढूँढ निकालें । गोरखनाथ मेंढक बनकर जलमें छिप गये कबीर साहब उस मेंढकको पकड़ लिये कहने लगे कि, अब किधर जाओगे, तब गोरखनाथ पुनः अपने असली रूपमें आ गए । पीछे कबीर साहबने कहा कि, अब मैं छिपता हूँ तुम ढूँढलो । कबीर साहबने जलमें डुबकी मारी । जल होकर जलके साथ मिल गए । गोरखनाथ ढूँढते २ थके तीनों लोकमें ढूँढते फिरे परन्तु कहीं पता नहीं लगा । पीछे विवश होकर बैठे कबीर साहबने देखा कि, अब तो गोरखनाथ हारके बैठ गए हैं उसी समय कमण्डुल के जलमेंसे कबीर साहब प्रगट होगए ।
गोरखनाथने कबीर साहबके पास दो सर्प भेजे । वे दोनों सोंप कबीर साहबके पास आए । आपने उनको अपने शरीरमें लगा लिया । बहुत विलंब हुवा पर पलटकर नहीं गए तब स्वयम् गोरखनाथजी कबीर साहबके गृह पधार कर पुकारा कि, कबीर साहब ! बाहर आइए । कबीर साहबने भीतरसे उत्तर दिया कि, नाथजी ! मेरे गृह दो अतिथि आए हैं मैं उनके सेवा सत्कारमें लगा हुवा हूँ । गोरखनाथने जाना कि, कबीर साहब कैसे प्रतिष्ठित पुरुष हैं । आपमें कौसी क्षमा तथा संतोष है । प्रथम तो गोरखनाथने कबीर साहबसे बहुत वाद विवाद किया बहुत कौतुक देखे पीछे भलीप्रकार जान लिया कि, आप अद्वितीय हैं मनुष्य मात्रमें दूसरा ऐसा कोई नहीं । कबीर साहबने गोरखनाथको भलीप्रकार संतुष्ट कर दिया बहुत कुछ कहा । सब कौतुक दिखलाए । गोरखनाथको भलीप्रकार निश्चय करा दिया कि, कबीर साहब स्वयम् अलख अविनाशी हैं । तब सत्यगुरुके चरणोंपर गिर शिष्य होकर परमगति पागये । योगयुक्ति आदि सबको व्यर्थ जाना ।
४ अ. कबीरजीका आत्मविकास । सिकन्दर लोधीका काशीमें आना, कबीर साहिबका वहां बुलावा जाना, उनके दर्शन बादशाहकी जलन दूर होना, सुलतानका उनपर विश्वास लाना
कबीर साहबके कमालीके मस्तकपर हाथ रखतेही उसका हृदय प्रकाशित हो गया । उसे आरंभसे अन्ततकका सार समयोंका वृत्तान्त प्रगट हो गया । उसकी जिह्वासे ज्ञानके फौव्वारे छूटने लगे । वो सब वृत्तान्तोंका विवरण करने लगी कन्नसे बाहर आतेही उसका हृदय प्रकाशित हो गया उस समय वह ये शब्द बोली कि —
हंसा निकल गया मैं न लडीसी ।
पाँच सहेली संग है मैली, पाँचोंसे मैं अकेली खडीसी
नौ दरवाजे बंदकरलीने, दशबीं मोरी खुली जो पडीसी ।
न मैं बोली न मैं चाली, औठ दोपट्टः किनारे खडीसी ॥
कहत कमाली कबीरकी बालकी, सादीसे मैं कुमारी भलीसी ॥
जी दुनियाँके फन्देसे निकल गया मैं लडी हुई नहीं हूँ, मनकी पाँच वृत्ति ही मैली सहेलियाँ हैं, इस कारण मैं उनके उद्देगको छोड कर उनसे अकेली खडीसी दीख रही हूँ मेरे शरीरके नौऊ दरवाजे समाधि लगानेके लिये बन्द करलेने पर भी दशम द्वार मेरे लिये खुलासा पडा है जब चाहूँ जब उससे शून्य शिखरमें आसन लगालूँ । उस अवस्थामें मेरे संसारके व्यवहार बन्द हो जाते हैं मैं निर्विकल्प समाधि लगाकर दुनियाँके किनारे खडीसी लगती हूँ ।
इसी प्रकार धर्मदास साहबकी स्त्रीका नाम माई अमीन था । उसके शिर पर कबीर साहबने हाथ रक्खा जिससे उसकी जिह्वासे ज्ञानलोत बहने लगा । एवं वह भी सब वृत्तान्त कहने लगी कि —
साधो नाम सभन से न्यारा लखि पुरन गुप्त विसतारा ।
जानेगा कोई जाननहारा ॥
जब नहिं अंशवंश निर्मायो, नहिं कुछ किया पसारा ।
चर और अचर चार चर नाहीं, नहिं मनको विसतारा ॥
जब नहिं पुरुष नहीं तब ज्ञान, यह मन सबसे न्यारा ।
जब नहिं पाँच अमी निर्माया, नहिं सोहँग विस्तारा ॥
धर ओ अधरधार धर नाहीं, नहीं पुरुषकी काया ।
तब नहिं कूरम नहिं जलरंगी, नहिं तब जलकी छाया ॥
फुप दीपलीला दहजा हैं, नहिं अदली औतारा ।
करमन कहै सुनो धर्मदासा, यह मत सब से न्यारा ॥
जब अंश और वंश नहीं बनाया न कुछ संसारकी रचना ही की थी । स्थावर
जंगम जड़ चेतन कुछ नहीं था, न मानसिक ही कल्पनाएँ थीं। न अक्षर निरंजन या न ज्ञानी ही थे। हमारा यह विचार सबसे निराला है क्योंकि दूसरे उस समय भी कुछ मानते हैं। न देशसे हंगकाही विस्तार था एवं न पांच अमरही बनाये थे। जमीन आसमान और पुरुषका प्रतिबिम्ब जीव भी नहीं था। न कूर्मजी जल-रंगजी और जलकी छायाही थी। फुप दीपलीलाके दहजेमें न कोई अदल करने वाला औतार था। करमन कहती है कि, ए धर्मदास ! यह मत सबसे भिन्न है। इसी प्रकार राजा चन्द्रविजयकी इन्द्रमती, राजा रावणकी मन्दोदरी, राजा वीरसिंहकी माणिकवती, राजा योगधरकी लीलावती पुरंती आदि पचासों स्त्रियाँ राजा अमरसिंहकी रानी, राजा उदयपुरकी रानी। मीराबाई, क्षेमश्रीगवालिन तथा और भी अनगिनत स्त्रियाँ जिनके कि, शिरपर कबीर साहबने हाथ रक्खा व सब हंसस्वरूप होकर परमधामको चली गई। तथा सिधार जायँगी। उन बातोंके लिखनेकी सामर्थ्य मेरी लेखनीमें नहीं है। न किसी मनुष्य तथा देवताओंमें ही लिखने और कहने सुननेकी सामर्थ्य है। कबीर साहबकी लीलाएँ कबीर साहबही जानें या उसके परम भवतगणही जान सकते हैं।
गजल ।
यह लिखना माजिजातका यह भी अबस हुवा ।
और कहना इस सिफ़ातका यह भी अबस हुवा ॥
नाकारः नतिकिः न कहा जाय उससे कुछ ।
फिर कहना पाकज तका यह भी अबस हुवा ॥
दिनमें सके न देख जिसे दूरबीनसे ।
फिर दीद उसका रातको यह भी अबस हुवा ।
जिस बन्दगान कुदरतसे है बन्दः बेखबर ।
क्या लिखना उह बरातका यह भी अवस हुवा ॥
वह खालिके जहाँ है जो चाहे करे सोई ।
फिर जिक्र वारदात का यह भी अवस हुवा ॥
नाम और निशों मकौ है न जिसका कोई कहीं ।
बतलाना उस समातका यह भी अबस हुवा ॥
मौजिब कोई न जान कभी जिसका आजतक ।
जोयन्दः मोजिबातका यह भी अवस हुवा ॥
आजिज न पाया भेद है जो यारिफां जमौ ।
फिर करना उसकी बातका यह भी अवस हुवा ।
शेखतकीका क्रोध
कबीर साहबकी शिक्षा ।
तीन कालके जितने धर्मके अगुवा हैं, हुए तथा होंगे, उन सबसे कबीर साहबकी शिक्षा जुदी है । इस शिक्षाका मुख्य अभिप्राय यही है कि, गर्भका आवागमन बंद हो इसका बड़ा भारी दुःख है । जिस शिक्षा तथा धर्मसे बारम्बार जन्म और मृत्युका दुःख दूर हो उसीको ग्रहण करना वही मनुष्यका धर्म है । उसी गुरु तथा शास्त्रको धारण करना मानुषिक बुद्धिका कर्तव्य है । जो कोई मनुष्य देह पाकर मुक्तिमार्ग न ढूँढ़े वो बड़ा अभाग है । क्योंकि, वह फिर ऐसा समय न पावेगा । सदा ही भवसागरमें डुबकियाँ खावेगा । योगयुक्ति तथा सारे तंत्र मंत्र बंधनके प्रधान कारण हैं । यदि योग समाधिसे योगी अमर हो जाता तो फिर कदापि कोई योगी न मरता । इस समयभी सब नजर आते । असंन्यासी तो ब्रह्मके ध्यानमें रहते हैं उनका भ्रम ब्रह्म है । वे भ्रमरूप होकर आवागमनमें पड़े रहते हैं उनका ब्रह्म भ्रम हो उसीमें फँसे रहते हैं ब्रह्म यम शिव सनकादिक इत्यादि सभी भ्रमकी नदीमें पड़े हुए डुबकियाँ खारहे हैं । इस भ्रमकी कोई सीमा नहीं है ।
सूक्ष्म वेदके बिना पढ़े किसीकी मुक्ति नहीं होती । जो कोई ध्यानपूर्वक पढ़े, एवं उसके सारे विषयोंपर विचार करे, उसकी आज्ञाओंपर भली-भाँति दृढ़ हो, समस्त मिथ्यओंसे पृथक् हो, वही मनुष्य है । वही कालपुरुषके पञ्जेसे छुटकारा पावेगा । कञ्जूस, कामी, व्यभिचारी पुरुषको सूक्ष्मवेदके पढ़नेसे किसी प्रकारका भी लाभ नहीं होता है ।
अपने गुरुको स्वयम् सत्यपुरुष करके जाने । गुरुके मुँहसे सत्यपुरुष स्वयम् खाता पीता है । गुरुके शरीरसे वस्त्रादि पहनता है जिसको गुरुकी बातपर विश्वास न होवे । जिसके मनमें घमंड हो, तथा जिसके मनमें नम्रता न हो वह नरकमें जावेगा । सेवा सब पुण्योंसे बड़ा चढ़ा पुण्य है । गुरुकी सेवाका कर्तव्य सबके ऊपर है । जो गुरुकी पूरी सेवा करेगा, उसका हृदय प्रकाशित होगा । गुरुकीही मूर्तिसे पारख गुरु निकलकर उसकी सारी कामनाओंको पूरी करेगा । कोई अपने गुरुके कर्तव्य पालन न करे, उससे पालन करावे, गुरुकी दी हुई वस्तुओंको भोंगे तो वह चोर और ठग है । एक अवस्थामें गुरुकी सेवा न भोंगी जावेगी जबकि, मनुष्य भली-भाँति डूबा रहे, दिन-रात वंदनामें संलग्न हो जावे, किसी दूसरी ओर ध्यान न हो, अपने शरीरकी चिन्ता भी न हो उस समय गुरु सेवाकी क्षमा होगी । गुरु उसकी वंदनका भागी होगा । जबतक ऐसी अवस्था न हो तब तक गुरुसेवासे अपनेको वो बचायेगी तो उसके मनमें तेज न चमकेगा । इस कारण सारे जीवन गुरुकी सेवा एवं आज्ञामें रहना उचित है । क्योंकि, गुरुके प्रति अपना कर्तव्य
लोगोंका शेखतकीके पास आना शेखतकीका कबीरजीको मरानेका प्रयत्न
कभी किसीसे पूर्णरौतिसे निवह नहीं सकता है। केवल एक नामके बदले तीनों लोकमें कोई वस्तु नहीं है जो दी जावे। गुरुही धर्मकी जड़ है जड़के सींचनेसे डाल पात सब हरे होते हैं। निश्चयके वृक्षमें सब फल फूल लगते हैं।
कंजूसकी कभी मुक्ति नहीं होती। यह बहुत बड़ा शैतान है, जिसके मनमें घुसता है वह जीवित ही मरा जैसा है, यह एक घृणा उत्पादक लत है। इससे स्वयम् परमेश्वरको घृणा होती है, समस्त पीर पैगम्बर सिद्ध साधु इसको बुरा जानत हैं। किसी प्रकारकी वन्दना सेवा मनुष्य करे पर कृपणता एक ऐसी वस्तु है जिससे वह सब विनाश हो जाती हैं। कंजूस सिद्धकी समस्त सिद्धि धूलमें मिल जाती है।
साखी—कामी तो बहुतै तरे, क्रोधी तरे अनन्त।
लोभी जिवडा ना तरे, कहैं कबीर सिधन्त ॥
साधुओंकी सेवा बहुत बड़ी पूजा है, भक्ति मुक्तिकी देनेवाली है। जो कोई साधुओंको भोजन इत्यादि देता तथा आवश्यकताकी वस्तुओंको इकट्ठा कर देता है उसकी सारी कठिनाइयाँ और पाप दूर हो जाते हैं। साधुओंकी कृपासे सारे पदार्थ प्राप्त होते हैं, साधु सारी युक्तियाँ बतलाते तथा सभी शुभ कार्योंको सिखलाते हैं, नरकसे बचाते, खींचकर वैकुण्ठको ले जाते हैं। ज्ञान एवं मुक्तिकी सारी युक्तियाँ समझाते हैं, समस्त भ्रम और धोखेको दूर कर देते हैं, साधु सत्यपदमें लगाते हैं, साधु संसारके सारे पदार्थोंपर आज्ञा करते हैं, साधु समस्त दुःख संतापको हर लेते हैं। साधुके समस्त पातक पृथक् हो जाते हैं। साधु साहब जुदे नहीं। साधु तो अनेक हैं। परन्तु वह साधु, जो समस्त भ्रम तथा धोखेको दूर कर दे, सत्यपदमें लगावे उससे विशेष प्रेम करे। उसीकी वन्दना सेवासे हार्दिक कामना पूर्ण होगी। रोटी कपडा इत्यादि आवश्यकीय वस्तुओंको दे। मान संमान तो समस्त साधुओंका करना चाहिये। वह साधु जो अपने स्वरूपके मिलनेका मार्ग बतलावे, साधु शिरोमणि वही है। साधुओंकी सेवा तथा आज्ञाका पालन सौभाग्यके चिह्न हैं। बड़े बड़भागी हैं जो साधुओंकी संगति करते हैं। साधुओंको भोजन देनेमें बड़ा पुण्य है। जगत्में उसके समान कोई नहीं है। साधुओंको वस्त्र देनेसे समस्त दुःख मिट जाते हैं। जबतक साधुके शरीरपर वस्त्र रहता है, तबतक देनेवालेकी सारी आपत्तियाँ दूर रहती हैं। साधुकी सेवासे समस्त बन्धनोंसे मुक्ति होती है। यदि साधुकी दया न हो तो कोई, मनुष्यताकी गतिको प्राप्त न हो। साधुओंकी दयासे मनुष्यधर्म तथा संसारकी सारी विद्याएं और बुद्धि प्राप्त करता है। बहुतेक साधु ऐसे भी हैं जो सत्यपुरुषकी भक्तिसे भटकाकर कालपुरुषकी भक्तिमें लगा
देते हैं । उनकी शिक्षा और बातोंसे उन्हें पहचान लेना चाहिये । ऐसा न हो कि, उनके धोखेमें आ जावें । ऐसे साधु कालपुरुषके दूत हैं उनसे सावधान रहे । जिस साधुमें अपने गुरुका ज्ञान हो, उस साधुकी शिक्षा मर्यादा तथा सेवा अपने गुरुके समान करे । धोखा धडी देनेवाले साधु, अपनी वार्तालापसे पहचाने जाते हैं ।
सत्य पुरुषकी भक्तिके अतिरिक्त समस्त भक्तियाँ जाल तथा बन्धनमें डालनेवाली हैं । कालपुरुषका विष, ब्रह्मा विष्णु शिव सनकादिकसे लेकर सारे जीवोंमें समाया हुवा है । बिना सत्यगुरुकी दयासे कोई सत्यपदसे लग नहीं सकता, सारे शरीर और नक्षत्रोंमें कालपुरुषका जहर छिपा हुवा है । जिसको सत्यगुरु दया करके अपनी ओर खींचे वह आवे । दूसरेमें क्या सामर्थ्य, जो कि यमके नीचेसे निकल सके । धर्मरायके मन्त्रने समस्त मनुष्योंकी बुद्धिको अन्धी कर रक्खा है । किसीको इस विषयका सोच नहीं कि, मैं जानबूझकर क्यों कुएँमें पडता हूँ । मेरे पुरुषा तो सब इस धोखेमें पडकर मरे, मैं इस अंधकारमय पथपर क्यों चलूँ । इनकी बुद्धि डुबकियों खारही है । इसीसे सत्यको मिथ्या तथा मिथ्याको सत्य मान रही हैं । छुटकारेको बंधन तथा बंधनको छुटकारा समझ रही है, इनकी बुद्धि तथा चित्त ठिकाने नहीं है । इनकी पाशविक बुद्धिमें मनुष्यता लेश मात्रभी नहीं है ।
काम शास्त्र और चार पुस्तकें ये सब कालपुरुषके जाल हैं, उसने इस जाल में फँसाकर सारे मनुष्योंको मार लिया है, उन्हें ऐसा धोखा दिया है कि, जितने नाम सत्य पुरुषके थे वे सब अपने नाम प्रगट किये । सत्यपुरुषके धोखेमें सब मनुष्य कालपुरुषकी वंदना करने लगे, कालपुरुषने सत्यपुरुषका नाम छिपाया, यहांतक कि, यह भेद ब्रह्मा विष्णु और शिवसे भी नहीं कहा, इस धोखेसे सारे मनुष्य इस शिकारीके शिकार हो गए । जो कोई काम शास्त्र तथा चार पुस्तकोंसे पृथक् होगा उसको सूक्ष्म वेदके ज्ञानकी प्राप्ति होगी । जिनका प्रेम पुरुष वेदसे है, वे सूक्ष्म वेदसे कैसे प्रेम कर सकते हैं ?
विष्णुको तीनों लोकोंकी सरदारी तथा अधिकार मिला है । उसीके अधीन सब हैं, निर्गुण निरञ्जन और सगुण विष्णु येही समस्त लोकोंके रचयिता एवं कर्ता धर्ता हैं, विष्णु तीनों लोकोंमें सम्यक् रूपसे उपस्थित रहते हैं । दोनों रूपसे निरञ्जन तीनों लोककी ठकुराई करता है ।
तीनों लोकों और भवसागरका ठेकादार निरञ्जन है । सहस्र असंख्य चौकड़ी युगका उसका ठेका है । इतने समयतक तो बिना पारख गुरुके कोई मुक्ति नहीं पावेगा । जब ठीकाकी सीमा बीत जायगी तब अक्षर पुरुषके राज्यका समय आवेगा । इस राज्यमें समस्त जीवोंके छुटकारेकी आशा होगी ।
प्रथम सूक्ष्मवेद ब्रह्मसृष्टिमें था। जब कालपुरुषने भरमाया, सृष्टिकी रचना की, तब उसमें की सामयिक बातोंको निकालकर पुरुषमवेद बनाया। इस पुरुषम वेद यथामति समस्त सृष्टिको उपदेश दिया। अज्ञानी लोग इस पुरुषमयानी यानी पराकृत वेदको अपने धर्मका पथ और मोक्षकी सीढ़ी समझने लगे। निरञ्जनने अपनी सन्तानको पृथ्वीपर भोजना आरंभ किया। सहस्रों ऋषि मुनि पीर पैगम्बर पृथ्वी पर आए। कालपुरुष निर्गुण तथा सगुणकी भक्ति सिखलाते चले आए। इन ऋषीश्वरोंमें सहस्रोंने अपनी अपनी नई रीति निकाली। वेदकी शिक्षाको कठिन जान दूसरा पथ बताया। बहुभी कालपुरुषके फंदेमें फँसकर मरे। किसीने बिना पारख गुरुके सत्यलोकके पथको नहीं पाया।
जो कोई किसी जीवका रक्तपात करेगा, उसे उसका प्रतिशोध अवश्य देना पड़ेगा। जो कोई किसीको दुःख दे या मांसाहारी हो वह भी निश्चयही दुख पावेगा। अपना मांस उसको खिलावेगा। किसीका प्रतिशोध कोई कदापि नहीं छोड़ेगा।
मांसाहारी और शराबीभी मुक्ति नहीं पासकेंगे। जो पुरुष मुक्तिके इच्छुक हैं, उन्हें अच्छी तरह स्वच्छ तथा पवित्र रहना चाहिए।
गृहस्थके लिये अपनी स्त्रीके, छोड़ दूसरी स्त्रियोंके साथ संभोग करना महापाप है। साधुके निमित्त विवाहिता अथवा बिन विवाही किसीसे भी संभोग न करना चाहिये।
गुरुकी आज्ञाको न माननेके समान मनुष्यके दूसरा कोई महापाप नहीं है।
सत्यगुरुकी शरण सब जीवोंके लिये सुखदायी है। उसीके शरणमें समस्त पातक क्षमा होंगे। इस कलियुगमें गुरुके प्रति पूरा कर्तव्य पालन कौन कर सकता है। परन्तु सत्यपुरुषको अपने शरणकी लज्जा है। उसकी शरण आकर धर्मपर स्थिर रहो। जो धर्मविमुख हुआ वह निर्दयी तथा घातक शैतानके जालमें फँस ही गया। सत्यगुरुके शरणपर पूरा निर्भर रहे और यह समझे कि, सत्यगुरु मेरे अपराधोंको क्षमा करेंगे। मेरी ओर नहीं बरन् अपनी दयाकी ओर दृष्टिपात करेंगे क्योंकि, उसका नाम पतितपावन है।
घमंडी तथा द्वेषीको कदापि सत्यपुरुषकी भक्ति नहीं होती।
जो मनुष्य बड़ाई और उच्चश्रेणी पाकर नम्र होगा, अपना शीश नवा दिया, धन पाकर दान तथा साधुसेवाको ग्रहण किया, उनके निमित्त भक्ति मुक्ति का द्वार खुला हुआ है।
वह मनुष्य जिसने ऐसा ध्यान किया कि, तुच्छ तथा सेवक हूँ। जितनी
मूर्तियों हैं, सब मेरे सत्यगुरुकी हैं । सब जीवोंमें गुरुकी कान्ति जाने तो वो मुक्ति का अधिकारी है ।
मैं अपने कार्योंका अधिकारी नहीं यही नहीं किन्तु, सत्यगुरुसे सहायता माँगता रहे कि, वह मेरी मनकामना पूर्ण करे । भले कार्योंमें सदैव उद्योग करता रहे ।
मैं नहीं जानता कि, मैं क्या हूँ मेरा परमेश्वर क्या है । इस कारण सत्यगुरु पर पूर्णतया निर्भर रहे कि, वह जब मुझको दृष्टिप्रदान करेगा, तब मैं जानूँगा ।
कालपुरुषके जितने धर्म, पृथ्वीपर प्रचलित हैं, सबमें वैष्णव धर्म श्रेष्ठ एवं सबका सरदार है । यह सतोगुणी धर्म है । इस धर्मके नियम तथा आज्ञाएँ सत्यपथकी सीढी है । सत्यपथ परम धामकी सोपान है ।
सत्यगुरु कबीरका नाम बंदीछोर है । वह सर्वाधिकारी है जिसको चाहे मुक्ति प्रदान करे । जिसको इस बातका पूर्णतया विश्वास होगया उसीका बेडा पार होगया समझो ।
सत्यपुरुष और कबीर साहबको जिसने एक जान लिया उसका बंधन टूट गया, वो कालके पञ्जेसे छूट गया । तन मन धन गुरुके अर्पण करना तो भलाईका सार है, परन्तु अपनी कमाईका दशवाँ भाग गुरुका हक है बुद्धिमान् पुरुष मुक्तिका भागी होता है ।
जो कोई मनुष्यताकी श्रेणी प्राप्त करने योग्य हो, उसीमें बुद्धि होती है । निर्बुद्धि सुन्दर मनुष्यभी पशु हैं । उनमें बुद्धि नहीं होती ।
पारख गुरु प्रत्येक स्थानपर उपस्थित है । परन्तु जबतक उसके पथमें अपने को मैं न्योछावर न करूँ तबतक उसका दर्शन न हो सकेगा ।
सब झूठे झूठोंके साथ मिलते हैं । जो कोई सत्य प्रेमी होगा वह झूठेके साथ कभी योग नहीं देगा ।
ये तीनों लोक विषवृक्षके ही फल हैं । प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक खान, तथा प्रत्येक मकानमें विष भरा हुवा है । विना सत्यगुरुकी भक्तिके वह नसोंसे बाहिर नहीं होता ! न किसी अन्य युक्तिसे वो पृथक् हो सकता है ।
जान बूझकर विष खाना मनुष्यता नहीं है । आप सत्य पुरुषकी भक्ति करे और दूसरोंसे करावे और करते हुआओंको देखकर प्रसन्न हो यही वंदना है ।
प्रत्येक मनुष्य विना जाने बूझे अपने २ धर्मकी ओर खींचता हुआ द्वेष करता है । परन्तु मनुष्य वही है जो कि, द्वेष रहित होकर वह धर्म ढूँढ़े, जिससे कि, उसके आवागमनका मार्ग एक बारगीही बंद होजाय ।
शेखतकीके कबीरजीपर जुल्म कबीर साहिबकी शाहसिकन्दरने नम्रता पूर्वक बन्दना की
मनुष्यके चार चक्षु हैं; परन्तु पशु चारों चक्षुओंसे अन्धे हैं। यद्यपि उनकी आंखें प्रत्यक्षमें खुली हुई हैं, तो भी वे अन्धे माने जाते हैं। इस कारण कि, वे देख कर भी घातक मार्गसे नहीं टलते। इस कारण वस्तुतः वे मनुष्यके स्वरूपमें पशु ही हैं।
पशुओंको मानवी शिक्षा अच्छी नहीं लगती। जैसे कि, चोर, डाकू, व्यभिचारी इत्यादि सत्संग तथा सत्यपथसे भागते हैं।
सत्यपुरुषके जो अंकुरी जीव हैं वे सत्यगुरुकी शिक्षा सुनकर ऐसे दौडकर मिलते हैं, जैसे कि लोहेसे चुम्बक चिपट जाता है और जो काल पुरुषके जीव हैं उनपर सत्यपथ की शिक्षाका कुछ प्रभाव नहीं पड़ता हैं।
दान, वीरता, न्याय और धर्म इन चारों गुणोंकी शिक्षा सब लोग करते हैं। परन्तु सत्यगुरुके साथ नहीं करते इस कारण उनकी कामना पूर्ण नहीं होती।
यह कलियुग अत्यन्त कठिन समय है। इसमें मनुष्योंकी रूचि पापकी ओर तो तुरंत ही है। पुण्य से दूर भागती है ऐसी अवस्थामें सत्यगुरुके शरण बिना दूसरा कोई उपाय नहीं है।
हलालके भोजनसे हृदयकी पवित्रता होती है।
जो कोई न्यायी बादशाहके सामने पाप करेगा और अत्याचारपर कमर बांधेगा तो उसका सत्यानाश अवश्य होगा। ऐसेही जो कोई कबीरपंथमें प्रविष्ट होकर पापकी ओर चित्त लगावेगा तो उसकी दशा बड़ी दीन होगी।
जिसकी सच्ची श्रद्धा अपने गुरुपर है, उसकी बुद्धिपर पिशाचीबल काम नहीं करता, उसकी बुद्धि बदल नहीं सकती, न काल किसी प्रकारकी बाधा ही उपस्थित कर सकता है।
जो कोई अपने गुरुसे सच्ची प्रीति करेगा, उसका विश्वास अचल रहेगा, उसकी बुद्धि स्वच्छ रहेगी। बिना गुरुके मनुष्यके हाथका जलपान तक करना उचित नहीं है।
कबीरसाहबकी रेखता ।
खलक हैं रैनका सपना । समझ दिल कोई नहीं अपना ॥
कहीं है लोभकी धारा । बहा जग जात है सारा ॥
घड़ा ज्यों नीरका फूटा । पतर जैसे डारसे टूटा ॥
ऐसी निर्जनि जिदगानी । अजौं क्यों न चेत अभिमानी ॥
सजन परवारा सतदारा । सभी उस रोज हों न्यारा ॥
निकल जब प्राण जावेंगे । कोई नहिं काम आवेंगे ॥
कबीरजीरके भंडारेकी कथा
निरख मतभूल तन गौरा । जगतमें जीवना थोरा ॥
तजो पर लोभ चतुराइ । रहो निस्सैंग जगमाहीं ॥
सदा जिन जान यह देही । लगाओ सत नामसे नेही ॥
कटे यम कालकी फाँसी । कहें कब्बीर अबिनासी ॥
यथा—साईकी यादमें रहना, नहीं यह जिन्द जावेगा ॥
करो उस पीव की बंदगी, तुझे यारां लखाऊंगा ।
बना है खाकका खेला, इसीमें खोज पावेगा ।
मुझ मुरशिद महर मनशाल, गो दीदार पाया है ॥
मुझीको देखले परगट, किसीसे ना छिपाया है ।
कबीरा पीर है साचा, सकलमें आप छाया है ॥
यथा—समझ दिल सोच अबकीना । मुरशिदसे पूछ नालीना ॥
कहांसे रङ्ग ये आया । न काहूँ मोहि ब्रतलाया ॥
सुरत वहि रङ्गकी प्यासी । पवरा भए हैं बनवासी ॥
न आवे हाथ वह करनी । सिधारो जाय गुरु शरनी ॥
मुझे मुरशिद मेहर करके । मुरीदी मन सिखाया है ॥
किताबें खोल दिल अन्दर । हकीकत निज बताया है ॥
कि है कोई गैबका वासी । दिखावे खेल परकासी ॥
बसावै गैबका खोरा । मिटावे भर्मका फेरा ॥
अचम्पौ देश है न्यारा । लखे कोई नामका प्यारा ॥
दिया जिन प्रेमका प्याला । सोई हैं सन्त मतवाला ॥
कि निशि दिन मोहना भूले । विरहकी झोंकमें झूले ॥
चरण कबीरको ध्यावे । इलाही ज्ञान भर पावे ॥
इतना तो मैंने सूक्ष्मवेदकी शिक्षाका निचोड़ लिख दिया है जिसमें कि, सांसारिक मनुष्योंको मालूम हो कि, सूक्ष्मवेद किसे कहते हैं ? उसमें किस प्रकार की बातें हैं ? पाठकगणोंको इस पाठसे भली भांति ज्ञान होजायगा कि, सूक्ष्म वेद किसे कहते हैं । उसमें किस प्रकारकी बातें हैं ? इस सूक्ष्म वेदकी प्रशंसा कबीर साहबने की है । सहस्रों स्थानोंपर बराबर कबीर साहब कहते जाते हैं कि, एक मनुष्य ! सूक्ष्मवेदके पाठ बिना किसीको भी अपने स्वरूपका ज्ञान न होगा । इस कारण काम शास्त्र तथा उसकी पुस्तकोंको छोड़कर सूक्ष्मवेद पढो :-
सत्यकबीर वचन ।
हैली तीरथ जाय बुलाए रे हरदम परबे नहाए ।
तीरथ कोटि अनन्त है रे गङ्ग यमुन जहाँ दुई ॥
मध्य सरस्वती बहत है रे नहाय निर्मल होवे ।
ब्रह्म अगिनके घाटमें रे आगे शिवके लिङ्ग ॥
ताहूँपे दछिना दीजिए रे बहुत सहसमुख गङ्ग ।
आगे कलालीकी हाट हरे चोखा फूल चुनन्त ॥
विन सद्गुरु पावे नहीं रे कोई साधू जन पीवन्त ।
शीश उतार धरणी धरे रे ऊपर धरले पाए ॥
ब्रह्म अगिनके घाटपे रे इस विधिपर वेनहाए ।
ऋग् यजुर साम अर्थवनां रे चारों वेदका ज्ञान ॥
उनके वहाँ कहो कौन गति रे बाँधे गॉठ अघान ।
चारों वेदको पिता हैं रे सूक्ष्म वेद सङ्गीत ॥
साहब कवीर जूक मुकद्दमे रे अविर्त ब्रह्म अतीत ।
यथा—पण्डित सतपद भजो रे भाई जाते आवागमन नशाई ॥
ज्ञान न उपजा ब्रह्म नहि चीना आप कहाँते आए ॥
एक योनिसे चार वरन भए ब्रह्मदेव कहाँ पाए ॥
बारह वेदी ब्रह्म बखानूँ स्वर ओ शक्ति समानी ।
संध्या तर्पन तहाँ करलीना जहाँ कुशा नहि पानी ॥
ऋग् यजुरज्ञानको बुद्धी साम अर्थवन सोई ।
सूक्ष्म वेदको भेद न जाने क्योकर ब्रह्मन् होई ॥
शूद्र शरीर ब्रह्म तेहि भीतर भिन्न भेद कछु नाहीं ।
लख चौरासी जिया जन्तुमें बरत रहो सब ठाई ॥
नौगुण सूत सँयोग बखानूँ निरगुण गॉठ दयानी ।
तासु जनेउ कबहुँ ना टूटे दिन दिन बारह बानी ॥
कहैं कबीर गुरुब्रह्म चीन्हले जगत् जनेऊ सोई ।
पाखैंडकी गति सबहि मिटावे तब निज ब्राह्मण होई ॥
यथा—हिरवा गँवाए सास चलीं वारी धनियां ।
कौन सौतिन है कौन सुमन है कौन वेद तुम जानियाँ ॥
कौन पुरुषको ध्यान धरत हो कौन है नाम निशानियाँ ।
एही तनु ओंकार सुमन है सूक्ष्म वेद हम जानियाँ ॥
सत्य पुरुष तो ध्यान धरत हैं सत्य है नाम निशानियाँ ।
यह मत जानो हिरवा जरवा बनियाँ दूकान बिकानियाँ ॥
अलख मूलक हिरवा मोरा अगम देशते अनियाँ ।
एक है चोर सकल जगमोसे राजा रैयत रनियाँ ।
कहैं कबीर सुनो भाइ साधो अलख है नाम निशनियाँ ॥
ऋषीश्वरोंके बचन ।
रामचन्द्रका प्रश्न-ज्ञानीके सारे कार्य अज्ञानियोंके समान होते हैं । ज्ञानी किस प्रकार पहचाना जावे ? वसिष्ठ मुनिका उत्तर-हे रामचंद्र ! एक सूक्ष्मवेद है दूसरा एक पुरुषमवेद है । सूक्ष्मके द्वारा आप अपने स्वरूपको जान सकता है । दूसरी युक्तिसे नहीं जान सकता । पुरुषम वेदका चिह्न यह है कि, तप, यज्ञ, व्रत इत्यादि करे । ज्ञानीजीका चिह्न सूक्ष्म वेद है । यह वसिष्ठपुराण निर्वाण प्रकरण पूर्वाध भाग एक सौ दो सर्गमें लिखा है ।
फिर उसी ग्रंथके दो सौ उन्तीस सर्गमें लिखा है कि, हे रामचन्द्र ! जैसे सर्पके बिलको सर्पही जानता है ऐसेही ज्ञानीका चिह्न सूक्ष्म वेद है । उसी निर्वाण प्रकरणके एक सौ ग्यारहवें सर्गमें लिखा है कि, ज्ञानका लक्षण सूक्ष्म वेद है पुरुषमवेद नहीं है ।
फिर इसी ग्रंथके मुमुक्षु प्रकरणके चौथे सर्गमें लिखा है कि, हे रामचन्द्र ! जीवन्मुक्तिसे विदेहमुक्तिका भेद प्रत्यक्ष है । परन्तु तुझको मालूम नहीं हो सकता । ज्ञानीको निमित्ता नहीं है । ज्ञानीका लक्षण सूक्ष्मवेद है । मुनिजीकी विचारमाला देखो । सन्तोंकी श्रेष्ठता सूक्ष्मवेदसे भी परे है ।
इस प्रकार समस्त ऋषि मुनि और सिद्ध साधु बराबर सूक्ष्मवेदकी ही प्रशंसा करते चले आते हैं । अब मैं इसी विषयपर शिवतंत्रका प्रमाण देता हूँ ।
शिवतंत्रका प्रमाण ।
मम पञ्चमुखेभ्यश्च पंचाम्नाया विनिर्गताः पूर्वश्च पश्चिमश्चैव दक्षि-
णश्चोत्तरस्तथा ॥ उर्द्धाम्नायाश्च पंचैते मोक्षमार्गाः प्रकीर्तिताः ॥
आम्नाया बहवः सन्ति ऊर्द्धाम्नायात् नोत्तमः ।
अनुवाद-ब्रह्मा कहता है कि, मेरे पाँच मुँहसे पाँच वेद निकले । पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण और ऊपरके । उन पाँचोंने मुक्तिमार्ग दिखलाया । वेद तो अनेक हैं पर ऊपरके मुँहवाले वेदके समान और दूसरा कोई नहीं है ।
अब चारों वेदको तो अनेक मनुष्य पढ़ते हैं परन्तु सूक्ष्म वेदका पढ़ने वाला कोई विरलाही पुरुष होगा । क्योंकि, अन्य शास्त्रोंकी शिक्षासे मनुष्य काम क्रोधादि के प्रपञ्चोंसे निवृत्त हो नहीं सकता । परन्तु सूक्ष्मवेदका पाठ सब कामनाओं तथा
लक्ष्मीजीका कबीर साहिबको लुभानेकी इच्छासे आना और विफल मनो- रथ होकर लौट जाना सत्यलोक
काम क्रोधादिके झगड़ोंसे पृथक् कर देता है। सत्यगुरुके मिलनेका मार्ग बतलाकर अपने प्राकृतिकसे मिला देता है। चार वेद प्राकृतिक वेद कहलाते हैं। ये चारों विशेषता सांसारिक मनुष्योंके निमित्त ठहराए गए हैं। मुक्तिके अधिकारियोंके एतद्द्वारा सूक्ष्म वेदमात्र है। सूक्ष्म वेदकी शिक्षामें किसी प्रकारका अवगुण अथवा त्रुटि नहीं है वह निर्दोष तथा अवगुण रहित है दूसरेमें नहीं। यदि वेदों और पुस्तकों द्वारा किसीकी मुक्ति होजाती तो मुक्तिके अधिकारियोंके लिये सूक्ष्म वेद पृथक् न ठहराया जाता।
अध्याय ७.
विष्णु भगवान्।
कालपुरुष तीनों लोकोंरूपी भवसागरकी रचना किये; पीछे उसने अपनी स्त्री आद्या और अपने तीनों पुत्रोंको तीनों लोकोंके प्रबंधका अधिकार तथा दूसरे कार्योंके लिये नियुक्त कर दिया, इन तीनोंमें विष्णुको उच्चश्रेणीका अधिकारी नियत किया, सबसे श्रेष्ठता दी। माता-पिता दोनोंने विष्णुको आशीर्वाद दिया, श्रेष्ठता प्रदान का। विष्णुको अपने स्थानपर तीनों लोकोंका कर्ता-धर्ता नियत किया। निरञ्जन तथा आद्याने अपना प्रभाव तथा बल विष्णुमें भर दिया। जैसा कि, मैं प्रथम परिच्छेदमें लिख आया हूँ। विष्णुकी माता अपने पुत्रपर अत्यंत प्रसन्न हुई। इस कारण विष्णु इस भवसागरके कर्ता-धर्ता ठहरे। जैसे कि, चक्रवर्तीराजा समस्त देशोंके राजोंपर राज्य करता है, इसी प्रकार विष्णु तीनों लोकोंके चक्रवर्ती हुए। आपको सब स्थानोंकी उपस्थिति तथा प्रकट गुप्तका बल प्रदान किया गया। ये प्रत्येक हृदयका भेद जानने लगे। प्रगट मनुष्यके पाप पुण्यका प्रतिशोध करना यमके अधिकारमें हुवा। प्रत्येकका भाग्य नक्षत्र विष्णुके अधिकार में हुवा। नरक बैकुण्ठ तथा उसके चारों ओर विष्णुका अधिकार फैला। चार खान चौरासी लक्ष योनिके जीव विष्णुके अधिकारमें ठहरे। इन तीनों लोकका रचयिता और सन्नाट है जब जैसा चाहता है बँसा करता है समस्त अधिकार इत्यादि उसको मिला है। तीनों लोकोंका रचयिता तथा परमेश्वर यह कहलाता है। इसी परमेश्वरका पूजन तीनों लोकोंमें हो रहा है। ब्रह्मा और शिव ये दोनों उसके मंत्री हैं। यह बादशाह है। यह स्वशरीर परमेश्वर है समस्त पृथ्वी तथा आकाशके मनुष्य उसकी पूजा करते हैं। इसी परमेश्वरकी आज्ञा सभी स्थानोंमें प्रचलित है। जहाँ मनुष्योंपर कठिनाई उपस्थित होती है तो उसके निवारणार्थ इस परमेश्वरका
दश सोहंगका हाल
पधारना हुवा करता है। अनेक बार तो वे स्वतः गरुड पर आरूढ़ होकर दौड़ते हैं, तुरंत उस स्थान पर पहुँच जाते हैं। सामर्थ्यभर उस विपत्तिको दूर करते हैं, कभी २ वह जन्म लेता है। जैसे राम कृष्णके अवतार धरकर दैत्योंको मारता है। जब दैत्य बलिष्ठ होते हैं तब विष्णु देवताओंकी सैन्य लेकर इनके साथ समर करता है। सामर्थ्यभर उनको मारकर भगा देता है। मर्यादा वश पराजित होता है तो स्वयम् भाग जाता है। यही विष्णु महाराज सारे संसारको आजाएँ देते हैं। सांसारिक तथा धार्मिक ऋषीश्वरोंको समस्त मर्म सिखलाते हैं। ऋषीश्वर राजाओंको बतलाते हैं, राजालोग अपनी समस्त प्रजामें वही नियम प्रचलित करते हैं, वेद पुराण सभी इसी विष्णुको जगत्का कर्ता-धर्ता मानकर, परमेश्वर कहके प्रशंसा किया करते हैं। ब्रह्मा शिव इन्द्र इत्यादि देवता सब ऋषीश्वर इसी विष्णुके प्रभुत्वकी ओर समस्त भविष्यवक्तागण इत्यादि इसी परमेश्वरकी साक्षी देते हैं। आदम, नूर, इबराहीम, इसहाक, याकूब, मूसा, ईसा और मुम्मद इत्यादि इसी परमेश्वरकी प्रशंसा करते आए हैं। सबके पथ-प्रदर्शक येही विष्णु महाराज हैं। निर्गुण तथा सगुण दोनों रूप आपहीके हैं। सबके सब इसी दिव्यदेह ईश्वरकी वन्दना बराबर करते आते हैं। समस्त धर्मोंके रचयिता येही विष्णु महाराज हैं। शिवके धर्म पृथक् हैं। और वे भी विष्णुकी परामर्शक साथ हैं और कर्मकाण्ड तथा मीमांसा सब ब्रह्माकी ओरसे हैं। परन्तु वह सब विष्णुकी कामनाके साथ हैं। इस जगत्की समस्त कलें विष्णुके हाथमें हैं। विष्णुहीको अधिकार मिला है।
आद्या और निञ्जनके पुत्र विष्णुमहाराज तीनों लोकोंके ठाकुर एवम् अपने माता पिताकी प्रतिमूर्ति हैं। येही चक्रवर्ती महाराज एवं भवसागरके प्रबन्धक हैं, अत्यन्त बलिष्ठ तथा प्रभावशाली हैं, वैरियोंके दमन करनेके निमित्त सदैव अस्त्र शस्त्रसे सुसज्जित रहते हैं, आपका शाङ्गधनुष और खड्ग नन्दक है, गदा कौमोदकी तथा चक्र सुदर्शन हाथमें है। ये शस्त्र ऐसे भयानक हैं कि इनके अवलोकनसे ही भयके मारे दुष्टोंका प्राणान्त हो जाता है। ऐसाही चक्र सुदर्शन है कि, जिधरको छूटे उधर भस्म करदे। ऐसाही गदा कौमोदकी और नन्दक अस्त्र है कि, जिसको देखतेही वैरोंके प्राण निकल जाएँ। यह नीलवर्ण घनश्याम (मूसाका आसमानी रङ्गका खुदा) समस्त मनुष्योंपर कृपादृष्टि रखता है, अत्याचारियोंको धूलमें मिला देता है, जिनपर अत्याचार किया गया है उनको सत्व देता है। जब कभी दैत्यों और राक्षसोंकी लड़ाईमें वरदान आदिके कारण कठिनाता पड़ती है तब आपकी माता आदिश्वानी सहायता
करती है, जो कठिनाई आद्यासेभी न टले उसके निमित्त निरञ्जनकी ओरसे आज़ा होती है। जो निरञ्जनके भी बशसे परे हैं वह सत्यपुरुषके कृपाकटाक्षसे ठीक हो जाती है। जब सत्यपुरुषकी दया होती है तब समस्त कठिनाइयों निवृत्त हो जाती हैं, जैसे जगन्नाथके मन्दिर स्थिर रखनेमें इस कठिनाईको निवृत्त करना निरञ्जनके बशकी बात नहीं थी। तथा स्वयम् सत्य पुरुषने मन्दिर खड़ा किया। समुद्रको हटा दिया जब समस्त देवता तथा ऋषि मुनि इत्यादि दैत्यों और राक्षसोंसे सताये जाते हैं और दुःख पाते हैं तब समस्त देवता मिलकर ब्रह्माके पास जाते उस समय विष्णु, ब्रह्मा, शिव इन्द्रादिक देवताओंको अपने साथ लेकर दैत्योंके साथ युद्ध करके उनका विनाश करते हैं, देवताओंको सुख देते हैं। सुतरां यही परमेश्वर सबका प्रतिपालक और तीनों लोकोंका प्रबन्धकर्ता है। संसारकी रक्षा करनेमें यह अपनी सारी शक्तियोंका उपयोग करता है।
शेर—यह नीर वरन घन यही बनाजो अदा।
यह खुदा है यह खुदा है यह खुदा है खुदा ॥
सुर मुनि जिसे गाते हैं कहे वेद बदीय।
यह सदा है यह सदा है यह सदा है पर सदा ॥
यही सगुण यही निर्गुण यही बेचूँ वचरा।
यह नदा है यह नदा है यह नदा है यह नदा ॥
है यह हमः मौजूद व हाज़िर नाज़िर।
न जुदा है न जुदा है न जुदा है न जुदा ॥
यही रज्जाक व कज्जाक है आयन्दः व हाल।
यह बदा है यह बदा है यह बदा है यह बदा ॥
पहचान अलग उससे हो उसपर आजिज।
यह फ़िदा है यह फ़िदा है यह फ़िदा है यह फ़िदा ॥
यह विष्णु अपने सूक्ष्म शरीरसे तो प्रत्येक वस्तुमें उपस्थित है और चारों खानके जीवोंमें घुस रहा है। ऐसेही ब्रह्मा शिव शक्ति तथा निरञ्जनको भी मानना चाहिए। जो कुछ समस्त ब्रह्माण्डमें दिखाई देता है, वह कुछ अपने शरीरमें जानना चाहिए। यह कबीर साहबका वचन है कि, विष्णु चारों खानेके जीवोंमें पूर्ण हो रहा है। विष्णुविहीन कोई स्थान नहीं है। इसीके अनुसार वह श्लोक पढ़ो कि—
जले विष्णुः स्थले विष्णुविष्णुः पर्वतमस्तके।
ज्वालामालाकुले विष्णुः सर्वं विष्णुमयं जगत्।
धर्म प्रचलित करनेकी कथा
अनुवाद—जलमें विष्णु, स्थलमें विष्णु, पर्वतकी चोटीपर विष्णु, अग्नि इत्यादिमें विष्णु है । इस तरह समस्त जगत् विष्णुसे पूर्ण हो रहा है ।
धर्मशास्त्रसे प्रगट है । यद्यपि ऋषीश्वरोंने देवताओंको शाप देकर दुःखी किया, तो भी वेदोंका वचन है कि, विष्णुकी दयाके बिना किसीकी मुक्ति नहीं होती जैसा कि, यह श्लोक है—
मोक्षस्तु विष्णुप्रसादमन्तरा न लभ्यते ।
विष्णुकी दया बिना किसीकी मुक्ति नहीं होता ।
इस श्लोकसे यह तात्पर्य निकलना चाहिए कि, विष्णु सत्तागुणरूप है । बिना सत्तोगुणी युक्ति ग्रहण किए किसीको मुक्ति नहीं होती ।
चारों वेद इस विष्णुकी प्रशंसा किया करते हैं । चारों प्रकारकी भक्ति इसी विष्णुकी कृपा तथा अनुग्रहसे प्राप्त होती हैं। जैसा कि, ऋग्वेदका ये मंत्र हैं—
अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुविचक्रमे ॥
पृथिव्याः सप्तधामभिः ॥ ऋग्वेद १-२-७-१ ।
अनुवाद— हे देवो । विष्णु सब स्थानोंपर उपस्थित है, उस परमश्वरने समस्त जीवोंको पाप पुण्य भोगने एवं समस्त पदार्थोंके ठहरनेके लिए पृथ्वीसे लेकर नीचेके सात प्रकारके धाम यानी भुवन बनाये एवं ऊपरके भी सात भुवन बनाए इसी तरह गायत्री, आदि सात छंदोंको विद्या सहित बनाया । उन लोगोंके स्थान ईश्वर वर्तमान था । जिस बलसे समस्त लोकोंको रचा है, इसी बलसे हम लोगोंकी रक्षा करता है । इसी कारण ऐ बुद्धिमानो ! तुम लोग हमारी रक्षा करते हुए इस विष्णुकी उपासना करो । वह विष्णु कैसा है ? जिसने बड़े भारी मेदिनीमण्डलको रचा है । उसकी सदैव बंदना करो । १-२-७-१ ।
विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पश्यशे ।
इन्द्रस्य युज्यः सखा ॥ ऋग्वेद-१-२-७-४ ।
अनुवाद—ऐ मनुष्यो ! विष्णु व्यापक ईश्वरके कई सुंदर संसारोंकी उत्पत्ति स्थिति और विनाश कर्मोंको तुम देखो । १-२-७-४
प्रश्न—हम यह किस प्रकार जानें व्यापक विष्णुके कर्म हैं ?
उत्तर—जिससे ब्रह्मचर्य सत्यभाषण इत्यादि व्रत बनाये गये हैं ईश्वरके जिन नियमोंके अनुष्ठान करनेसे हमलोग मनुष्यके शरीरको पानेके लिये समर्थ हुए हैं ये कार्य इसीके बलसे हैं । क्योंकि, इन्द्रियोंके साथ कर्ता भोक्ता जो जीव है उसका वही एक योगमंत्र है दूसरा कोई नहीं है कारण कि, ईश्वर जीवका अन्तर्यामी है, सिवा उसके और कोई जीवका हितकारी नहीं हो सकता, इस