भारतकोश
कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

कबीर मन्शूर (स्वसंवेदार्थ प्रकाश)

Kabir Manshoor (Svasamvedarth Prakash)

कबीर साहेब द्वारा

स्रोत: कबीर मन्शूर स्वसंवेदार्थ प्रकाश · खेमराज श्रीकृष्णदास (उद्गम)

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पृष्ठ 350, कुल 1367 में से

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जंगम जड़ चेतन कुछ नहीं था, न मानसिक ही कल्पनाएँ थीं। न अक्षर निरंजन या न ज्ञानी ही थे। हमारा यह विचार सबसे निराला है क्योंकि दूसरे उस समय भी कुछ मानते हैं। न देशसे हंगकाही विस्तार था एवं न पांच अमरही बनाये थे। जमीन आसमान और पुरुषका प्रतिबिम्ब जीव भी नहीं था। न कूर्मजी जल-रंगजी और जलकी छायाही थी। फुप दीपलीलाके दहजेमें न कोई अदल करने वाला औतार था। करमन कहती है कि, ए धर्मदास ! यह मत सबसे भिन्न है। इसी प्रकार राजा चन्द्रविजयकी इन्द्रमती, राजा रावणकी मन्दोदरी, राजा वीरसिंहकी माणिकवती, राजा योगधरकी लीलावती पुरंती आदि पचासों स्त्रियाँ राजा अमरसिंहकी रानी, राजा उदयपुरकी रानी। मीराबाई, क्षेमश्रीगवालिन तथा और भी अनगिनत स्त्रियाँ जिनके कि, शिरपर कबीर साहबने हाथ रक्खा व सब हंसस्वरूप होकर परमधामको चली गई। तथा सिधार जायँगी। उन बातोंके लिखनेकी सामर्थ्य मेरी लेखनीमें नहीं है। न किसी मनुष्य तथा देवताओंमें ही लिखने और कहने सुननेकी सामर्थ्य है। कबीर साहबकी लीलाएँ कबीर साहबही जानें या उसके परम भवतगणही जान सकते हैं।

गजल ।

यह लिखना माजिजातका यह भी अबस हुवा ।
और कहना इस सिफ़ातका यह भी अबस हुवा ॥
नाकारः नतिकिः न कहा जाय उससे कुछ ।
फिर कहना पाकज तका यह भी अबस हुवा ॥
दिनमें सके न देख जिसे दूरबीनसे ।
फिर दीद उसका रातको यह भी अबस हुवा ।
जिस बन्दगान कुदरतसे है बन्दः बेखबर ।
क्या लिखना उह बरातका यह भी अवस हुवा ॥
वह खालिके जहाँ है जो चाहे करे सोई ।
फिर जिक्र वारदात का यह भी अवस हुवा ॥
नाम और निशों मकौ है न जिसका कोई कहीं ।
बतलाना उस समातका यह भी अबस हुवा ॥
मौजिब कोई न जान कभी जिसका आजतक ।
जोयन्दः मोजिबातका यह भी अवस हुवा ॥
आजिज न पाया भेद है जो यारिफां जमौ ।
फिर करना उसकी बातका यह भी अवस हुवा ।

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